Matsya Purana
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

588 श्लोकभाग 5/9 · श्लोक 259–326

पूर्ण अध्याय पाठ68 श्लोक

अध्याय 154

श्लोक 259

नमः शिवायास्तु निरामयाय नमः शिवायास्तु मनोमयाय नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्तकृपापराय

namaḥ śivāyāstu nirāmayāya namaḥ śivāyāstu manomayāya namaḥ śivāyāstu surārcitāya tubhyaṃ sadā bhaktakṛpāparāya

हिन्दी अर्थ

एवं तु हैवसम्पन्नस्तथा पौरुषसंयुतः। देशकालोपपन्नां तु यात्रां कुर्यान्नराधिपः एवं देशं च कालं च ज्ञात्वा यात्रां प्रयोजयेत्। पदातिनागबहुलां सेनां प्रावृषि योजयेत्

English

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अध्याय 154

श्लोक 260

नमो भवायास्तु भवोद्भवाय नमो ऽस्तु ते ध्वस्तमनोभवाय नमो ऽस्तु ते गूढमहाव्रताय नमो ऽस्तु मायागहनाश्रयाय

namo bhavāyāstu bhavodbhavāya namo 'stu te dhvastamanobhavāya namo 'stu te gūḍhamahāvratāya namo 'stu māyāgahanāśrayāya

हिन्दी अर्थ

जो दिव्य, अन्तरिक्ष एवं पृथ्वीजन्य उत्पातोंसे पीडित, हाथ- पैर आदि छः इन्द्रियोंकी पीड़ासे संतप्त तथा ग्रहोंद्वारा पीड़ित हो, ऐसे शत्रु राजापर विजय-यात्रा करनी चाहिए। जिस दिशामें जलती हुई उल्का गिरती है, जिस दिशामें भूकम्पादि उत्पात अधिक होते हैं तथा पुच्छल तारा उदित होता है, उसी दिशामें राजाको विजयार्थ यात्रा करनी चाहिए। जो अपनी सेनाके विद्रोहसे युक्त, दुर्भिक्षसे पीड़ित तथा आन्तरिक विद्रोहसे प्रभावित हो, ऐसे शत्रुपर राजाको तुरंत आक्रमण कर देना चाहिए। जिसके देशमें ढील, मक्खी, कोचड़ और गंदगीकी बहुतायत हो, जो

English

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अध्याय 154

श्लोक 261

नमो ऽस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमो ऽस्तु सिद्धाय पुरातनाय नमो ऽस्तु कालाय नमः कलाय नमो ऽस्तु ते ज्ञानवरप्रदाय

namo 'stu śarvāya namaḥ śivāya namo 'stu siddhāya purātanāya namo 'stu kālāya namaḥ kalāya namo 'stu te jñānavarapradāya

हिन्दी अर्थ

हो-ऐसे शत्रुको वशमें कर लेना उचित है जिस राजाको प्रजा या सेनानायक उसका शत्रु हो गया हो अथवा उसके मन्त्री-सेना आदिमें भी परस्पर विद्वेष हो, वह स्वयं किसी विपत्तिमें पड़ गया हो, ऐसे शत्रुपर अपनी सेनाको चढ़ाईका आदेश दे देना चाहिए।

English

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अध्याय 154

श्लोक 262

नमो ऽस्तु ते कालकलातिगाय नमो निसर्गामलभूषणाय नमो ऽस्त्वमेयान्धकमर्दकाय नमः शरण्याय नमो ऽगुणाय

namo 'stu te kālakalātigāya namo nisargāmalabhūṣaṇāya namo 'stvameyāndhakamardakāya namaḥ śaraṇyāya namo 'guṇāya

हिन्दी अर्थ

जिस राजाके सैनिकोंके अस्त्र एवं अङ्ग प्रस्फुरित न होते हों तथा उन्हें बुरे स्वप्न दीख पड़ते हों, उनपर धावा बोल देना चाहिए। उत्साह एवं पराक्रमसे संयुक्त तथा अपनेमें अनुराग करनेवाली, संतुष्ट एवं परिपुष्ट विशाल सेनासे सम्पन्न राजा शत्रुओंपर आक्रमण कर दे। शत्रुकी राजधानीपर चढ़ाई करनी चाहिए। जन्म-नक्षत्र आदि छः नक्षत्रोंके शुद्ध होनेपर, शुभ ग्रहोंको स्थिति अनुकूल होनेपर तथा प्रश्‍न करनेपर शुभदायक उत्तर मिलनेपर राजाको शत्रुओंपर आक्रमण करना चाहिए।

English

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अध्याय 154

श्लोक 263

नमो ऽस्तु ते भीमगणानुगाय नमो ऽस्तु नानाभुवनादिकर्त्रे नमो ऽस्तु नानाजगतां विधात्रे नमो ऽस्तु ते चित्रफलप्रयोक्त्रे

namo 'stu te bhīmagaṇānugāya namo 'stu nānābhuvanādikartre namo 'stu nānājagatāṃ vidhātre namo 'stu te citraphalaprayoktre

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार हैवबल तथा पराक्रमसे संयुक्त राजा देश एवं कालके अनुसार शत्रुपर चढ़ाई करे। स्थलपर मगर हाथीके वशमें होता है, किंतु जलमें हाथी नाकके वशमें हो जाता है। इसी प्रकार रात्रिमें काक उल्लूके अधीन हो जाता है, किंतु दिनमें उल्लू काकके वशमें होता है। इसी प्रकार राजाको देश एवं कालका विचारकर शत्रुपर विजय-यात्रा करनी चाहिए॥ १२-१८ ३॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 264

सर्वावसाने ह्यविनाशनेत्रे नमो ऽस्तु चित्राध्वरभागभोक्त्रे नमो ऽस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे नमः सदा ते भवसङ्गहर्त्रे

sarvāvasāne hyavināśanetre namo 'stu citrādhvarabhāgabhoktre namo 'stu bhaktābhimatapradātre namaḥ sadā te bhavasaṅgahartre

हिन्दी अर्थ

राजाको वर्षा-ऋतुमें पैदल और हाथियोंकी सेनाको, हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें अधिक रथ और घोड़ोंसे सम्पन्न खरोष्ट्रबहुलां सेनां तथा ग्रीष्मे नराधिपः॥ २० सेनाको ग्रीष्म-ऋतुमें गधे और ऊँटोंसे भरी हुई सेनाको तथा सेना पदातिबहुला यस्य स्यात् पृथिवीपतेः

English

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अध्याय 154

श्लोक 265

अनन्तरूपाय सदैव तुभ्यम् असह्यकोपाय नमो ऽस्तु तुभ्यम् शशाङ्कचिह्नाय सदैव तुभ्यम् अमेयमानाय नमः स्तुताय

anantarūpāya sadaiva tubhyam asahyakopāya namo 'stu tubhyam śaśāṅkacihnāya sadaiva tubhyam ameyamānāya namaḥ stutāya

