कठोपनिषद्

Vallī 5श्लोक 12/1580%

Katha Upanishad 5.12

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

एक — सब प्राणियों का अन्तरात्मा — वशी (नियन्ता) — एक रूप को अनेक रूप में करता है। उसे आत्म-स्थ देखने वाले धीर पुरुषों को शाश्वत सुख होता है; अन्य को नहीं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The one inner Self of all beings — the controller — makes one form into many. The wise who see him in the Self have eternal happiness; not the others.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

शाश्वत सुख का अधिकारी: जो एक ही परमेश्वर समस्त प्राणियों का अंतरात्मा है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड का एकमात्र स्वतंत्र नियंता (वशी) है, और जो अपने एक ही अव्यक्त रूप को अनेक रूपों में प्रकट करता है — उस अपने भीतर स्थित आत्म-देव को जो धीर पुरुष साक्षात् अनुभव करते हैं, केवल उन्हीं को शाश्वत और नित्य सुख प्राप्त होता है, किसी अन्य को नहीं!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज शाश्वत सुख का अनन्य और अकाट्य नियम घोषित करते हैं: 'एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति। तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्॥' — वह परमात्मा केवल एक है, वही इस संपूर्ण सृष्टि का संप्रभु शासक और नियंता है, वही सब प्राणियों का अंतरात्मा है, और वही अपने एक ही स्वरूप को इन करोड़ों जीव-जंतुओं के रूप में प्रकट कर रहा है। उस परमेश्वर को जो धीर पुरुष बाहर मूर्तियों या आकाश में नहीं, बल्कि 'आत्मस्थम्' — अपने ही अंतःकरण में साक्षात् अनुभव कर लेते हैं — 'तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्' — केवल और केवल उन्हीं को शाश्वत और कभी न समाप्त होने वाला सुख मिलता है; शेष संसार के किसी भी मनुष्य को सच्चा सुख कभी नहीं मिल सकता! उपनिषद् की यह घोषणा अत्यंत दो-टूक और स्पष्ट है। यदि आप सोचते हैं कि नया घर खरीदकर, पदोन्नति पाकर, विवाह करके या दुनिया घूमकर आपको स्थायी सुख मिल जाएगा, तो आप स्वयं को धोखा दे रहे हैं। संसार की कोई भी वस्तु आपको 'शाश्वत सुख' नहीं दे सकती; वह केवल सुख का क्षणिक भ्रम दे सकती है जो शीघ्र ही नए असंतोष में बदल जाएगा। स्थायी, अटूट और सच्चा सुख केवल एक ही जगह है — अपनी ही आत्मा के भीतर। जब तक आप अपने भीतर बैठे उस एक स्वामी से नहीं जुड़ते, तब तक आपका भटकाव कभी समाप्त नहीं हो सकता।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सुख की दिशा बदलें**: सुख को बाहर की परिस्थितियों, लोगों की तारीफों या वस्तुओं में खोजना बंद करें; प्रतिदिन ध्यान द्वारा अपने भीतर के 'आत्मस्थ' सुख का आस्वादन करें। - **अनेकता में उस एक नियंता को देखें**: संसार के नाना रूपों के पीछे कार्य कर रहे उस एक ही 'वशी' (सर्वोच्च सत्ता) के प्रति समर्पित रहें। - **धीरता का वरण**: क्षणिक सांसारिक प्रलोभनों में बहने के बजाय धीर बनें और अपने शाश्वत कल्याण को प्राथमिकता दें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं आज भी संसार की नश्वर वस्तुओं में 'शाश्वत सुख' खोजने की मृगतृष्णा में भटक रहा हूँ, अथवा मैंने अपनी ही आत्मा में स्थित उस परम सुख के स्रोत को पहचाना है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आंतरिक नियंत्रण और गहन आनंद (Internal Locus of Control & Eudaimonia): जो लोग सुख को बाह्य परिस्थितियों में खोजते हैं वे सदा तनाव में रहते हैं; जो सुख को अपनी आंतरिक चेतना में पा लेते हैं, वे स्थायी आनंद (शाश्वत सुख) के स्वामी बनते हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next