कठोपनिषद्

Vallī 4श्लोक 12/1580%

Katha Upanishad 4.12

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ।ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते ।एतद्वै तत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अंगुष्ठ-मात्र पुरुष शरीर के मध्य में आत्मा में स्थित है — भूत-भविष्य का स्वामी। उसे जानकर मनुष्य फिर किसी से घृणा नहीं करता। यही वह है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

The Person of the size of a thumb dwells in the middle of the body — the lord of past and future. From him on there is no aversion. This indeed is That.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

अंगुष्ठ-मात्र पुरुष: अँगूठे के परिमाण वाला यह चेतन पुरुष इस शरीर के मध्य भाग में (हृदय-कमल में) स्थित है। वह भूत और भविष्य का साक्षात् स्वामी है। उसे जान लेने के बाद मनुष्य कभी किसी से अपनी रक्षा की चिंता नहीं करता। यही वह परम तत्त्व है (एतद्वै तत्)!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज उस परम आत्मा के हृदयस्थ व्यक्तिगत स्वरूप का साक्षात्कार कराते हैं: 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत्॥' — वह परमात्मा यद्यपि संपूर्ण ब्रह्मांड में अनंत और सर्वव्यापी है, किन्तु इस मनुष्य के शरीर में वह हृदय-आकाश के मध्य में 'अंगुष्ठ-मात्र' (अंगूठे के परिमाण की ज्योति के समान) अत्यंत स्पष्ट रूप से अनुभूत होता है। वह समय (भूत और भविष्य) का साक्षात् स्वामी है। जब कोई साधक अपने भीतर जल रही इस नित्य ज्योति को पहचान लेता है, तो वह संसार के किसी भी भय से कभी विचलित नहीं होता। यही वह परब्रह्म है। यहाँ 'अंगुष्ठ-मात्र' कोई भौतिक माप नहीं है; यह हृदय-कमल के उस सूक्ष्म स्थान का सूचक है जहाँ साधक ध्यान की गहराई में चेतना को एक अत्यंत तेजस्वी, स्थिर और शांत ज्योति के रूप में अनुभव करता है। जब आपका ध्यान सहस्रों दिशाओं से सिमटकर हृदय के इस एक बिंदु पर केंद्रित होता है, तो आपको यह विस्मयकारी बोध होता है कि जिस ईश्वर को आप बाहर आकाश में खोज रहे थे, वह तो आपके अपने ही सीने में एक शांत ज्योति बनकर आदि-अनादि काल से जगमगा रहा है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **हृदय-ज्योति का ध्यान (Heart Meditation)**: प्रतिदिन ध्यान में अपने हृदय के केंद्र में अंगूठे के आकार की एक अत्यंत तेजस्वी, शांत और सुनहरी ज्योति की कल्पना करें और उसमें अपनी चेतना को स्थिर करें। - **समय के भय से मुक्ति**: स्वयं को उस ज्योति के रूप में अनुभव करें जो भूत और भविष्य की सीमाओं से परे है; उम्र बीतने की चिंता छोड़ें। - **आत्म-विश्वास में स्थिति**: जब साक्षात् ईश्वर आपके हृदय में अंगुष्ठ-मात्र ज्योति बनकर बैठा है, तो स्वयं को कभी हीन, लाचार या कमजोर न समझें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं परमात्मा को केवल बाहर के मंदिरों और ग्रंथों में ही खोज रहा हूँ, अथवा मैंने अपनी हृदय-गुहा में जगमगा रही उस अंगुष्ठ-मात्र दिव्य ज्योति का दर्शन किया है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

हृदय-केंद्रित चेतना और कायिक अनुनाद: उपनिषदों में हृदय-गुहा को चेतना के व्यक्तिगत प्रकटीकरण का केंद्र (हृदय-आकाश) माना गया है, जहाँ अंगुष्ठ-मात्र परिमाण में साक्षी सत्ता का अनुभव होता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 13.2

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

Translation / Meaning (भावार्थ)

Know Me as the knower of the field (purusha) in all fields (prakriti). Understanding of the field and its knower is true knowledge.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next