हिन्दी अर्थ

किञ्चरित्पङ्के तथा यायाद् बहुनागो नराधिपः। रथाश्वबहुलो यायाच्छत्रुं समपथस्थितम् तमाश्रयन्तो बहुलास्तांस्तु राजा प्रपूजयेत्। खरोष्ट्रबहुलो राजा शत्रुर्बन्धेन संस्थितः

English

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अध्याय 154

श्लोक 266

वृषेन्द्रयानाय पुरान्तकाय नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमो ऽस्तु भक्त्याभिमतप्रदाय नमो ऽस्तु सर्वार्तिहराय तुभ्यम्

vṛṣendrayānāya purāntakāya namaḥ prasiddhāya mahauṣadhāya namo 'stu bhaktyābhimatapradāya namo 'stu sarvārtiharāya tubhyam

हिन्दी अर्थ

यवसेन्धनसंयुक्तः कालः पार्थिव हैमनः। शरद्वसन्तौ धर्मज्ञ कालौ साधारणौ स्मृतौ विज्ञाय राजा हितदेशकालौ हैवं त्रिकालं च तथैव बुदध्वा। यायात् परं कालविदां मतेन वसन्त और शरद्-ऋतुमें चतुरंगिणी सेनाको यात्रामें लगाना उचित है । जिस राजाके पास पैदल सेना अधिक हो, उसे विषम स्थानपर स्थित शत्रुपर आक्रमण करना चाहिए। राजाको चाहिए कि जो शत्रु अधिक वृक्षोंसे युक्त देशमें

English

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अध्याय 154

श्लोक 267

चराचराचारविचारवर्यम् आचार्यम् उत्प्रेक्षितभूतसर्गम् त्वामिन्दुमौलिं शरणं प्रपन्ना प्रियाप्रमेयं महतां महेशम्

carācarācāravicāravaryam ācāryam utprekṣitabhūtasargam tvāmindumauliṃ śaraṇaṃ prapannā priyāprameyaṃ mahatāṃ maheśam

हिन्दी अर्थ

या कुछ कोचड़वाले स्थानपर स्थित हो, उसपर हाथियोंकी सेनाके साथ चढ़ाई करे । समतल भूमिमें स्थित शत्रुपर रथ और घोड़ोंकी सेना साथ लेकर चढ़ाई करनी चाहिए। जिस शत्रुओंके पास बहुत बड़ी सेना हो, राजाको चाहिए कि उनका आदर-सत्कार करे, अर्थात् उनके साथ संधि कर ले। वर्षा-ऋतुमें अधिक संख्यामें गधे और ऊँटोंकी सेना रखनेवाला राजा यदि शत्रुके बन्धनमें पड़ गया हो तो उस अवस्थामें भी उसे वर्षा-ऋतुमें चढ़ाई करनी चाहिए।

English

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अध्याय 154

श्लोक 268

प्रयच्छ मे कामयशःसमृद्धिं पुनः प्रभो जीवतु कामदेवः प्रियं विना त्वां प्रियजीवितेषु त्वत्तो ऽपरः को भुवनेष्विहास्ति

prayaccha me kāmayaśaḥsamṛddhiṃ punaḥ prabho jīvatu kāmadevaḥ priyaṃ vinā tvāṃ priyajīviteṣu tvatto 'paraḥ ko bhuvaneṣvihāsti

हिन्दी अर्थ

जिस देशमें बरफ गिरती हो, वहाँ राजा ग्रीष्म-ऋतुमें आक्रमण करे। पार्थिव! हेमन्त और शिशिर-ऋतुओंका समय काष्ठ तथा घास आदि साधनोंसे युक्त होनेसे यात्राके लिये बहुत अनुकूल रहता है। धर्मज्ञ! इसी प्रकार शरद् और वसन्त-ऋतुओंके काल भी अनुकूल माने गये हैं। राजाको देश-काल और त्रिकालज्ञ ज्योतिषीसे यात्राकी स्थितिको भलीभाँति समझकर उसी प्रकार पुरोहित और मन्त्रियोंके संचिन्त्य सार्धं द्विजमन्त्रविद्धिः ॥ २७ साथ परामर्श कर विजय-यात्रा करनी चाहिए ॥ १९--२७॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 269

प्रभुः प्रियायाः प्रसवः प्रियाणां प्रणीतपर्यायपरापरार्थः त्वमेवमेको भुवनस्य नाथो दयालुरुन्मूलितभक्तभीतिः

prabhuḥ priyāyāḥ prasavaḥ priyāṇāṃ praṇītaparyāyaparāparārthaḥ tvamevameko bhuvanasya nātho dayālurunmūlitabhaktabhītiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकालयोज्यचिन्ता नाम चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राकाल-विधान नामक दो सौ चालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 154

श्लोक 270

इत्थं स्तुतः शंकर ईड्य ईशो वृषाकपिर्मन्मथकान्तया तु तुतोष दोषाकरखण्डधारी उवाच चैनां मधुरं निरीक्ष्य

itthaṃ stutaḥ śaṃkara īḍya īśo vṛṣākapirmanmathakāntayā tu tutoṣa doṣākarakhaṇḍadhārī uvāca caināṃ madhuraṃ nirīkṣya

हिन्दी अर्थ

अङ्ग स्फुरणके शुभाशुभ फल सर्वधर्मभृतां श्रेष्ठ त्वं हि सर्वविदुच्यसे मनुजीने पूछा--सम्पूर्ण धर्मज्ञोमें श्रेष्ठ भगवन्!

English

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अध्याय 154

श्लोक 271

भवितेति च कामो ऽयं कालात्कान्तो ऽचिरादपि अनङ्ग इति लोकेषु स विख्यातिं गमिष्यति

bhaviteti ca kāmo 'yaṃ kālātkānto 'cirādapi anaṅga iti lokeṣu sa vikhyātiṃ gamiṣyati

हिन्दी अर्थ

चूँकि आप सर्वज्ञ कहे जाते हैं, इसलिये अब आप मुझे शुभाशुभसूचक शकुनोंके लक्षण बतलाइये॥ १॥ . मत्स्यभगवानूने कहा--राजन्! शरीरके दाहिने भागमें स्फुरण होना शुभ तथा पीठ, हृदय और बायें

English

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अध्याय 154

श्लोक 272

इत्युक्ता शिरसावन्द्य गिरिशं कामवल्लभा जगामोपवनं रम्यं रतिस्तु हिमभूभृतः

ityuktā śirasāvandya giriśaṃ kāmavallabhā jagāmopavanaṃ ramyaṃ ratistu himabhūbhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

