केनोपनिषद्

Khaṇḍa 1श्लोक 2/922%

Kena Upanishad 1.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः ।चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वह (ब्रह्म) कान का कान, मन का मन, वाणी की वाणी, प्राण का प्राण, नेत्र का नेत्र है। इन्द्रियों से ऊपर उठकर विद्वान् लोग इस लोक से जाकर अमर हो जाते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

It is the ear of the ear, the mind of the mind, the speech of speech, the life of life, the eye of the eye. The wise, transcending the senses, become immortal after departing from this world.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

ऋषि का विस्मयकारी उत्तर: "श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषश्चक्षुः" — वह परम ब्रह्म कानों का कान, मन का मन, वाणी की वाणी, प्राण का प्राण और आँखों की आँख है। विद्वान पुरुष इन इन्द्रियों के साथ अपने तादात्म्य को छोड़कर और देहाभिमान से ऊपर उठकर अमर (अमृत) हो जाते हैं। ब्रह्म कोई ऐसा पदार्थ नहीं है जिसे आँख से देखा या कान से सुना जा सके; वह वह स्वयं-प्रकाश चेतना है जिसकी शक्ति से आँख देखती है और कान सुनते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक युग में मनुष्य 'सेंसरी बर्नआउट' (sensory burnout) और मानसिक थकान का शिकार है। हमारी आँखें प्रतिदिन 8-10 घंटे स्क्रीन की नीली रोशनी से झुलस रही हैं, कान हेडफोन के निरंतर शोर से भरे हैं, और मन सूचनाओं के भारी बवंडर से पस्त हो चुका है। हम बाहर की दुनिया को देखने और सुनने में इतने थक जाते हैं कि हमें यह सुध ही नहीं रहती कि इन सब को जानने वाली शक्ति वास्तव में हमारे भीतर है। केनोपनिषद् का यह मन्त्र हमें परम विश्राम का मार्ग दिखाता है। आपकी आँखें और कान केवल कैमरे और माइक्रोफ़ोन हैं; उनका वास्तविक संचालक आपके भीतर का वह शांत, ज्योतिर्मय साक्षी है जो 'आँखों की भी आँख' और 'मन का भी मन' है। जब आप अपनी चेतना की दृष्टि को बाहर के थका देने वाले दृश्यों से हटाकर 180 डिग्री पीछे मोड़ते हैं और उस द्रष्टा में विश्राम करते हैं, तो समस्त संवेदी थकान तुरंत समाप्त हो जाती है और मन अमृत रस से भर जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संवेदी ऊर्जा का प्रत्याहार (Sensory Reset)**: जब भी स्क्रीन के सामने आँखें और सिर भारी लगें, तो 1 मिनट के लिए आँखें बंद कर लीजिए। यह भाव रखिए कि देखने वाली आँखें अब अपने भीतर के ज्योति-स्रोत में विश्राम कर रही हैं। - **मौन का श्रवण**: बोलते या सुनते समय शब्दों के पीछे छिपे उस शांत मौन पर ध्यान दीजिए जो सभी ध्वनियों का आधार है। - **मन के पार विश्राम**: जब मन विचारों से बहुत अशांत हो, तो विचारों को रोकने की चेष्टा मत कीजिए। केवल यह पहचानिए कि "मैं इन विचारों को देखने वाला 'मन का मन' हूँ।" इस बोध से विचारों का वेग तुरंत थम जाता है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप जीवन भर केवल आँखों से दिखने वाले नश्वर दृश्यों में उलझे रहेंगे, अथवा उस 'आँखों की आँख' का साक्षात्कार करेंगे जो स्वयं नित्य अमर है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संवेदी संसाधन और मेटा-अवेयरनेस (Meta-Awareness in Cognitive Science): आँख केवल प्रकाश तरंगों को रेटिना पर ग्रहण करती है और ऑप्टिक नर्व उन्हें विद्युतीय आवेगों में बदलती है। परंतु 'देखने का अनुभव' (Quanta of visual experience) न्यूरॉन्स में नहीं, बल्कि चेतना में घटित होता है। उपनिषद् इसी चेतना को 'आँखों की आँख' (चक्षुषश्चक्षुः) कहता है — वह अंतिम आधारभूत प्रकाश जो सभी संवेदी उपकरणों को प्रकाशित करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Samaveda Talavakara Brahmana Section. SanskritDocuments / Muktabodha
Translation
Swami Gambhirananda & Gita Press
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next