तैत्तिरीयोपनिषद्

Bhṛgu Vallīश्लोक 10/10100%

Taittiriya Upanishad 3.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत ।तद्व्रतम् ।तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् ।अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते ।एतद्वै मुखतोऽन्नं राद्धम् ।मुखतोऽस्मा अन्नं राध्यते ।एतद्वै मध्यतोऽन्नं राद्धम् ।मध्यतोऽस्मा अन्नं राध्यते ।एदद्वा अन्ततोऽन्नं राद्धम् ।अन्ततोऽस्मा अन्न राध्यते ॥ १ ॥ य एवं वेद ।क्षेम इति वाचि ।योगक्षेम इति प्राणापानयोः ।कर्मेति हस्तयोः ।गतिरिति पादयोः ।विमुक्तिरिति पायौ ।इति मानुषीः समाज्ञाः ।अथ दैवीः ।तृप्तिरिति वृष्टौ ।बलमिति विद्युति ॥ २ ॥ यश इति पशुषु ।ज्योतिरिति नक्षत्रेषु ।प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे ।सर्वमित्याकाशे ।तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत ।प्रतिष्ठावान् भवति ।तन्मह इत्युपासीत ।महान्भवति ।तन्मन इत्युपासीत ।मानवान्भवति ॥ ३ ॥ तन्नम इत्युपासीत ।नम्यन्तेऽस्मै कामाः ।तद्ब्रह्मेत्युपासीत ।ब्रह्मवान्भवति ।तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत ।पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः ।परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः ।स यश्चायं पुरुषे ।यश्चासावादित्ये ।स एकः ॥ ४ ॥ स य एवंवित् ।अस्माल्लोकात्प्रेत्य ।एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य ।इमाँल्लोकन्कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् ।एतत् साम गायन्नास्ते ।हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५ ॥ अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् ।अहमन्नादोऽ३हमन्नादोऽ३अहमन्नादः ।अहंश्लोककृदहंश्लोककृदहंश्लोककृत् ।अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य ।पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाइ ।यो मा ददाति स इदेव मा३अऽवाः ।अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि ।अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् ।सुवर्न ज्योतीः ।य एवं वेद ।इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥ ॥ इति अनुवाकः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"किसी को आवास से मना मत कर" — यह व्रत है। इसलिये किसी भी विधि से बहु-अन्न प्राप्त करो — उसे "अराध्य अन्न" कहते हैं। [विभिन्न मानुष-दैव संज्ञाएँ।] जो ऐसा जानता है — इस लोक से जाकर — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय आत्मा को क्रमशः पार करके — कामरूप होकर लोकों में विचरता है — यह साम गाता हुआ रहता है — "हा³वु हा³वु हा³वु! मैं अन्न, मैं अन्न, मैं अन्न! मैं अन्न-भोक्ता, मैं अन्न-भोक्ता, मैं अन्न-भोक्ता! मैं श्लोक-कर्ता, मैं श्लोक-कर्ता, मैं श्लोक-कर्ता! मैं ऋत का प्रथमजा — देवों से पहले, अमृत-नाभि में। जो मुझे देता है — उसने मुझे ही पाया। मैं — अन्न — अन्न-भोक्ता को खाता हूँ। मैंने पूरे भुवन में प्रवेश किया है। मैं सुवर्ण-ज्योति हूँ।" — जो ऐसा जानता है। यह उपनिषद् है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Refuse no one shelter — that is the vow. Therefore by some means or another, gather food in abundance — they call this food 'arādhya' (worthy of welcome). [Various correspondences enumerated: human and divine.] He who knows all this — passing from this world, ascending through annamaya, prāṇamaya, manomaya, vijñānamaya, ānandamaya selves — wandering these worlds, eating what he wishes, taking form as he wishes — sits singing this Sāman: 'Hā vu hā vu hā vu! I am food! I am food! I am food! I am the eater of food! I am the eater of food! I am the eater of food! I am the verse-maker! I am the verse-maker! I am the verse-maker! I am the firstborn of ṛta — before the gods, in the navel of immortality. He who gives me to others by that has shared me. I, food, eat the eater of food. I have entered the whole world. I am golden-light, like the sun.' — He who knows thus. This is the Upaniṣad.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