भागका स्फुरण अशुभ फलदायक होता है मनुजीने पूछा--भगवन्! अङ्गोंका स्फुरण जिस शुभा-शुभकी सूचना देनेवाला होता है, उसे मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये, जिससे मैं भूतलपर उसका ज्ञाता हो जाऊँ

English

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अध्याय 154

श्लोक 273

रुरोद चापि बहुशो दीना रम्ये स्थले तु सा मरणव्यवसायात्तु निवृत्ता सा हराज्ञया

ruroda cāpi bahuśo dīnā ramye sthale tu sā maraṇavyavasāyāttu nivṛttā sā harājñayā

हिन्दी अर्थ

योषिदभोगोऽपाङ्गदेशे श्रवणान्ते प्रियश्रुतिः नासिकायां प्रीतिसौख्यं प्रजाप्तिरधरोष्ठजे। कण्ठे तु भोगलाभः स्याद् भोगवृद्धिरथांसयो:

English

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अध्याय 154

श्लोक 274

अथ नारदवाक्येन चोदितो हिमभूधरः कृताभरणसंस्कारां कृतकौतुकमङ्गलाम्

atha nāradavākyena codito himabhūdharaḥ kṛtābharaṇasaṃskārāṃ kṛtakautukamaṅgalām

हिन्दी अर्थ

मत्स्यभगवान् बोले--रविनन्दन ! सिरके स्फुरणसे पृथ्वीका लाभ होता है, ललाटके स्फुरणसे स्थानकी वृद्धि होती है, भौंह और नासिकाके स्फुरणसे प्रियजनोंका समागम होता है । राजन्! नेत्रोके फड़कनेसे सेवककी तथा नेत्रोंके समीप स्फुरण होनेसे धनकी प्राप्ति होती है। नेत्रोके मध्य भागमें स्फुरण होनेसे उत्कण्ठा बढ़ती है, ऐसा विचक्षणोंने अनुभव किया है। नेत्र-पलकोंके फड्कनेसे संग्राममें शीघ्र ही विजय प्राप्त होती है। नेत्रापाड्रोंके स्फुरणसे स्त्री-लाभ, कानके फड़कनेसे प्रियवार्ता- श्रवण, नासिका-स्फुरणसे प्रीति एवं सौख्य, निचले होंठके फड़कनेसे संतान-प्राप्ति, कण्ठ-स्फुरणसे भोग- लाभ तथा दोनों कंधोंके स्फुरणसे भोगकी वृद्धि होती

English

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अध्याय 154

श्लोक 275

स्वर्गपुष्पकृतापीडां शुभ्रचीनांशुकाम्बराम् शराभ्यां संयुतां शैलो गृहीत्वा स्वसुतां ततः

svargapuṣpakṛtāpīḍāṃ śubhracīnāṃśukāmbarām śarābhyāṃ saṃyutāṃ śailo gṛhītvā svasutāṃ tataḥ

हिन्दी अर्थ

है। बाहुओंके फड़कनेसे मित्र-स्नेहकी प्राप्ति, हाथके स्फुरणसे धनकी प्राप्ति, पीठके फड़कनेसे युद्धमें पराजय तथा छातीके स्फुरणसे विजय-प्राप्ति होती है दोनों कुक्षियोंक फड़कनेसे प्रेमकी वृद्धि कही गयी है, स्तनके स्फुरणसे स्त्रीसे संतानोत्पत्ति होती है। राजन्! नाभिके स्फुरणसे स्थानसे च्युत होना पड़ता है, आँतके फड़कनेसे धनकी प्राप्ति तथा जानुके संधिभागके

English

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अध्याय 154

श्लोक 276

जगाम शुभयोगेन तदा सम्पूर्णमानसः सकाननान्युपाक्रम्य वनान्युपवनानि च

jagāma śubhayogena tadā sampūrṇamānasaḥ sakānanānyupākramya vanānyupavanāni ca

हिन्दी अर्थ

स्फुरणसे बलवान् शत्रुओंके साथ संधि हो जाती है। रविनन्दन! फिल्लियोंके फड़कनेसे राजाके देशके किसी भागका नाश होता है। नृप! दोनों पैरोके स्फुरणसे उत्तम स्थानकी प्राप्ति होती है। राजन्! पैरोके तलुओंके फड्कनेसे लाभदायिनी यात्रा होती है। अङ्गस्फुरणके समान ही लक्षण (कालेदाग) एवं पिटकों (छोटे मांसपिण्ड, जो जन्मसे ही बालकोंके आङ्गोंमें उत्पन्न होते हैं)-के भी 'फलाफलको जानना चाहिए। स्त्रियोंके लिये ये सभी फलागम विपरीत होते हैं। बायें भागके अप्रशस्त अङ्गोंके स्फुरणसे विशेष अशुभ होता है। इसी प्रकार दाहिने भागमें भी शुभ आङ्गोंके स्फुरणसे विशेष शुभ होता है। इस शुभ एवं अशुभ फलके सिद्धि-कथनके अतिरिक्त

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 277

ददर्श रुदतीं नारीम् अप्रतर्क्यमहौजसम् रूपेणासदृशीं लोके रम्येषु वनसानुषु

dadarśa rudatīṃ nārīm apratarkyamahaujasam rūpeṇāsadṛśīṃ loke ramyeṣu vanasānuṣu

हिन्दी अर्थ

अनिष्ट चिह्के प्रकट होनेपर ब्राह्मणोंको सुवर्णदान देकर कार्य सुवर्णेन तु तर्पणं स्यात्॥ १४ संतुष्ट करना चाहिए

English

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अध्याय 154

श्लोक 278

कौतुकेन परामृश्य तां दृष्ट्वा रुदतीं गिरिः उपसर्प्य ततस्तस्या निकटे सो ऽभ्यपृच्छत

kautukena parāmṛśya tāṃ dṛṣṭvā rudatīṃ giriḥ upasarpya tatastasyā nikaṭe so 'bhyapṛcchata

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्तकदेहस्पन्दनं नामैकचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अङ्गस्फुरण नामक दो सौ एकतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ शुभाशुभ स्वप्नोंके लक्षण

English

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अध्याय 154

श्लोक 279

कासि कस्यासि कल्याणि किमर्थं चापि रोदिषि नैतदल्पमहं मन्ये कारणं लोकसुन्दरि

kāsi kasyāsi kalyāṇi kimarthaṃ cāpi rodiṣi naitadalpamahaṃ manye kāraṇaṃ lokasundari

हिन्दी अर्थ

स्वप्नाख्यानं कथं देव गमने प्रत्युपस्थिते। हश्यन्ते विविधाकाराः कथं तेषां फलं भवेत्॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 280

