छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 7 — The Person within the Eye (Akshi Purusha)श्लोक 1.7.3/933%

Chandogya Upanishad 7.1.7.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्रोत्रमेवर्ग मनः साम तदेतदेतस्यामृच्यध्यूढं साम तस्मादृच्यध्यूढं साम गीयते श्रोत्रमेव सा मनोऽमस्तत्साम

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

कान ही ऋक् है और मन साम है। कान 'सा' है, मन 'अम' है — यही साम है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Rik is the ear, Sâman the mind. This Sâman (mind) rests on that Rik (ear). Therefore the Sâman is sung as resting on the Rik. Sâ is the ear, ama the mind, and that makes Sâma.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

छान्दोग्य उपनिषद के अष्टम प्रपाठक में वर्णित 'दहर-विद्या' का यह अत्यंत विस्मयकारी सूत्र है: "यावान् वा अयमाकाशस्तावानेषोऽन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राणि।" जितना बड़ा यह बाह्य भौतिक आकाश है, उतना ही विशाल यह हृदय-कमल के भीतर का सूक्ष्म आकाश (दहराकाश) है! स्वर्ग और पृथ्वी दोनों इसी आंतरिक आकाश के भीतर समाए हुए हैं; अग्नि और वायु, सूर्य और चंद्रमा, विद्युत और नक्षत्र—जो कुछ भी इस ब्रह्मांड में है और जो कुछ नहीं भी है, वह सब इस हृदय-गुहा के आंतरिक आकाश में पूर्णतः समाहित है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक मनुष्य शांति, सुख और विशालता की खोज में हमेशा बाहर भागता है—विदेश यात्राएं, बड़े मकान, विशाल स्क्रीन और बाह्य आकर्षण। हम बाहर की दुनिया को जितना बड़ा और आकर्षक मानते हैं, अपने आंतरिक जीवन को उतना ही संकीर्ण, रीता और उपेक्षित छोड़ देते हैं। इस बाह्य-मुग्धता का परिणाम यह होता है कि मनुष्य भीतर से अत्यंत अकेला, दरिद्र और असुरक्षित महसूस करता है। दहर-विद्या हमें हमारे भीतर के उस असीम राजमहल का द्वार खोलकर दिखाती है। ऋषि घोषणा करते हैं कि आपको किसी भी बाह्य उपलब्धि के सामने दीन होने की आवश्यकता नहीं है; जिस सूर्य, चंद्रमा, तारों और आकाश को देखकर आप चकित होते हैं, वह संपूर्ण भव्यता आपके हृदय के सूक्ष्म आकाश में पहले से ही स्पंदित हो रही है। जब आप अपनी दृष्टि को अंतर्मुखी करके इस आंतरिक आकाश में विश्राम करना सीखते हैं, तो आपको संसार की किसी भी वस्तु की भिक्षा मांगने की आवश्यकता नहीं रहती।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **दहर-आकाश ध्यान (Inner Space Contemplation)**: प्रतिदिन 10 मिनट आँखें बंद करके अपने हृदय-कमल में एक असीम, प्रकाशमान और शांत आकाश की कल्पना करें; अनुभव करें कि आपके विचार और भावनाएं उसी विराट आकाश में तैर रहे हैं। - **बाहरी संकीर्णता का विस्तार (Expanding Perspective)**: जब भी किसी समस्या के कारण मन घुटन या संकीर्णता का अनुभव करे, तो अपनी चेतना को उस आंतरिक विशालता में फैलाएं जहाँ कोई सीमा नहीं है। - **हृदय-कमल की शांति (Emotional Sanctuary)**: संसार के अपमान, तनाव या विफलता के क्षणों में अपने हृदय-गुहा के उस पवित्र स्थान में लौटें जो हर बाह्य प्रदूषण से सर्वथा सुरक्षित और शांत है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी चेतना के उस अनंत आंतरिक ब्रह्मांड से अनभिज्ञ रहकर बाहर के नश्वर खिलौनों में सुख और शांति की भीख मांग रहे हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आधुनिक न्यूरो-फेनोमेनोलॉजी और कॉग्निटिव साइंस यह स्पष्ट करते हैं कि हम जिस 'बाह्य ब्रह्मांड' को देखते हैं, उसका संपूर्ण संवेदी निर्माण (Sensory Rendering) हमारे मस्तिष्क और चेतना के आंतरिक अंतरिक्ष में ही घटित होता है। भौतिकी में क्वांटम एंटैंगलमेंट और नॉन-लोकैलिटी (Non-locality) यह सुझाव देते हैं कि चेतना केवल मस्तिष्क में सीमित नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण अंतरिक्ष के साथ जुड़ी हुई है। उपनिषद का दहराकाश यह प्रतिपादित करता है कि बाह्य अंतरिक्ष और आंतरिक चेतना का आकाश अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही अनंत चेतना का विस्तार हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Chandogya Upanishad 7.1.7.3Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next