अध्याय 6
श्लोक 61.1
विश्वस्रष्टा।१-३ अथर्वा।रुद्रः।१ त्रिष्टुप्, २-३ भुरिक्।मह्य॒मापो॒ मधु॑म॒देर॑यन्तां॒ मह्यं॒ सूरो॑ अभर॒ज्ज्योति॑षे॒ कम्।मह्यं॑ दे॒वा उ॒त विश्वे॑ तपो॒जा मह्यं॑ दे॒वः स॑वि॒ता व्यचो॑ धात्
viśvasraṣṭā| 1-3 atharvā| rudraḥ| 1 triṣṭup, 2-3 bhurik| mahyamāpo madhumaderayantāṃ mahyaṃ sūro abharajjyotiṣe kam| mahyaṃ devā uta viśve tapojā mahyaṃ devaḥ savitā vyaco dhāt
हिन्दी अर्थ
देवा मागं यथा पूव सं जानाना उपाधते ॥१॥ मन (सं जानताम्) एक विध सकल्पो वाले हों । (यथा) जंसे (पूवं) विद्या से सम्पूणं (देवाः) विद्वान् (सं जानानाः) एक मत हो कर (भागम्) भज- नीय परमेएवर का (उपासते) उपासना करते्ह वेसेतुम भी किया (समितिः) राजसभा (समानो) एक हो, (व्रतम्) ब्रत (समानम्) एकरूप (जुहोमि) मे यन्न करता हुं, माहुति्यांः देता हू, (समानम) तुम्हारा एक- विध (चेतः) चिन्तनदहो (अभि सं विशध्वम्) एक चित्त दौ कर तुम राजसभा मे प्रवेश किया करो। १. पथवा मन्त्रः वेदिक विचार, वेदानुकूल विचार ।
English
The angry spirit hath relaxed: loose are the arms that act with mind. Do thou, destroyer, overcome and drive these foemen’s might away, and then bring opulence to us.