कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 2/1513%

Katha Upanishad 5.2

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद् होता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ।नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

वही पवित्र आकाश में हंस है, अन्तरिक्ष में वसु, वेदी पर होता, द्रोणी (पात्र) में अतिथि; नृषद्, वरसद्, ऋतसद्, व्योमसद्; जल से उत्पन्न, गौ से उत्पन्न, ऋत से उत्पन्न, अद्रि से उत्पन्न — महान् ऋत वही है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He is the swan in the pure (sky), the vasu in the middle space, the priest at the altar, the guest in the house; he dwells in men, in gods, in ṛta, in the void; born of water, born of cattle, born of ṛta, born of rock — Ṛta, the great.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

हंस-मंत्र (सर्वव्यापक परमात्मा): वही परमात्मा पवित्र द्युलोक में सूर्य (हंस) रूप है, अन्तरिक्ष में वायु (वसु) रूप है, यज्ञ-वेदी पर अग्नि (होता) रूप है, और कलश में सोम (अतिथि) रूप है। वह मनुष्यों में, देवों में, सत्य में और आकाश में स्थित है; वह जल में उत्पन्न, पृथ्वी पर उत्पन्न, ऋत (नियम) से उत्पन्न और पर्वतों से उत्पन्न होने वाला परम सत्य और महान् तत्त्व है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यह ऋग्वेद का वह अत्यंत प्रसिद्ध 'हंसवती ऋचा' है जिसे कठोपनिषद् यहाँ आत्मा की सर्वव्यापकता को सिद्ध करने के लिए उद्धृत करता है: 'हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्॥' — वही परमात्मा आकाश में चमकता हुआ सूर्य है, वही अन्तरिक्ष में बहती हुई प्राण-वायु है, वही वेदी पर प्रज्वलित अग्नि है, और वही घट-घट में बैठा हुआ पावन अतिथि है। वह जल के जीवों में, पृथ्वी की वनस्पतियों में, सत्य के नियमों में और पर्वतों की चट्टानों में समाया हुआ है। वह 'ऋतं बृहत्' — परम विराट, अखंड और शाश्वत सत्य है! मनुष्य का अज्ञानी मन ईश्वर को किसी एक विशेष स्थान, पंथ या मूर्ति में कैद करने की चेष्टा करता है। किन्तु उपनिषद् की यह सर्वव्यापक दृष्टि हमें प्रकृति के कण-कण में परमात्मा के साक्षात् दर्शन कराती है। जब आप किसी बहती नदी, चमकते तारे, उड़ते पक्षी या किसी अजनबी व्यक्ति को देखते हैं, तो आप वास्तव में उसी एक 'हंस' के अनंत रूपों को देख रहे होते हैं। इस दृष्टि के जागते ही संसार के प्रति घृणा, शोषण और प्रदूषण की भावना समाप्त हो जाती है और समस्त अस्तित्व एक पावन मंदिर बन जाता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **प्रकृति में देवत्व का दर्शन**: जब भी आकाश, सूर्य, वृक्ष या पर्वतों को देखें, तो समझें कि यह जड़ पदार्थ नहीं है; इनमें वही परम 'हंस' स्पंदित हो रहा है; प्रकृति का आदर करें। - **अतिथि-भाव से जीवन जीना**: संसार में किसी वस्तु के स्थायी मालिक बनने का अहंकार न पालें; स्वयं को इस पृथ्वी पर कुछ समय का पावन 'अतिथि' मानकर अनासक्त भाव से रहें। - **ऋतं बृहत् के प्रति निष्ठा**: अपने जीवन को ब्रह्मांडीय सत्य और नैतिक नियमों (ऋत) के अनुकूल बनाएं; प्रकृति के साथ सामंजस्य ही वास्तविक साधना है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरा ईश्वर किसी संकीर्ण पूजा-स्थल तक ही सीमित है, अथवा मेरी आँखें समस्त प्रकृति, आकाश, सूर्य और जल में उस एक 'ऋतं बृहत्' परमात्मा को देख पा रही हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सर्वव्यापक ऊर्जा और सर्व-समावेशी व्यवस्था (Ubiquitous Field Theory): सृष्टि का कोई भी स्थान, कोई भी कण और कोई भी अवस्था उस मौलिक ऊर्जा-क्षेत्र से शून्य नहीं है; उपनिषद् इसी सर्वव्यापक सत्य को हंस-मंत्र में अभिव्यक्त करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Katha Upanishad 5.2Current VerseBhagavadBhagavad Gita Bh…BhagavadBhagavad Gita Bh…
🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next