सा तस्य वचनं श्रुत्वा उवाच मधुना सह रुदती शोकजननं श्वसती दैन्यवर्धनम्

sā tasya vacanaṃ śrutvā uvāca madhunā saha rudatī śokajananaṃ śvasatī dainyavardhanam

हिन्दी अर्थ

चूर्णनं मूर्ध्नि कांस्यानां मुण्डनं नग्नता तथा। मलिनाम्बरधारित्वमभ्यङ्गः पङ्कदिग्धता भक्षणं पक्षिमत्स्यानां तैलस्य कृसरस्य च। नर्तनं हसनं चैव विवाहो गीतमेव च पङ्कोदकेन च तथा महीतोयेन चाप्यथ। मातुः प्रवेशो जठरे चितारोहणमेव च

English

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अध्याय 154

श्लोक 281

कामस्य दयितां भार्यां रतिं मां विद्धि सुव्रत गिरावस्मिन्महाभाग गिरिशस्तपसि स्थितः

kāmasya dayitāṃ bhāryāṃ ratiṃ māṃ viddhi suvrata girāvasminmahābhāga giriśastapasi sthitaḥ

हिन्दी अर्थ

देवद्विजातिभूपालगुरूणां क्रोध एव च। आलिङ्गनं कुमारीणां पुरुषाणां च मैथुनम् 'काषायवस्त्रधारित्वं तद्वत् स्त्रीक्रीडनं तथा। स्नेहपानावगाहौ च रक्तमाल्यानुलेपनम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 282

तेन प्रत्यूहरुष्टेन विस्फार्यालोक्य लोचनम् दग्धो ऽसौ झषकेतुस्तु मम कान्तो ऽतिवल्लभः

tena pratyūharuṣṭena visphāryālokya locanam dagdho 'sau jhaṣaketustu mama kānto 'tivallabhaḥ

हिन्दी अर्थ

मनुजीने पूछा--देव! यात्राके समयके स्वप्नका वृत्तान्त कैसा है? विविध प्रकारके वैसे यों भी स्वप्न अनेक दिखायी पड़ते हैं, उनका फल कैसा होता है (बतलायें) मत्स्यभगवानूने कहा--मनो! अब मैं स्वप्नोंके शुभाशुभ लक्षणोंको बतला रहा हूँ! नाभिके अतिरिक्त अन्य आङ्गोंमें तृण एवं वृक्षका उगना, मस्तकपर कांसेका कूटा जाना, मुण्डन, नग्नता, मलिन वस्त्रोंका धारण करना, तेल लगाना, कीचमें धँसना, लेप, ऊँचे स्थानसे गिरना, झूलेपर चढ़ना, कीचड़ और लोहेको इकट्ठा करना, घोड़ोंको मारना, लाल पुष्पवाले वृक्षों, मण्डल, शूकर, रीछ, गधे और ऊँटोंपर चढ़ना, पक्षी, मछली, तेल और खिचड़ीका भोजन,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 283

अहं तु शरणं याता तं देवं भयविह्वला स्तुतवत्यथ संस्तुत्या ततो मां गिरिशो ऽब्रवीत्

ahaṃ tu śaraṇaṃ yātā taṃ devaṃ bhayavihvalā stutavatyatha saṃstutyā tato māṃ giriśo 'bravīt

हिन्दी अर्थ

नाचना, हँसना, विवाह, गायन, वीणाको छोड़कर अन्य वाद्योंका स्वागत करना, जलके सोतेमें स्नान करनेके लिये जाना, गोबर लगाकर जलमें स्नान करना, इसी प्रकार कोचड्युक्त जलमें तथा पृथ्वीके थोड़े जलमें नहाना, माताके उदरमें प्रवेश करना, चितापर चढ़ना, इन्द्रध्वजका गिरना, चन्द्रमा और सूर्यका पतन, दिव्य, अन्तरिक्ष तथा भौम उत्पातोंका दर्शन, देवता, द्विजाति, राजा और गुरुका क्रोध, कुमारी कन्याओंका आलिङ्गन, पुरुषोंके साथ सम्भोग, अपने

English

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अध्याय 154

श्लोक 284

तुष्टो ऽहं कामदयिते कामो ऽयं ते भविष्यति त्वत्स्तुतिं चाप्यधीयानो नरो भक्त्या मदाश्रयः लप्स्यते काङ्क्षितं कामं निवर्त्य मरणादितः

tuṣṭo 'haṃ kāmadayite kāmo 'yaṃ te bhaviṣyati tvatstutiṃ cāpyadhīyāno naro bhaktyā madāśrayaḥ lapsyate kāṅkṣitaṃ kāmaṃ nivartya maraṇāditaḥ

हिन्दी अर्थ

ही शरीरका नाश, विरेचन, बमन, दक्षिण दिशाकी यात्रा, किसी व्याधिसे पीड़ित होना, फलों तथा पुष्पोंकी हानि, घरोंका गिरना, घरोंकी सफाई होना, पिशाच, मांसभक्षी जीव, वानर, रीछ और मनुष्यके साथ क्रीडा करना, शत्रुसे पराजित होना या उसकी ओरसे किसी प्रकारकी आपत्तिका प्रकट होना, काषाय वस्त्रको धारण करना अथवा वैसे वस्त्रवाली स्त्रीके साथ क्रीडा करना, तेल-पान या उसीमें स्नान करना, लाल पुष्प और लाल चन्दनको धारण करना तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से दुःस्वप्न कहे गये हैं। इन्हें देखनेके बाद दूसरेसे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 285

प्रतीक्षन्ती च तद्वाक्यम् आशावेशादिभिर्ह्यहम् शरीरं परिरक्षिष्ये कंचित्कालं महाद्युते

pratīkṣantī ca tadvākyam āśāveśādibhirhyaham śarīraṃ parirakṣiṣye kaṃcitkālaṃ mahādyute

हिन्दी अर्थ

एषां संकथनं धन्यं भूयः प्रस्वापनं तथा॥ १५ कह देना तथा पुनः सो जाना कल्याणकारक है ॥ २--१५॥ स्तुतिश्च वासुदेवस्य तथा तस्यैव पूजनम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 286

इत्युक्तस्तु तदा रत्या शैलः संभ्रमभीषितः पाणावादाय हि सुतां गन्तुमैच्छत्स्वकं पुरम्

ityuktastu tadā ratyā śailaḥ saṃbhramabhīṣitaḥ pāṇāvādāya hi sutāṃ gantumaicchatsvakaṃ puram

हिन्दी अर्थ

नागेन्द्रमोक्षश्रवणं ज्ञेयं दुःस्वप्ननाशनम्। स्वप्नास्तु प्रथमे यामे संवत्सरविपाकिनः षड्भिर्मासैरितीये तु त्रिभिर्मासैस्तृतीयके। चतुर्थे मासमात्रेण पश्यतो नात्र संशयः तस्माच्छोभनके स्वप्ने पश्चात् स्वप्नो न शस्यते

