रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्।मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्
rāmaṃ kāmārisevyaṃ bhavabhayaharaṇaṃ kālamattebhasiṃhaṃ yogīndraṃ jñānagamyaṃ guṇanidhimajitaṃ nirguṇaṃ nirvikāram| māyātītaṃ sureśaṃ khalavadhanirataṃ brahmavṛndaikadevaṃ vande kandāvadātaṃ sarasijanayanaṃ devamurvīśarūpam
व्याख्याVyakhya
लंकाकांड हमारे चार महान आंतरिक शत्रुओं की पहचान कराता है — काम (तीव्र आसक्ति/वासना), क्रोध (प्रतिक्रियात्मक गुस्सा), मद (अहंकार का नशा), और लोभ (अतृप्त लालच)। ये रावण के चार प्रमुख लक्षण हैं — और उसकी लंका इन्हीं वृत्तियों का साम्राज्य है। रामायण का यह युद्ध केवल भौगोलिक या राजनीतिक नहीं है; यह हमारे भीतर का युद्ध है। प्रत्येक मनुष्य अपने भीतर एक लंका लेकर चलता है। तुलसीदास जी का समाधान बिल्कुल स्पष्ट है: इन वृत्तियों का दमन या केवल नियंत्रण नहीं, बल्कि उनका प्रतिस्थापन करना — अर्थात जो स्थान ये विकार घेरते हैं, उसे उस परम तत्व की भक्ति और अच्छाई से भर देना।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
"बिग फाइव" व्यक्तित्व के पतनकारी कारकों पर शोध (होगन, बैबकॉक): नेतृत्व के अध्ययनों में, तुलसीदास जी द्वारा बताए गए ये चार अवगुण — अनियंत्रित वासना, आवेगी क्रोध, अहंकार और अतृप्त संचय-प्रवृत्ति — सफल व्यक्तियों के पतन के चार सबसे सामान्य कारण माने गए हैं। आत्म-जागरूकता के अभाव में इन विकारों से ग्रस्त नेतृत्वकर्ता अंततः अपने द्वारा निर्मित साम्राज्य को नष्ट कर लेते हैं, ठीक वैसे ही जैसे रावण ने अपनी सोने की लंका को नष्ट कर दिया था।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Gita Press Editorial Board (Hindi)
- Last updated
- 2026-10-23
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Collated with Kashi Nagari Pracharini Sabha recension.
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