केनोपनिषद्

Khaṇḍa 4श्लोक 9/9100%

Kena Upanishad 4.9

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येष्ठे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो इस उपनिषद् को इस प्रकार जानता है, वह सब पाप का नाश करके, अनन्त, श्रेष्ठ, ज्येष्ठ स्वर्ग-लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है — प्रतिष्ठित हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who knows this thus, having driven off all evil, is established in the infinite, highest, supreme realm — yes, is established.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

जो इस उपनिषद् को इस प्रकार जानता है, वह सब पाप का नाश करके, अनन्त, श्रेष्ठ, ज्येष्ठ स्वर्ग-लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है — प्रतिष्ठित हो जाता है। फल कहीं दूर जाना नहीं, बल्कि यहीं अनन्त में अडिग स्थापित होना है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
21वीं सदी का मानव जीवन मानसिक अस्थिरता, असुरक्षा की भावना और निरंतर चिंता के भंवर में फंसा हुआ है। हम छोटी-छोटी बातों पर विचलित हो जाते हैं — किसी की तीखी टिप्पणी, व्यापार में घाटा, या रिश्तों में अनबन हमें हिलाकर रख देती है। मनुष्य अपने भीतर किसी ठोस आधार पर खड़ा नहीं है; वह ताश के पत्तों के महल की तरह हर झोंके में कांपता रहता है। केनोपनिषद् का यह अंतिम महामंत्र परम स्थिरता का वरदान है: "यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येष्ठे च प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति" — जो इस उपनिषद् को इस प्रकार जान लेता है, वह समस्त अज्ञान और सीमाओं (पाप) को नष्ट करके उस अनंत, सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च अमृत-लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है — सुप्रतिष्ठित हो जाता है! 'स्वर्ग' कोई बादलों के पार का स्थान नहीं है, बल्कि इसी क्षण अपने अनंत आत्म-स्वरूप में स्थापित हो जाना ही सच्चा स्वर्ग है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **अनंत में सुप्रतिष्ठित होना (Rooted in the Infinite)**: संसार के उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि और मान-अपमान के बीच अपनी चेतना को उस असीम सत्य में स्थापित रखें जो कभी नहीं डोलता। - **पाप और सीमाओं का विनाश (Shattering Limitations)**: आत्म-ज्ञान के प्रकाश से अपने भीतर के समस्त संकोच, अपराध-बोध, हीनता और स्वार्थ की सीमाओं को भस्म कर दें। मुक्त होना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है। - **स्थिर प्रज्ञा का जीवन (Living with Unshakable Equanimity)**: लक्ष्य कोई क्षणिक समाधि का अनुभव नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में वह सहज स्थिरता है जो संकट के समय भी विचलित नहीं होती।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आपका मन संसार की छोटी-छोटी हवाओं से डगमगा जाता है, अथवा आप उस अनंत और अचल आत्म-तत्व में सदा-सदा के लिए प्रतिष्ठित हो चुके हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

दीर्घकालिक स्थिरता और संज्ञानात्मक संप्रभुता: जब साधक चेतना के आधार में स्थापित होता है, तो उसका अमिग्डाला (भय केंद्र) शांत हो जाता है और प्रीफ्रॉन्टल कॉर्टेक्स पूर्ण संतुलन में कार्य करता है। यह उपनिषद् की 'प्रतिष्ठा' का जैविक आधार है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Samaveda Talavakara Brahmana Section. SanskritDocuments / Muktabodha
Translation
Swami Gambhirananda & Gita Press
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Manuscript traditions uniformly preserve the 35-verse partition with zero disputed interpolations.

Found a mistake?