भव्य समापन। किसी को आश्रय से मना मत करो — तृतीय महान् व्रत। अनेक संज्ञाएँ गिनाई गईं (मानुष और दैव)। साक्षात्कारी साधक, पाँचों कोशों को पार करके, महान् साम गाता है — 'मैं अन्न हूँ, मैं अन्न-भोक्ता हूँ।' ब्रह्माण्डीय आत्मा की पहचान-घोषणा। अन्तिम 'इति उपनिषद्' सम्पूर्ण शिक्षण का समापन करता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक सभ्यता में मनुष्य ने अपने चारों ओर स्वार्थ, अविश्वास और सुरक्षा की इतनी ऊंची दीवारें खड़ी कर ली हैं कि कोई अजनबी उसके दरवाजे पर आ जाए तो वह भयभीत हो जाता है। समाज में अलगाव और संवेदनहीनता का ऐसा दौर है जहां लोग केवल अपने संकीर्ण दायरे में जीते हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् का भव्य समापन एक सर्वोच्च मानवीय व्रत से होता है: 'न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत'—जो भी आपके द्वार पर आश्रय या सहायता मांगने आए, उसे कभी खाली हाथ या निराश मत लौटाओ। इसके उपरांत, आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त हुआ ऋषि समस्त सृष्टि के साथ एकाकार होकर अपना महान अद्वैत साम गाता है: 'अहमन्नम्, अहमन्नादः'—मैं ही अन्न हूं, और मैं ही उस अन्न को खाने वाला भोक्ता हूं! यह द्वैत के अंत की चरम घोषणा है। जब साधक यह जान लेता है कि खाने वाला और खाया जाने वाला, देने वाला और लेने वाला, आश्रय देने वाला और शरणार्थी—सब एक ही विराट चेतना के अलग-अलग रूप हैं, तो वहां किसी के प्रति परायापन रह ही नहीं जाता। यह अवस्था मनुष्य को संकीर्ण स्वार्थ से मुक्त कर एक सार्वभौमिक करुणा और ब्रह्मांडीय स्वतंत्रता में प्रतिष्ठित कर देती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **उदार आतिथ्य और आश्रय (Radical Hospitality and Shelter)**: अपने सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों, अतिथियों और असहाय प्राणियों (जैसे पशु-पक्षियों) को भोजन और आश्रय देने में कभी संकोच न करें। - **द्वैत की सीमाओं से परे देखना (Transcending Subject-Object Dualism)**: जब भी किसी की सहायता करें, तो यह अहंकार न पालें कि 'मैं दाता हूं और वह याचक है'; यह अनुभव करें कि आप अपने ही दूसरे रूप की सेवा कर रहे हैं। - **ब्रह्मांडीय गीत का अनुभव (Singing the Cosmic Harmony)**: अपने जीवन की हर सांस, हर कर्म और हर संबंध को एक पावन यज्ञ और उत्सव समझकर पूर्ण कृतज्ञता और आनंद के साथ जिएं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपनी संकीर्ण दीवारों के भीतर भय और स्वार्थ में बंद होकर जी रहा हूं, या मेरा हृदय इतना विशाल हो चुका है कि मैं समस्त ब्रह्मांड को अपना ही स्वरूप मानकर प्रेम और आश्रय दे सकूं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सभी भूमिकाओं में आत्म-पहचान उच्चतम ध्यानात्मक उपलब्धि है। 'मैं अन्न / मैं अन्न-भोक्ता' एक अद्वैत पहचान है जो भोक्ता-भक्ष्य की ध्रुवीयता से परे जाती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (Book Code 0071). Gita Press Gorakhpur (Official Publication)
Translation
Gita Press Editorial Board (Hindi)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain. Digitized by sanskritdocuments.org.
पाठ-भेद · Variant readings
Collated with Anandashram Sanskrit Series No. 12.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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