केनोपनिषद्

Khaṇḍa 4श्लोक 6/967%

Kena Upanishad 4.6

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसका नाम "तद्वन" (सबकी इच्छा-योग्य) है। इसी रूप में उसकी उपासना करनी चाहिए। जो इसे ऐसा जानता है, उसकी ओर सब प्राणी आकर्षित होते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

It is called Tadvana — "the desired-of-all." It should be worshipped as Tadvana. He who knows it thus — all beings yearn toward him.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

उसका नाम "तद्वन" (सबकी इच्छा-योग्य) है। इसी रूप में उसकी उपासना करनी चाहिए। जो इसे ऐसा जानता है, उसकी ओर सब प्राणी आकर्षित होते हैं। क्योंकि उसने वह पा लिया है जो हर कोई वास्तव में चाहता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
हर मनुष्य प्रेम, आदर और आकर्षण का केंद्र बनना चाहता है। इसके लिए लोग महंगे कपड़े पहनते हैं, सोशल मीडिया पर फॉलोअर्स जुटाते हैं, और दिखावे के मुखौटे लगाते हैं। परंतु यह बाह्य आकर्षण अत्यंत उथला और क्षणभंगुर होता है। जैसे ही किसी की संपन्नता या रूप घटता है, लोग किनारा कर लेते हैं। मनुष्य यह नहीं समझता कि वास्तविक आकर्षण बाह्य चमक-दमक में नहीं, बल्कि आंतरिक पूर्णता में होता है। उपनिषद् ब्रह्म का परम गोपनीय नाम प्रकट करती है: "तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यम्" — उसका नाम 'तद्वन' (समस्त प्राणियों का परम प्रिय और एकमात्र वांछनीय) है! दुनिया में हर व्यक्ति जो कुछ भी खोज रहा है — चाहे वह सुख हो, सुरक्षा हो या आनंद — वह वास्तव में ब्रह्म की ही छाया है। जो व्यक्ति उस आत्म-तत्व में स्थित हो जाता है, वह स्वयं 'तद्वन' बन जाता है — समस्त संसार और सभी प्राणी स्वाभाविक रूप से उसके प्रति प्रेम और श्रद्धा से भर जाते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **इच्छाओं के मूल स्रोत की पहचान (Tracing Desires to the Source)**: जब भी मन में किसी सांसारिक वस्तु या पद की तीव्र लालसा जागे, तो पूछिए: "मैं वास्तव में क्या खोज रहा हूँ?" आप वस्तु को नहीं, बल्कि उसके पीछे मिलने वाले आंतरिक आनंद (ब्रह्म) को खोज रहे हैं। - **सर्वप्रिय व्यक्तित्व का विकास (Becoming a Magnet of Peace)**: दूसरों का स्नेह और सम्मान पाने के लिए दिखावा करने के बजाय अपने भीतर प्रेम और आत्म-शांति में स्थापित हों। जो स्वयं में तृप्त है, उसकी ओर पूरी सृष्टि स्वाभाविक रूप से आकर्षित होती है। - **तद्वन की उपासना (Meditating on the Supreme Beloved)**: प्रतिदिन कुछ क्षण इस भाव में बैठें कि समस्त ब्रह्माण्ड का परम प्रिय और सबका अंतिम आश्रय मेरे ही हृदय में विद्यमान है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप दूसरों से प्रेम और सम्मान की भीख मांग रहे हैं, अथवा अपने भीतर उस परम प्रिय आत्म-तत्व को पहचानकर स्वयं प्रेम का स्रोत बन चुके हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संलग्नता और सुसंगति (Attachment Theory & Heart-Rate Coherence): जो व्यक्ति अपने केंद्र में शांत और पूर्ण होता है, उसकी उपस्थिति दूसरों के तंत्रिका-तंत्र को शांत करती है। लोग स्वाभाविक रूप से ऐसे व्यक्ति की ओर खिंचते हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Samaveda Talavakara Brahmana Section. SanskritDocuments / Muktabodha
Translation
Swami Gambhirananda & Gita Press
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Manuscript traditions uniformly preserve the 35-verse partition with zero disputed interpolations.

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