तैत्तिरीयोपनिषद्

Bhṛgu Vallīश्लोक 9/1090%

Taittiriya Upanishad 3.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अन्नं बहु कुर्वीत ।तद्व्रतम् ।पृथिवी वा अन्नम् ।आकाशोऽन्नादः ।पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः ।आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता ।तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् ।स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति ।अन्नवानन्नादो भवति ।महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन ।महान् कीर्त्या ॥ १ ॥ ॥ इति अनुवाकः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"अन्न बहुत बना" — यह व्रत है। पृथ्वी ही अन्न; आकाश अन्न-भोक्ता। पृथ्वी में आकाश प्रतिष्ठित; आकाश में पृथ्वी प्रतिष्ठित। अन्न अन्न में प्रतिष्ठित। फल पूर्ववत्।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Produce abundant food — that is the vow. Earth is food; space is the eater. Space rests in earth; earth rests in space. Thus food rests in food. The fruit as above.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

तृतीय खाद्य-व्रत। बहुत अन्न उत्पन्न करो। खाद्य-उत्पादन में उदारता ही व्रत है। पृथ्वी + आकाश अन्न + भोक्ता के रूप में सम्बन्धित हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने मनुष्य को केवल एक 'उपभोक्ता' (consumer) बना दिया है। हर व्यक्ति यह सोचता है कि वह प्रकृति और समाज से कितना अधिक निचोड़ सकता है, कितना उपभोग कर सकता है। इसका परिणाम पर्यावरणीय क्षरण, संसाधनों की कमी और सामाजिक विषमता के रूप में सामने आया है। तैत्तिरीयोपनिषद् का तीसरा खाद्य-व्रत एक क्रांतिकारी नीति-निर्देश देता है: 'अन्नं बहु कुर्वीत। तद् व्रतम्।'—अत्यधिक अन्न उत्पन्न करो, प्रचुरता का सृजन करो। यह व्रत केवल खेती करने तक सीमित नहीं है; इसका दार्शनिक अर्थ है कि प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में एक शुद्ध उत्पादक (generative producer) बनना चाहिए, न कि केवल परजीवी उपभोक्ता। चाहे आपका क्षेत्र कृषि हो, तकनीक हो, शिक्षा हो या कला—समाज से आप जितना लेते हैं, उससे कई गुना अधिक मूल्य और संसाधन समाज को वापस लौटाइए। जब कोई समाज प्रचुरता उत्पन्न करता है और उसे उदारतापूर्वक सभी में वितरित करता है, तभी वहां से भूख, असुरक्षा और अपराध समाप्त होते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सृजनशील और उत्पादक मानसिकता (Generative Mindset)**: केवल दूसरों के संसाधनों और कार्यों का उपभोग करने के बजाय प्रतिदिन कुछ नया, उपयोगी और मूल्यवान सृजित करने का प्रयास करें। - **अन्न और संसाधनों का वितरण (Abundant Sharing)**: यदि ईश्वर ने आपको संपन्नता दी है, तो भूखे और वंचित लोगों के भोजन और पोषण की नियमित व्यवस्था करें; किसी को खाली हाथ न लौटाएं। - **पर्यावरणीय संवर्धन (Restorative Living)**: प्रकृति से केवल लेने के बजाय उसे वापस दें—वृक्षारोपण करें, मिट्टी और जल के संरक्षण में योगदान दें ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए अन्न की प्रचुरता बनी रहे।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं इस धरती पर केवल एक स्वार्थी उपभोक्ता बनकर संसाधनों को नष्ट कर रहा हूं, या मैं समाज और प्रकृति के लिए प्रचुरता और समृद्धि का एक उदार उत्पादक बन रहा हूं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

खाद्य-सुरक्षा शोध — जो समाज अधिशेष उत्पन्न करते और उदारता से वितरित करते हैं, वे सर्वाधिक स्थिर होते हैं। उपनिषद् का तृतीय व्रत एक नीति-निर्देश है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0071). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Anandashram Sanskrit Series No. 12.

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