छान्दोग्योपनिषद्

Prapathaka 1 · Khanda 7 — The Person within the Eye (Akshi Purusha)श्लोक 1.7.9/9100%

Chandogya Upanishad 7.1.7.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

कं ते काममागायानीत्येष ह्येव कामागानस्यष्टे य एवं विद्वान् साम गायति साम गायति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

'मैं तुम्हारे लिये किस कामना का गान करूँ?' — क्योंकि जो ऐसा जानकर सामगान करता है, वह समस्त कामनाओं को प्रदान करने में पूर्ण समर्थ होता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

'What wish shall I obtain for you by my songs?' For he who knowing this sings a Sâman is able to obtain wishes through his song, yea, through his song.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

छान्दोग्य उपनिषद के षष्ठ प्रपाठक का यह अमर महावाक्य वेदांत दर्शन का सर्वोच्च शिखर है: "स य एषोऽणिमैतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो।" उद्दालक ऋषि अपने पुत्र श्वेतकेतु को वटवृक्ष के सूक्ष्म बीज, जल में घुले नमक, नदियों के सागर में मिलन आदि 9 अनुपम दृष्टांतों के माध्यम से समझाते हैं कि वह जो संपूर्ण जगत का सूक्ष्मतम सार (अणिमा) है, वही एकमात्र परम सत्य है, वही आत्मा है, और हे श्वेतकेतु—"वह तुम हो!" (तत्त्वमसि)। यह केवल कोई बौद्धिक सिद्धांत नहीं, बल्कि ऋषि द्वारा अपने शिष्य को दी गई साक्षात् आत्म-बोध की दीक्षा है कि तुम इस नश्वर शरीर या सीमित मन तक सीमित नहीं हो, बल्कि वह परम ब्रह्म ही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी अज्ञान और भ्रांति है—स्वयं को वह मान लेना जो हम नहीं हैं। हम स्वयं को अपना नाम, अपनी जाति, अपना शरीर, अपनी बीमारी, अपनी बैंक-बैलेंस या अपने अतीत के आघात मान लेते हैं। जब कोई हमें अपमानित करता है, तो हम सोचते हैं कि 'मैं' अपमानित हुआ; जब शरीर रोगी होता है, तो हम सोचते हैं कि 'मैं' नष्ट हो रहा हूँ। यह तादात्म्य ही समस्त दुःखों और जन्म-मरण के भय का मूल स्रोत है। 'तत्त्वमसि' का सिंहनाद हमें इस गहरी नींद से झकझोर कर जगाता है। आप कोई पीड़ित, असहाय या क्षुद्र जीव नहीं हैं; आप वह साक्षी-चेतना हैं जिसके प्रकाश में यह शरीर, यह मन और यह संपूर्ण संसार प्रकट और विलीन होता है। जब यह सत्य आपकी समझ में उतरता है, तो अपराध-बोध, हीनता और मृत्यु का भय एक ही क्षण में वैसे ही विलीन हो जाते हैं जैसे प्रकाश के आते ही अंधकार। यह आत्म-साक्षात्कार ही मनुष्य का अंतिम और शाश्वत मोक्ष है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **साक्षी भाव की स्थिति (Abiding as the Witness)**: जब भी क्रोध, भय या अवसाद का ज्वार उठे, तो स्वयं से कहें—"यह विचार या संवेग मेरे मन में उठ रहा है, किंतु मैं यह संवेग नहीं हूँ; मैं इसे देखने वाली शांत साक्षी चेतना हूँ।" - **अहंकार-उपाधियों का भेदन (Deconstructing False Identities)**: अपने नाम, पद, रूप और संपत्ति को केवल जीवन के वस्त्र समझें; इन बाह्य उपाधियों के खो जाने पर भी अपने अखंड आत्म-गौरव में स्थित रहें। - **सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि (Recognizing the Self in Others)**: समाज में जब किसी असहाय, दीन या विरोधी व्यक्ति को देखें, तो पहचानें कि उसके भीतर भी वही चैतन्य सत्ता है जो आपके भीतर है—"वह भी वही है।"
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपनी पहचान को केवल एक नाम और नश्वर शरीर के संकीर्ण दायरे में सीमित मानकर जी रहे हैं, अथवा इस क्षण 'तत्त्वमसि' के इस साक्षात् सत्य में जागने को तैयार हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

क्वांटम फील्ड थ्योरी (Quantum Field Theory) के अनुसार ब्रह्मांड का कोई भी कण अपने आप में कोई स्वतंत्र, ठोस वस्तु नहीं है; सभी कण (इलेक्ट्रॉन, क्वार्क) मूल क्वांटम क्षेत्रों के स्थानीय स्पंदन मात्र हैं। आपके शरीर का निर्माण करने वाले परमाणु और किसी सुदूर तारे के परमाणु एक ही अंतर्निहित क्षेत्र के प्रकटीकरण हैं। तंत्रिका विज्ञान में 'हार्ड प्रॉब्लम ऑफ कॉन्शियसनेस' (The Hard Problem of Consciousness - Chalmers) यह इंगित करती है कि भौतिक मस्तिष्क से व्यक्तिपरक अनुभव (Subjective Experience) की उत्पत्ति को भौतिकवादी नियमों से नहीं समझाया जा सकता। उपनिषद का 'तत्त्वमसि' चेतना को ही संपूर्ण अस्तित्व का मौलिक आधार घोषित करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
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Last updated
2026-10-24
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Chandogya Upanishad 7.1.7.9Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…TaittiriTaittiriya Upani…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next