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 287

भाविनो ऽवश्यभावित्वाद् भवित्री भूतभाविनी लज्जमाना सखिमुखैर् उवाच पितरं गिरिम्

bhāvino 'vaśyabhāvitvād bhavitrī bhūtabhāvinī lajjamānā sakhimukhair uvāca pitaraṃ girim

हिन्दी अर्थ

भक्षणं चार्द्रमांसानां मत्स्यानां पायसस्य च प्रसादो देवविप्रेभ्यो गुरुभ्यश्च तथा शुभः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 288

दुर्भाग्येण शरीरेण किं ममानेन कारणम् कथं च तादृशं प्राप्तं सुखं मे स पतिर्भवेत्

durbhāgyeṇa śarīreṇa kiṃ mamānena kāraṇam kathaṃ ca tādṛśaṃ prāptaṃ sukhaṃ me sa patirbhavet

हिन्दी अर्थ

मरणं वह्विदाहश्च वह्निदाहो गृहादिषु तथोदकानां तरणं तथा विषमलङ्कनम् (ऐसे स्वप्न देखनेपर) खली लगाकर स्नान, तिलसे हवन और ब्राह्मणोंका पूजन करे। भगवान् वासुदेवकी स्तुति उनकी पूजा और गजेन्द्रमोक्षकी कथाका श्रवण आदिका दु:स्वप्नका नाशक समझना चाहिए। रात्रिके

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 289

तपोभिः प्राप्यते ऽभीष्टं नासाध्यं हि तपस्यतः दुर्भगत्वं वृथा लोको वहते सति साधने

tapobhiḥ prāpyate 'bhīṣṭaṃ nāsādhyaṃ hi tapasyataḥ durbhagatvaṃ vṛthā loko vahate sati sādhane

हिन्दी अर्थ

पहले पहरमें देखे गये स्वप्न देखनेवालेको निःसंदेह एक वर्षमें, दूसरे पहरमें देखे गये छः महीनेमें, तीसरे पहरमें देखे गये तीन महीनेमें तथा चतुर्थ पहरमें देखे गये एक महीनेमें फल देते हैं। सूर्योदयके समय देखे जानेपर दस दिनमें ही फल प्राप्त होता है। यदि एक ही रातमें शुभ और अशुभ--दोनों प्रकारके स्वप्न दिखायी पड़ें तो उनमें जो पीछे दीख पड़ा हो, उसीका फल कहना चाहिए। इसलिये शुभ स्वप्नके देखनेपर मनुष्यको

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 290

जीविताद्दुर्भगाच्छ्रेयो मरणं ह्यतपस्यतः भविष्यामि न संदेहो नियमैः शोषये तनुम्

jīvitāddurbhagācchreyo maraṇaṃ hyatapasyataḥ bhaviṣyāmi na saṃdeho niyamaiḥ śoṣaye tanum

हिन्दी अर्थ

पुनः नहीं सोना चाहिए॥ १६--२० ॥ इनपर आरोहण करना हितकारक है तथा श्वेत पुष्पोंवाले वृक्षोंपर चढ़ना शुभप्रदं है। नाभिमें वृक्ष और तृणका उत्पन्न होना, अनेक बाहुओंका होना, अनेक सिरोंका होना, फलदान, उद्धिज्जोंका दर्शन, सुन्दर श्वेत माला धारण करना, श्वेत वस्त्र पहनना, चन्द्रमा, सूर्य और ताराओंको हाथसे पकड़ना या उन्हें स्वच्छ करना, इन्द्रधनुषका आलिङ्गन करना या उसे ऊपर उठाना, पृथ्वी और समुद्रोंको निगलना, शत्रुओंका संहार करना, संग्राम, विवाद और

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 291

तपसि भ्रष्टसंदेह उद्यमो ऽर्थजिगीषया साहं तपः करिष्यामि यदहं प्राप्य दुर्लभा

tapasi bhraṣṭasaṃdeha udyamo 'rthajigīṣayā sāhaṃ tapaḥ kariṣyāmi yadahaṃ prāpya durlabhā

हिन्दी अर्थ

जूएमें जीतना, कच्चा मांस, मछली और खीरका खाना, रक्तका दर्शन या रक्तसे स्नान, मदिरा, रक्त, मद्य अथवा दुग्धका पीना, अपनी आँतोंसे पृथ्वीको बाँधना, निर्मल आकाशको देखना, भैंस, गाय, सिंहिनी, हथिनी तथा घोडियोंको मुखसे दुहना, देवता, गुरु और ब्राह्मणोंकी प्रसन्नता-ये स्वप्न शुभदायक होते हँ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 292

इत्युक्तः शैलराजस्तु दुहित्रा स्नेहविक्लवः उवाच वाचा शैलेन्द्रः स्नेहगद्गदवर्णया

ityuktaḥ śailarājastu duhitrā snehaviklavaḥ uvāca vācā śailendraḥ snehagadgadavarṇayā

हिन्दी अर्थ

राजन्! गौओंके सींगसे चूनेवाले अथवा चन्द्रमासे गिरे हुए जलसे अभिषेक होना राज्यप्रद समझना चाहिए । राज्याभिषेक, सिरका करना, मृत्यु, अग्निका प्रज्वलित होना या घरमें आग लगना, राज्यचिह्नोंकी प्राप्ति, वीणाका स्वर सुनायी पड़ना, जलमें तैरना, दुर्गम स्थानॉंको पार करना दर्शनं देवतानां च विमलानां तथाम्भसाम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 293

उमेति चपले पुत्रि न क्षमं तावकं वपुः सोढुं क्लेशस्वरूपस्य तपसः सौम्यदर्शने

umeti capale putri na kṣamaṃ tāvakaṃ vapuḥ soḍhuṃ kleśasvarūpasya tapasaḥ saumyadarśane

हिन्दी अर्थ

स्वप्नानि वै धर्मभृतां वरिष्ठ घरमें हथिनी, घोड़ी तथा गायोंका बच्चा देना, घोड़ेपर

English

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अध्याय 154

श्लोक 294

भावीन्यभिविचार्याणि पदार्थानि सदैव तु भाविनो ऽर्था भवन्त्येव हठेनानिच्छतो ऽपि वा

bhāvīnyabhivicāryāṇi padārthāni sadaiva tu bhāvino 'rthā bhavantyeva haṭhenānicchato 'pi vā

