अध्याय 20
श्लोक 127.1
॥ अथ कुन्तापसूक्तानि ॥ खिलानि ।इ॒दं जना॒ उप॑ श्रुत॒ नरा॒शंस॒ स्तवि॑ष्यते ।ष॒ष्टिं स॒हस्रा॑ नव॒तिं च॑ कौरम॒ आ रु॒शमे॑षु दद्महे
|| atha kuntāpasūktāni || khilāni | idaṃ janā upa śruta narāśaṃsa staviṣyate | ṣaṣṭiṃ sahasrā navatiṃ ca kaurama ā ruśameṣu dadmahe
हिन्दी अर्थ
स्त्री उत्तर देती है किं (भयं शरारुः) यह शरारती वृषाकपि (माम्) मु (अ्रवीराम् इव भ्रमि मन्यते) एेसा समता है कि मानो मै भरवीरा हुः स्वर॑ण-स्वभाव के कारण वृषाकपि को फिर भी शरार कहती है । मत््रमे स््रेण-स्वभाव दर्शाया गया है 1 मलों मे ( गच्छति स्म ) नाती हं । वह (- ऋतस्य ) सच्चाई के जीवन की
English
Who for the sake of splendour close to mighty Indra’s side rejoice, good in their own supremacy.