अध्याय 6
श्लोक 22.1
भैषज्यम्।१-३ शन्तातिः।१ आदित्यरश्मिः, २-३ मरुतः।त्रिष्टुप्, २ चतुष्पदा भुरिग्जगती।कृ॒ष्णं नि॒यानं॒ हर॑यः सुप॒र्णा अ॒पो वसा॑ना॒ दिव॒मुत् प॑तन्ति ।त आव॑वृत्र॒न्त्सद॑नादृ॒तस्यादिद् घृ॒तेन॑ पृथि॒वीं व्यूऽदुः
bhaiṣajyam| 1-3 śantātiḥ| 1 ādityaraśmiḥ, 2-3 marutaḥ| triṣṭup, 2 catuṣpadā bhurigjagatī| kṛṣṇaṃ niyānaṃ harayaḥ suparṇā apo vasānā divamut patanti | ta āvavṛtrantsadanādṛtasyādid ghṛtena pṛthivīṃ vyū'duḥ
हिन्दी अर्थ
अथववेद-भाष्य कां० ६1 अनु०३। सू २३ होती है । "पुनः" शब्द दारा सूचित होता है अक्षतयोनि 2 प्रत्यागता क्षतयोनि का पहिले विवाह हौ चका है। मन न यथावस्थित है, परन्तु पतिगृह दारा व्यथित हुई वह पितुगृहं व 4 । इसी प्रकार जाया भी पतिद्धारा “तुन्ना” होकर पवृ क इस द्वारा पिता तो व्यथित होगा दी, (तुन्दाना) । पति 0 घकेले जाने का वरणेन अथर्ववेद मं अन्यत्र भीहुभादहै। पथा नुततेव कर्तारं वन्ध्वच्छतु" ( १०।१।३) । वरेण्यकर तुरहमपो देवीरुप हये ॥१॥। कृकर ; प्रवाहित होती हुई, (तदपसः) वहं प्रवाहं ॥ हई (देवीः अपः) दिव्य नदियों के जलो को (अम्) ्रष्ट-यज्ञिय कर्मो वाला (उप) समाप (हवये) बुलाता हू ।
English
Gods! whatsoe’er the Dove came hither seeking, sent to us as the envoy of Destruction, For that let us sing hymns and make atonement, Well be it with our quadrupeds and bipeds! Auspicious be the Dove that hath been sent us, a harmless bird,