कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 14/1593%

Katha Upanishad 5.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् ।कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वे "यही वह है" — ऐसा मानते हैं — अनिर्देश्य परम सुख। मैं उसे कैसे जानूँ? वह स्वयं चमकता है, या उसकी प्रभा से और कुछ चमकता है?

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(Naciketas asks:) They think of it as "this is that" — the indescribable supreme bliss. How shall I know it? Does it shine, or does it shine forth?

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

परम आनंद का विस्मय: वे आत्मज्ञानी महापुरुष उस अनिर्वचनीय, अवर्णनीय परम सुख को "तदेतत्" (यही वह है!) — ऐसा साक्षात् अनुभव करते हैं। नचिकेता विचार करता है — मैं उस अनिर्देश्य परम सुख को कैसे जानूँ? क्या वह स्वयं प्रकाशित होता है, अथवा किसी अन्य के द्वारा प्रकाशित होता है?

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार के उस विस्मयकारी क्षण का चित्रण करता है जहाँ समस्त भाषा और शब्द मौन हो जाते हैं: 'तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम्। कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा॥' — जो तत्त्ववेत्ता ऋषि हैं, वे उस अनिर्देश्य (जिसका वाणी से वर्णन नहीं किया जा सकता) परम सुख को केवल इतना ही कह पाते हैं — "तद् एतत्!" (अरे, यही वह है! जिसकी खोज में हम भटक रहे थे, वह यही है!)। नचिकेता के मन में एक अत्यंत सुंदर और वैज्ञानिक जिज्ञासा उठती है: "मैं उस परम आनंद को कैसे जानूँ? क्या वह किसी सूर्य या दीये की भाँति स्वयं चमकता है, अथवा वह किसी दर्पण की भाँति दूसरों के प्रकाश से चमकता है?" जब मनुष्य को कोई असाधारण और अलौकिक अनुभव होता है — जैसे किसी गहरी समाधि का आनंद, असीम प्रेम या विराट सौंदर्य — तो भाषा पंगु हो जाती है। आप शब्दों में समझा नहीं सकते; आप केवल इतना ही कह सकते हैं कि "बस, यही वह है!" नचिकेता का यह प्रश्न कि "वह स्वयं चमकता है या किसी से चमकता है", चेतना के मूल स्रोत की खोज है। यह प्रश्न अगले ही श्लोक में विश्व के सबसे महान दार्शनिक उद्घोष को जन्म देता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **शब्दों से परे अनुभव की खोज**: धर्म और दर्शन को केवल किताबों और बहसों तक सीमित न रखें; उस प्रत्यक्ष अनुभूति (तदेतत्) के लिए ध्यान की गहराइयों में उतरें। - **बौद्धिक सीमाओं की स्वीकृति**: समझें कि जीवन के सबसे महान सत्य (प्रेम, करुणा, आत्म-आनंद) भाषा और परिभाषाओं की पकड़ में नहीं आते; उनका अनुभव ही उनका प्रमाण है। - **परम सुख की अभीप्सा**: नचिकेता जैसी प्रखर और वैज्ञानिक जिज्ञासा धारण करें; सत्य को जाने बिना कभी संतुष्ट न हों।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा आध्यात्मिक ज्ञान केवल दूसरों से सुने हुए शब्दों और सिद्धांतों का संग्रह है, अथवा मेरे भीतर कभी यह प्रत्यक्ष विस्मयकारी अनुभूति जागी है कि — "तदेतत्! यही वह परम सुख है!"?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अनिर्वचनीय परमानंद (Ineffable Mystical Experience): गहन समाधि में होने वाला परमानंद (Eudaimonic Bliss) भाषा और तार्किक संकल्पनाओं से परे होता है; इसे केवल प्रत्यक्ष अनुभूति द्वारा ही जाना जा सकता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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आगे क्या · What next