छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 2 — The War of Devas and Asuras & the Invincible Pranaश्लोक 1.2.3/1421%

Chandogya Upanishad 2.1.2.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अथ ह वाचमुद्गीथमुपासाञ्चक्रिरे तां हासुराः पाप्मना विविधुस्तस्मात्तयोभयं वदति सत्यं चानृतं च पाप्मना ह्येष विद्धा

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

फिर उन्होंने वाणी की उपासना की; असुरों ने उसे भी पाप से बींध दिया। इसीलिये वाणी से सत्य और असत्य दोनों बोले जाते हैं। ॥ ३ ॥

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Then they meditated on the udgîtha (Om) as speech, but the Asuras pierced it with evil. Therefore we speak both truth and falsehood. For speech is pierced by evil.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

छान्दोग्य के छठे प्रपाठक में उद्दालक अपने पुत्र श्वेतकेतु को नदियों का अमर दृष्टांत देते हैं: "इमाः सोम्य नद्यः पुरस्तात् प्राच्यः स्यन्दन्ते पश्चात् प्रतीच्यस्ताः समुद्रात्समुद्रमेवापियन्ति स समुद्र एव भवति ता यथा तत्र न जानन्त्ययमहमस्मीति।" हे सोम्य! जिस प्रकार ये नदियां पूर्व की ओर बहने वाली पूर्व से और पश्चिम की ओर बहने वाली पश्चिम से निकलकर अंततः समुद्र में ही विलीन हो जाती हैं और समुद्र ही बन जाती हैं; वहाँ पहुँचकर वे यह नहीं जानतीं कि 'मैं यह नदी हूँ या वह नदी'—उसी प्रकार संपूर्ण प्राणी उस एक 'सत्' से निकलकर और अंततः उसी में लीन होकर अपनी अलग सत्ता को भूल जाते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
मानव जीवन की अधिकांश चिंताएं और अवसाद 'परिवर्तन के प्रतिरोध' और पुरानी स्थितियों को जकड़े रहने से उत्पन्न होते हैं। हम अपने अतीत के पद, संबंधों के पुराने स्वरूप, या शारीरिक युवावस्था को थामे रखना चाहते हैं, जबकि जीवन का मूल स्वभाव ही निरंतर बहना है। जैसे नदी मार्ग में आने वाले पत्थरों, मोड़ों और ढलानों से संघर्ष करने के बजाय बहती रहती है और अंततः असीम सागर में समाकर शांत हो जाती है, वैसे ही बुद्धिमान मनुष्य जीवन के परिवर्तनों को स्वीकार करता है। जब हम यह समझ लेते हैं कि हमारा वर्तमान रूप, नाम और परिस्थितियां केवल उस महासागर तक पहुँचने का एक मार्ग हैं, तो नुकसान का भय और छूटे हुए अवसरों का शोक समाप्त हो जाता है। मृत्यु या परिवर्तन कोई विनाश नहीं, बल्कि नदी का समुद्र में मिलन है—जहाँ सीमित सीमाएं मिट जाती हैं और असीम विस्तार प्राप्त होता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **पहचान की तरलता (Identity Fluidity)**: अपनी पुरानी भूमिकाओं, असफलताओं या अतीत की सफलताओं के प्रति अत्यधिक आसक्ति न रखें; स्वीकार करें कि आप एक बहती हुई नदी हैं जो निरंतर नई संभावनाओं की ओर बढ़ रही है। - **विलीनता की शांति (Surrender to the Whole)**: जब जीवन में कोई ऐसा परिवर्तन आए जिसे आप टाल नहीं सकते (जैसे नौकरी का बदलना, किसी संबंध का अंत, या उम्र का बढ़ना), तो नदी की तरह सहज भाव से आगे बढ़ें और प्रकृति की योजना पर भरोसा रखें। - **वर्तमान का प्रवाह (Flowing with Life)**: दैनिक कार्यों में नियंत्रण की हठधर्मिता छोड़कर वर्तमान क्षण के प्रवाह में उपस्थित रहें; परिस्थितियों से अनावश्यक संघर्ष करने के बजाय रचनात्मक समाधान खोजें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप नदी की तरह सहज बहकर अपने जीवन को असीम सत्ता में समर्पित करने को तैयार हैं, अथवा किनारे के पत्थरों को जकड़कर ठहरने का व्यर्थ प्रयास कर रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

जल चक्र (Hydrological Cycle) और उष्मागतिकी (Thermodynamics) का सिद्धांत यह दर्शाता है कि जल का कोई भी रूप (नदी, हिम, वाष्प, मेघ) स्थिर या स्वतंत्र नहीं है; यह एक सतत प्रवाह और रूपांतरण है जो अंततः महासागर में विश्राम पाता है। इसी प्रकार, भौतिकी में 'एन्ट्रॉपी' और ऊर्जा संरक्षण का नियम सिद्ध करता है कि रूप बदलते रहते हैं, किंतु मूल ऊर्जा सदा अक्षुण्ण रहती है। उपनिषद का नदी-समुद्र दृष्टांत व्यक्तिगत अस्मिता के इस शाश्वत प्रवाह और परम सत्य में उसकी लय को पूर्णतः स्पष्ट करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Chandogya Upanishad 2.1.2.3Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next