माण्डूक्योपनिषद्

Mandukya Upanishadश्लोक 6/1250%

Mandukya Upanishad 1.6

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यह (प्राज्ञ) सब का ईश्वर है, सर्वज्ञ है, अन्तर्यामी है, सबका मूल है — सभी प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय का स्थान है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This (Prājña) is the Lord of all, the all-knowing, the inner controller, the source of all — the origin and end of all beings.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

प्राज्ञ — गहरी निद्रा की चेतना — ईश्वर, सर्वज्ञ, के रूप में पहचाना गया है। वह अविभाजित चेतना जिसमें व्यक्ति प्रतिरात्रि विलीन होता है, वही योनि है जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसमें लौट जाते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
वैज्ञानिक भौतिकवाद और आधुनिक जीवनशैली ने मनुष्य को ब्रह्मांडीय अकेलेपन (cosmic loneliness) और अस्तित्वगत शून्यता में धकेल दिया है। आधुनिक समाज में व्यक्ति स्वयं को एक निर्जीव, विशाल और क्रूर ब्रह्मांड में धूल का एक तुच्छ और अकेला जैविक कण मानता है। इस सोच के कारण मनुष्य के भीतर गहरे अविश्वास, असुरक्षा और मृत्यु के भय की जड़ें जम जाती हैं। हम हर परिस्थिति को अपने छोटे से अहं और सीमित बुद्धि से नियंत्रित करने की व्यर्थ चेष्टा करते हैं, जिससे जीवन में लगातार तनाव और असहायता की भावना बनी रहती है। माण्डूक्योपनिषद् यहाँ चेतना के उस परम स्रोत का उद्घाटन करता है जिसे वह 'प्राज्ञ' (कारण-चेतना) कहता है: "एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्" (यही सबका ईश्वर है, यही सर्वज्ञ है, यही सबके भीतर स्थित अंतर्यामी है, यही सबका मूल कारण है और समस्त प्राणियों की उत्पत्ति व लय का आधार है)। उपनिषद् सिद्ध करता है कि ब्रह्मांड का परम नियामक कोई आकाश में बैठा बाहरी तानाशाह नहीं है; वह आपके ही भीतर स्थित वह अविभाजित चैतन्य है जिससे प्रतिरात्रि आपका जाग्रत संसार विलीन होता है और प्रातः पुनः प्रकट होता है। जीवन का सृजनात्मक स्रोत आपके अपने भीतर धड़क रहा है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **ब्रह्मांडीय सुरक्षा का भाव (Cultivating Ontological Security)**: स्वयं को इस विशाल जगत में अनाथ और अकेला महसूस करने के बजाय यह स्मरण रखें कि जिस परम चैतन्य से जीवन और आकाशगंगाएं संचालित होती हैं, वही आपकी गहनतम आत्मा है। - **अंतर्यामी के मार्गदर्शन पर भरोसा (Trusting the Inner Intelligence)**: जब जीवन में कठिन चौराहे आएं, तो केवल उथले बौद्धिक तर्कों या बाहरी दबावों पर निर्भर न रहें; मौन में बैठकर अपने भीतर के उस 'अंतर्यामी' विवेक की सूक्ष्म आवाज़ को सुनें। - **उत्पत्ति और लय की स्वीकृति (Acceptance of Cosmic Flow)**: जीवन में उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि और नए आरम्भ व अंत को सहजता से स्वीकार करें; समझें कि सब कुछ उसी एक अनंत स्रोत से प्रकट होकर उसी में विश्राम पाता है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप स्वयं को इस विशाल संसार में एक असहाय, अकेला और भटका हुआ प्राणी मानते हैं, अथवा आप उस सर्वज्ञ और अंतर्यामी चैतन्य को पहचानते हैं जो आपके भीतर से आपके समस्त अस्तित्व को संचालित कर रहा है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

Information Theory की भाषा में: जो तंत्र आन्तरिक रूप से अविभाजित होता है, उसमें अधिकतम सम्भावना होती है — ठीक वैसे जैसे शुद्ध ऊर्जा का क्षेत्र जो अभी पदार्थ में संरचित नहीं हुआ। Cosmologist महा-विस्फोट (Big Bang) से पूर्व की एकलता को लगभग इन्हीं शब्दों में वर्णित करते हैं: अविभाजित, सर्वव्यापी, समस्त रूपों का स्रोत। उपनिषद् इस ब्रह्माण्डीय स्रोत को आपकी रात्रिकालीन अनुभव में स्थापित करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Atharvaveda Shaunaka Shakha with Gaudapada Karika. Advaita Ashrama / SanskritDocuments
Translation
Swami Nikhilananda, Swami Chinmayananda
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Text is distinct from the 215 verses of Gaudapada’s Karika, which are cataloged as classical commentary.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 13.2

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

Translation / Meaning (भावार्थ)

Know Me as the knower of the field (purusha) in all fields (prakriti). Understanding of the field and its knower is true knowledge.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next