हिन्दी अर्थ

सवार होना तथा रोना-ये स्वप्न शुभदायक होते हैं। सुन्दरी स््त्रियोंको प्राप्ति तथा उनका आलिङ्गन, जंजीरोंद्वारा बन्धन, मलका लेपन, जीवित राजाओं तथा मित्रोंका दर्शन, देवताओं तथा निर्मल जलका दर्शन- ये स्वप्न शुभ कहे गये हैं। धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ राजन्! मनुष्य इन शुभदायक स्वप्नोंको देखकर बिना प्रयासके ही निश्चितरूपमें धन प्राप्त कर लेता है तथा रोगग्रस्त व्याधेर्विमोक्षं च तथातुरोऽपि॥ ३५ व्यक्ति भी रोगसे मुक्त हो जाता है॥ २९--३५॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 295

तस्मान्न तपसा ते ऽस्ति बाले किंचित्प्रयोजनम् भवनायैव गच्छामश् चिन्तयिष्यामि तत्र वै

tasmānna tapasā te 'sti bāle kiṃcitprayojanam bhavanāyaiva gacchāmaś cintayiṣyāmi tatra vai

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते स्वप्नाध्यायोनाम द्विचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें यात्राप्रसंगमें स्वप्नविवेक नामक दो सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 296

इत्युक्ता तु यदा नैव गुहायाभ्येति शैलजा ततः स चिन्तयाविष्टो दुहितां प्रशशंस च

ityuktā tu yadā naiva guhāyābhyeti śailajā tataḥ sa cintayāviṣṭo duhitāṃ praśaśaṃsa ca

हिन्दी अर्थ

शुभाशुभ शकुनोंका निरूपण प्रशस्तांश्चैव सम्भाष्य सर्वानेतांश्च कीर्तय कार्पासश्च तृणं राजउ्शुष्कं गोमयमेव च

English

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अध्याय 154

श्लोक 297

ततो ऽन्तरिक्षे दिव्या वाग् अभूद्भुवनभूतले उमेति चपले पुत्रि त्वयोक्ता तनया ततः

tato 'ntarikṣe divyā vāg abhūdbhuvanabhūtale umeti capale putri tvayoktā tanayā tataḥ

हिन्दी अर्थ

इन्धनं च तथाङ्कारं गुडं तैलं तथाशुभम्। अभ्यक्तं मलिनं मुण्डं तथा नग्नं च मानवम् मुक्तकेशं रूजार्त च काषायाम्बरधारिणम्। उन्मत्तकं तथा सत्त्वं दीनं चाथ नपुंसकम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 298

उमेति नाम तेनास्या भुवनेषु भविष्यति सिद्धिं च मूर्तिमत्येषा साधयिष्यति चिन्तिताम्

umeti nāma tenāsyā bhuvaneṣu bhaviṣyati siddhiṃ ca mūrtimatyeṣā sādhayiṣyati cintitām

हिन्दी अर्थ

अयः पङ्कस्तथा चर्म केशबन्धनमेव च। तथैवोद्धतसाराणि पिण्याकादीनि यानि च चण्डालश्वपचाश्चैव राजबन्धनपालकाः। वधकाः पापकर्माणो गर्भिणी स्त्री तथैव च मनुजीने पूछा-- भगवन्! राजाओंके लिये यात्राके

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 299

इति श्रुत्वा तु वचनम् आकाशात्काशपाण्डुरः अनुज्ञाय सुतां शैलो जगामाशु स्वमन्दिरम्

iti śrutvā tu vacanam ākāśātkāśapāṇḍuraḥ anujñāya sutāṃ śailo jagāmāśu svamandiram

हिन्दी अर्थ

कौन-सी वस्तुएँ प्रशस्त मानी गयी हैं, उन सबका वर्णन कोजिये मत्स्यभगवानने कहा--राजन्! अनृपयुक्त ओषधियाँ, काला अन्न, कपास, तृण, सूखा गोबर, ईधन, अङ्गार, गुड़, तेल-ये सब अशुभ वस्तुएँ हैं । तेल लगाया हुआ, मलिन, मुण्डन कराया हुआ, नंगा, खुले

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 300

शैलजापि ययौ शैलम् अगम्यमपि दैवतैः सखीभ्यामनुयाता तु नियता नगराजजा

śailajāpi yayau śailam agamyamapi daivataiḥ sakhībhyāmanuyātā tu niyatā nagarājajā

हिन्दी अर्थ

बालोंवाला, रोगपीड़ित, काषाय वस्त्रधारी, पागल, दीन तथा नपुंसक व्यक्ति, लोहा, कीचड़, चमड़ा, केशका श्वपच, बन्धनमें डालनेवाले राजाके कर्मचारी, जल्लाद, पापी, गर्भिणी स्त्री, भूसी, राख, खोपड़ी, हड्डी, टूटे हुए सभी पात्र, खाली पात्र, लाश, सींगोंवाले पशु- गच्छेति पश्चाद् धर्मज्ञ पुरस्तात् तु विगर्हित:

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 301

शृङ्गं हिमवतः पुण्यं नानाधातुविभूषितम् दिव्यपुष्पलताकीर्णं सिद्धगन्धर्वसेवितम्

śṛṅgaṃ himavataḥ puṇyaṃ nānādhātuvibhūṣitam divyapuṣpalatākīrṇaṃ siddhagandharvasevitam

हिन्दी अर्थ

अन्ये शब्दाश्च येऽनिष्टरास्ते विपत्तिकरा अपि केशवं पूजयेद् विद्वान् स्तवेन मधुसूदनम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 302

नानामृगगणाकीर्णं भ्रमरोद्घुष्टपादपम् दिव्यप्रस्रवणोपेतं दीर्घिकाभिरलंकृतम्

nānāmṛgagaṇākīrṇaṃ bhramarodghuṣṭapādapam divyaprasravaṇopetaṃ dīrghikābhiralaṃkṛtam

हिन्दी अर्थ

जलजाः पक्षिणश्चैव मांसमत्स्याश्च पार्थिव गणिका च महाभाग दूर्वा चार्द्रं च गोमयम्। रुक्मं रूप्यं तथा ताम्रं सर्वरत्नानि चाप्यथ औषधानि च धर्मज्ञ यवाः सिद्धार्थकास्तथा। नुवाह्यमानं यानं च भद्रपीठं तथैव च

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 303

नानापक्षिगणाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् जलजस्थलजैः पुष्पैः प्रोत्फुल्लैरुपशोभितम्

nānāpakṣigaṇākīrṇaṃ cakravākopaśobhitam jalajasthalajaiḥ puṣpaiḥ protphullairupaśobhitam

हिन्दी अर्थ

खड्गं छत्रं पताका च मृदश्चायुधमेव च। राजलिङ्गानि सर्वाणि शवं रुदितवर्जितम् वायुः सशर्करो रूक्षः सर्वत्र समुपस्थितः। प्रतिलोमस्तथा नीचो विज्ञेयो भयकृद् द्विज

