अध्याय 10
श्लोक 3.1
सपत्नत्क्षयणो वरणमणिः।१-२५ अथर्वा।वरणमणिः, वनस्पतिः चन्द्रमाः।अनुष्टुप्, २-३, ६ भुरिक् त्रिष्टुप्, ८, १३-१४ पथ्यापङ्क्तिः, ११, १६ भुरिक्, १५, १७-२५ षट्-पदा जगती।अ॒यं मे॑ वर॒णो म॒णिः स॑पत्न॒क्षय॑णो॒ वृषा॑ ।तेना र॑भस्व॒ त्वं शत्रू॒न् प्र मृ॑णीहि दुरस्य॒तः
sapatnatkṣayaṇo varaṇamaṇiḥ| 1-25 atharvā| varaṇamaṇiḥ, vanaspatiḥ candramāḥ| anuṣṭup, 2-3, 6 bhurik triṣṭup, 8, 13-14 pathyāpaṅktiḥ, 11, 16 bhurik, 15, 17-25 ṣaṭ-padā jagatī| ayaṃ me varaṇo maṇiḥ sapatnakṣayaṇo vṛṣā | tenā rabhasva tvaṃ śatrūn pra mṛṇīhi durasyataḥ
हिन्दी अर्थ
भरतिथियों भादि की.. पालना करने वांला सदगृहस्थीः इन्दर ब्रह्मरूप जान कर इन की. सेवा तथा पालना करता है (्रथवं ० .६।६८१)। १), भ्रतः इसे भरतः वह् सन्वा' क्षत्र है । न त का पालन करे! दद्र सेवाः कमम शीघ्रकारी हो, निरालस हों । कषत्रिय क्षतोंसे २१५ भ्रयरववेद-भाष्य १, बह दु्षां अुकषियति बरह्म. हैवजनीर्विशः ! . (केन) किस ने (भूमिः) भूमि को (विहितां) श्रलगं कैर नीचे कीभ्रोर रखा है, (केन) किस ने (द्यौः) चलोक को (उत्तरा हित्रा) उपर की भोर
English
Through whom seeks he Parjanya out, and Soma of the piercing sight? Through whom belief and sacrifice? Through whom was spirit laid in him?