कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 1/157%

Katha Upanishad 5.1

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः ।अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते ।एतद्वै तत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अज (अजन्मा) — अकुटिल-चेतन — का यह एकादश-द्वारी (ग्यारह द्वारों वाला) नगर है। उसका अनुष्ठान करने से मनुष्य शोक नहीं करता; मुक्त होकर सर्वथा मुक्त हो जाता है। यही वह है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The city of eleven gates belongs to the unborn one of unwarped consciousness. Meditating on him, one does not grieve; freed, one is liberated. This indeed is That.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

ग्यारह द्वारों वाला नगर: यह मानव शरीर उस अजन्मा, निष्कपट और शुद्ध-चेतन परमात्मा का 11 द्वारों (दो आँखें, दो कान, दो नासिका-छिद्र, एक मुख, नाभि, गुदा, उपस्थ और ब्रह्मरंध्र) वाला एक दिव्य नगर है। जो साधक इस नगर के वास्तविक स्वामी का निरंतर ध्यान करता है, वह कभी शोक को प्राप्त नहीं होता और जीवित रहते हुए ही समस्त बंधनों से मुक्त होकर सदा के लिए मुक्त हो जाता है। यही वह परम तत्त्व है (एतद्वै तत्)!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज मानव शरीर की तुलना एक अत्यंत भव्य और सुरक्षित नगर (दुर्ग) से करते हैं: 'पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः। अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते। एतद्वै तत्॥' — यह शरीर ग्यारह द्वारों वाला एक नगर है। इसके स्वामी कोई सांसारिक व्यक्ति नहीं, बल्कि साक्षात् 'अज' (अजन्मा) और 'अवक्रचेता' (जिसकी चेतना कभी टेढ़ी या विकृत नहीं होती, विशुद्ध सत्य-स्वरूप परमात्मा) हैं। जो साधक इस नगर का स्वामी बनकर इन ग्यारह द्वारों पर पहरा देता है और अपने वास्तविक अधिपति का ध्यान करता है, वह कभी किसी शोक या अवसाद का शिकार नहीं होता। वह जीवित अवस्था में ही वासनाओं से मुक्त हो जाता है और देह छूटने पर पूर्ण मुक्ति को प्राप्त करता है। समकालीन जीवन में हम इस '11 द्वारों वाले नगर' को पूरी तरह लावारिस छोड़ देते हैं। कोई भी अवांछित विचार, नकारात्मक समाचार, अश्लीलता या विषाक्त भावना इन द्वारों (विशेष रूप से आँख और कान) से हमारे भीतर बिना रोक-टोक प्रवेश कर जाती है और हमारे आंतरिक वातावरण को प्रदूषित कर देती है। जब नगर का राजा ही सो जाए, तो लुटेरे नगर को लूट ही लेंगे। अपने शरीर और इन्द्रियों को एक पवित्र मंदिर या सुरक्षित नगर की तरह प्रबंधित करना और स्वयं को उसका साक्षी राजा जानना ही आत्म-प्रभुत्व (Self-Mastery) का आधार है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संवेदी द्वारों पर पहरा (Gatekeeping Awareness)**: अपनी आँखों और कानों रूपी द्वारों पर सजग चौकीदार बिठाएं; किसी भी नकारात्मक, हिंसक या उत्तेजक सामग्री को अपने मानसिक नगर में प्रवेश न करने दें। - **अवक्रचेता का अनुकरण**: अपने विचारों और आचरण में कुटिलता, छल और दोगलेपन का त्याग करें; आंतरिक रूप से अत्यंत सीधे, पारदर्शी और प्रामाणिक बनें। - **देह के स्वामी का स्मरण**: अपने शरीर को केवल माँस-मज्जा का पुतला न समझें; इसे उस अजन्मा परमात्मा की राजधानी मानकर इसका सम्मान और सात्विक पोषण करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा यह 11 द्वारों वाला शरीर रूपी नगर नकारात्मक विचारों और बाहरी विकारों के लिए खुला पड़ा है, अथवा मैं एक सजग राजा की भाँति अपनी चेतना में प्रतिष्ठित होकर इसका शासन कर रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

जैविक संगठन और संप्रभु चेतना (Biological Architecture & Sovereign Self): शरीर 11 संवेदी और उत्सर्जन द्वारों वाली एक अत्यंत जटिल जैविक प्रणाली है, जिसका वास्तविक केंद्र और स्वामी वह शुद्ध चेतना है जो इन सभी द्वारों का संचालन करती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next