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 304

चित्रकन्दरसंस्थानं गुहागृहमनोहरम् विहङ्गसंघसंजुष्टं कल्पपादपसंकटम्

citrakandarasaṃsthānaṃ guhāgṛhamanoharam vihaṅgasaṃghasaṃjuṣṭaṃ kalpapādapasaṃkaṭam

हिन्दी अर्थ

अनुकूलो मृदुः स्निग्धः सुखस्पर्शः सुखावहः । ये तथा इनके अतिरिक्त और भी वस्तुएँ देखनेमें अशुभ मानी गयी हैं। वाद्योंके भयानक तथा बिना तालके रूखे स्वर भी अशुभ कहे गये हैं। धर्मज्ञ! सामनेसे "आओ '-- ऐसा शब्द कहना शुभ है, किंतु पीछेसे नहीं । इसी तरह पीछेसे “जाओ” यह कहना शुभ है, किंतु वही आगेसे कहना अशुभ है । कहाँ जा रहे हो, रुको, मत जाओ; तुम्हारे वहाँ जानेसे क्या लाभ ?'—इस प्रकारके जो दूसरे अनिष्ट शब्द हैं, वे सभी विपत्तिकारक हैं। ध्वजा, पताका आदिपर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 305

तत्रापश्यन्महाशाखं शाखिनं हरितच्छदम् सर्वर्तुकुसुमोपेतं मनोरथशतोज्ज्वलम्

tatrāpaśyanmahāśākhaṃ śākhinaṃ haritacchadam sarvartukusumopetaṃ manorathaśatojjvalam

हिन्दी अर्थ

मांसभक्षी पक्षियोंका बैठना, वाहनोंका फिसलना तथा वस्त्रका अटक जाना निन्दित माना गया है। द्वारसे निकलते समय सिरमें चोट लगना तथा छत्र, ध्वजा और वस्त्रादिका गिरना अशुभकारक है। प्रथम बार अपशकुन दीखनेपर विद्वान् राजाको चाहिए कि वह अशुभविनाशक एवं मधुहन्ता भगवान् केशवकी स्तोत्रोंद्वारा पूजा करे। दूसरी बार पुनः अपशकुन दिखायी पड्नेपर उसे घरमें लौट जाना चाहिए ॥ २--१३३॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 306

नानापुष्पसमाकीर्णं नानाविधफलान्वितम् नतं सूर्यस्य रुचिभिर् भिन्नसंहृतपल्लवम्

nānāpuṣpasamākīrṇaṃ nānāvidhaphalānvitam nataṃ sūryasya rucibhir bhinnasaṃhṛtapallavam

हिन्दी अर्थ

अनघ! अब मैं शुभ-सूचक अभीष्ट शकुनोंका वर्णन कर रहा हूँ । राजन्! श्वेत फूल, भरा हुआ घट, जलजन्तु, पक्षी, मांस, मछलियाँ, गौएँ, घोडे, हाथी, अकेला बँधा हुआ पशु, बकरा, देवता, मित्र, ब्राह्मण, जलती हुई अग्नि, वेश्या, दूर्वा, गीला गोबर, सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, सभी प्रकारके रत्न, ओषधियाँ, जौ, पीली सरसों, मनुष्योंको ढोता हुआ वाहन, सुन्दर सिंहासन, तलवार, छत्र, पताका, मिट्टी, हथियार, सभी प्रकारके राजचिह, रुदनरहित मुर्दा, घी, दही, दूध, विविध प्रकारके फल, स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त, कौस्तुभमणि, वाद्योंके सुखदायक, मनोहर एवं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 307

तत्राम्बराणि संत्यज्य भूषणानि च शैलजा संवीता वल्कलैर्दिव्यैर् दर्भनिर्मितमेखला

tatrāmbarāṇi saṃtyajya bhūṣaṇāni ca śailajā saṃvītā valkalairdivyair darbhanirmitamekhalā

हिन्दी अर्थ

माने गये हैं। द्विज! यदि बालूके कणोंसे युक्त रूखी वायु सर्वत्र प्रतिकूल दिशामें पृथ्वीका स्पर्श करके बह रही हो तो उसे भयकारी जानना चाहिए। अनुकूल दिशामें सुखदायिनी होती है। निष्ठुर एवं रूखे स्वरमें बोलनेवाले मांसभक्षी जीव यात्रियोंके लिये कल्याणकारक होते हैं।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 308

त्रिःस्नाता पाटलाहारा बभूव शरदां शतम् शतमेकेन शीर्णेन पर्णेनावर्तयत्तदा

triḥsnātā pāṭalāhārā babhūva śaradāṃ śatam śatamekena śīrṇena parṇenāvartayattadā

हिन्दी अर्थ

१. ऐसे स्तोत्रॉमें विष्णुसहस्रनाम, गजेन्द्रमोक्ष, (महापुरुषविद्या) “जितं ते पुण्डरीकाक्ष आदि श्रेष्ठ हैं। २. ऐसा प्रासाद जिसमें पूर्वकी ओर द्वार न हो! (बृहत्संहिता ५३। ३४) ३. वह प्रासाद जिसमें दक्षिणकी ओर दरवाजा न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३३) ४. एक प्रकारका मकान, जिसमें पश्चिमकी ओर द्वार न हो। (बृहत्संहिता ५३। ३२)

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 309

निराहारा शतं साभूत् समानां तपसां निधिः तत उद्वेजिताः सर्वे प्राणिनस्तत्तपो ऽग्निना

nirāhārā śataṃ sābhūt samānāṃ tapasāṃ nidhiḥ tata udvejitāḥ sarve prāṇinastattapo 'gninā

हिन्दी अर्थ

हाथियोंकी चिग्घाड़के समान गम्भीर शब्द करनेवाले चिकने शस्तान्येतानि धर्मज्ञ यच्च स्यान्मनसः प्रियम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 310

ततः सस्मार भगवान् मुनीन्सप्त शतक्रतुः ते समागम्य मुनयः सर्वे समुदितास्ततः

tataḥ sasmāra bhagavān munīnsapta śatakratuḥ te samāgamya munayaḥ sarve samuditāstataḥ

हिन्दी अर्थ

मङ्गल्यलब्धिः श्रवणं च राजन् घने मेघ शुभदायी होते हैं । पीछेसे चमकनेवाली बिजलीका प्रकाश तथा इन्द्रधनुष प्रशंसनीय हैं । यात्रामें सूर्य एवं चन्द्रमाके मण्डल तथा घनघोर वृष्टिको अशुभ समझना चाहिए। अनुकूल दिशामें उदित हुए ग्रहोंको, विशेषकर बृहस्पतिको शुभसूचक कहा गया है धर्मज्ञ! (यात्राकालमें) आस्तिकता, श्रद्धा, पूज्योंके प्रति पूज्यभाव और मनकी प्रसन्नता-ये सभी प्रशंसनीय हैं । यात्राकालमें मनका संतोष विजयका परम लक्षण है तुलनामें एक ओर सभी शुभ शकुन और एक ओर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 311

