कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 13/1587%

Katha Upanishad 5.13

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अनित्यों के बीच नित्य, चेतनों के बीच चेतन — जो एक होकर बहुतों की कामनाओं को पूर्ण करता है। उसे आत्म-स्थ देखने वाले धीर पुरुषों को शाश्वत शान्ति होती है; अन्य को नहीं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Eternal among the non-eternal; the Conscious among the conscious — the One who fulfills the desires of the many. The wise who see him in the Self have eternal peace; not the others.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

शाश्वत शांति का रहस्य: जो अनित्य और नाशवान पदार्थों के बीच एकमात्र नित्य है, जो समस्त चेतन प्राणियों के भीतर एकमात्र मूल चेतना है, और जो अकेला होकर भी करोड़ों जीवों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है — उस अपने हृदय में स्थित परमात्मा को जो धीर पुरुष साक्षात् देखते हैं, केवल उन्हीं को शाश्वत और नित्य शांति प्राप्त होती है, किसी अन्य को नहीं!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यह कठोपनिषद् का दूसरा महा-उद्घोष है जो शांति का सनातन संविधान प्रस्तुत करता है: 'नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्॥' — इस संसार में सब कुछ अनित्य, परिवर्तनशील और नश्वर है — शरीर, संबंध, संपदा, साम्राज्य; उन सब अनित्य पदार्थों के बीच जो अकेला 'नित्य' (शाश्वत) है! जितने भी प्राणी चेतन दिख रहे हैं — उन सबकी चेतना का जो एकमात्र मूल 'चेतन' स्रोत है! और जो अकेला होकर भी इन अनंत जीवों के कर्म-फलों और कामनाओं का भलीभाँति विधान करता है — उस परमात्मा को जो धीर साधक अपने हृदय में साक्षात् देख लेते हैं — 'तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्' — केवल उन्हीं को शाश्वत शांति मिलती है, किसी अन्य को कभी नहीं! आज की दुनिया शांति के लिए तरस रही है। लोग शांति सम्मेलनों, तनाव-प्रबंधन की कार्यशालाओं और दवाइयों के पीछे भाग रहे हैं। किन्तु अशांति की जड़ क्या है? अशांति की जड़ यह है कि हमने अपना आधार 'अनित्य' (नाशवान चीजों) को बना रखा है। जब आपका आधार ही डगमगा रहा हो, तो आपको शांति कैसे मिल सकती है? जब आप उस 'नित्योऽनित्यानां' (अनित्यों के बीच एकमात्र नित्य परमात्मा) को अपना आश्रय बना लेते हैं, तो बाहर चाहे कितना भी बड़ा तूफान क्यों न आए, आपके अंतर्मन की शांति हिमालय की भाँति अडिग रहती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **नित्य पर टिकें**: जब भी जीवन में कोई बदलाव या हानि हो, तो स्वयं से कहें — "यह अनित्य था, इसका जाना स्वाभाविक है; मेरी आत्मा और परमात्मा ही एकमात्र नित्य हैं।" - **कामनाओं के विधान पर विश्वास**: यह भरोसा रखें कि जो सत्ता समस्त ब्रह्मांड की व्यवस्था कर रही है, वह आपकी वास्तविक आवश्यकताओं का भी सम्यक् ध्यान रखेगी; व्यर्थ की चिंता छोड़ें। - **हृदय में शांति का अनुभव**: प्रतिदिन कुछ क्षण सब कुछ भूलकर अपने हृदय में स्थित उस परम चेतन के शांत सान्निध्य में मौन विश्राम करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपनी शांति को अनित्य और नश्वर चीजों पर टिकाकर अशांत हो रहा हूँ, अथवा मैं अपने हृदय में विराजमान उस एकमात्र नित्य परमात्मा में शाश्वत शांति का अनुभव कर रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अस्तित्ववादी शांति और नित्य चेतना (Existential Serenity): परिवर्तनशील अनित्य संसार में जब मन उस एकमात्र नित्य आधार (Ground of Consciousness) से जुड़ जाता है, तो संपूर्ण मानसिक अशांति सदा के लिए शांत हो जाती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 2.20

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

Translation / Meaning (भावार्थ)

The Self is never born and never dies. Unborn, eternal, ever-existing, it is not destroyed when the body is destroyed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next