पूजिताश्च महेन्द्रेण पप्रच्छुस्तं प्रयोजनम् किमर्थं तु सुरश्रेष्ठ संस्मृतास्तु वयं त्वया

pūjitāśca mahendreṇa papracchustaṃ prayojanam kimarthaṃ tu suraśreṣṭha saṃsmṛtāstu vayaṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

अपने मनकी प्रसन्नताको मानना चाहिए । राजन्! वाहनोंकी उत्सुकता, मनका आनन्दातिरेक, शुभ शकुनोंकी प्राप्ति, विजयसूचक प्रवाद, माङ्गलिक वस्तुओंको उपलब्धि तथा ज्ञेयानि नित्यं विजयावहानि॥ २८ श्रवण--इन्हें नित्य विजयप्रद जानना चाहिए ॥ १४--२८॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 312

शक्रः प्रोवाच शृण्वन्तु भगवन्तः प्रयोजनम् हिमाचले तपो घोरं तप्यते भूधरात्मजा तस्या ह्यभिमतं कामं भवन्तः कर्तुमर्हथ

śakraḥ provāca śṛṇvantu bhagavantaḥ prayojanam himācale tapo ghoraṃ tapyate bhūdharātmajā tasyā hyabhimataṃ kāmaṃ bhavantaḥ kartumarhatha

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे यात्रानिमित्ते मङ्गलाध्यायो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके यात्रा-प्रसंगमें मङ्गलाध्याय नामक दो सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वामन-प्रादुर्भाव-प्रसङ्कमें श्रीभगवानद्वारा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 313

ततः समापतन्देव्या जगदर्थं त्वरान्विताः तथेत्युक्त्वा तु शैलेन्द्रं सिद्धसंघातसेवितम्

tataḥ samāpatandevyā jagadarthaṃ tvarānvitāḥ tathetyuktvā tu śailendraṃ siddhasaṃghātasevitam

हिन्दी अर्थ

राजधर्मस्त्वया सूत कथितो विस्तरेण तु। तथैवाद्भुतमङ्गल्यं स्वप्नदर्शनमेव च क्रमतः कीहृशं रूपमासील्लोकत्रये हरेः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 314

ऊचुरागत्य मुनयस् तामथो मधुराक्षरम् पुत्रि किं ते व्यवसितः कामः कमललोचने

ūcurāgatya munayas tāmatho madhurākṣaram putri kiṃ te vyavasitaḥ kāmaḥ kamalalocane

हिन्दी अर्थ

एतदेव पुरा पृष्टः कुरुक्षेत्रे तपोधनः। शौनकस्तीर्थयात्रायां वामनायतने पुरा धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे वामनायतने स्थित: । ऋषियोंने पूछा--सूतजी! आपने विस्तारपूर्वक राजधर्मका वर्णन तो कर दिया, उसी प्रकार अद्भुत शकुन एवं स्वप्नदर्शनका भी निरूपण कर दिया। अब आप पुनः भगवान् विष्णुके माहात्म्यका वर्णन कीजिये। किस प्रकार

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 315

तानुवाच ततो देवी सलज्जा गौरवान्मुनीन् तपस्यतो महाभागाः प्राप्य मौने भवादृशान्

tānuvāca tato devī salajjā gauravānmunīn tapasyato mahābhāgāḥ prāpya maune bhavādṛśān

हिन्दी अर्थ

भगवानूने वामनस्वरूप धारणकर दानवराज बलिको बाँधा था और नापते समय किस प्रकार भगवानका वह शरीर बढ़कर तीनों लोकोंमें व्याप्त हो गया था? सूतजी कहते हैं-मुनिगण! इसी वृत्तान्तको प्राचीनकालमें तीर्थ-यात्राके समय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें अर्जुनने तपस्वी शौनकजीसे पूछा था। जिस समय उन्होंने द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए युधिष्ठिरके नियमोंका

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 316

वन्दनाय नियुक्ता धीः पावयत्यविकल्पितम् प्रश्नोन्मुखत्वाद्भवतां युक्तमासनमादितः

vandanāya niyuktā dhīḥ pāvayatyavikalpitam praśnonmukhatvādbhavatāṃ yuktamāsanamāditaḥ

हिन्दी अर्थ

उल्लङ्घन किया था, उस समय वे उस पापकी शान्तिके लिये तीर्थयात्रामें गये हुए थे। उस समय धर्ममय कुरुक्षेत्रके वामनायतनमें पहुँचकर वामनभगवानूका दर्शन दृष्टा स वामनं तत्र अर्जुनो वाक्यमब्रवीत्॥ ५ कर अर्जुने इस प्रकार प्रश्‍न किया था॥ ३--५॥ कि निमित्तमयं देवो वामनाकृतिरिज्यते। वराहरूपी भगवान् कस्मात् पूज्योऽभवत् पुरा।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 317

उपविष्टाः श्रमोन्मुक्तास् ततः प्रक्ष्यथ मामतः इत्युक्त्वा सा ततश्चक्रे कृतासनपरिग्रहान्

upaviṣṭāḥ śramonmuktās tataḥ prakṣyatha māmataḥ ityuktvā sā tataścakre kṛtāsanaparigrahān

हिन्दी अर्थ

चिन्तयामास देवानां जननी पुनरुदद्भवम् अदितिर्देवमाता च परमं दुश्चरं तपः। तीव्रं चचार वर्षाणां सहस्त्रं पृथिवीपते

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 318

सा तु तान्विधिवत्पूज्यान् पूजयित्वा विधानतः उवाचादित्यसंकाशान् मुनीन्सप्त सती शनैः

sā tu tānvidhivatpūjyān pūjayitvā vidhānataḥ uvācādityasaṃkāśān munīnsapta satī śanaiḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्यैर्निराकृतान् दृष्टा तनयान् कुरुनन्दन देवदेवं हृषीकेशं नत्वा सर्वगतं हरिम् नमः सर्वार्तिनाशाय नमः पुष्करमालिने।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 319

त्यक्त्वा व्रतात्मकं मौनं मौनं जग्राह ह्रीमयम् भावं तस्यास्तु मौनान्तं तस्याः सप्तर्षयो यथा

tyaktvā vratātmakaṃ maunaṃ maunaṃ jagrāha hrīmayam bhāvaṃ tasyāstu maunāntaṃ tasyāḥ saptarṣayo yathā

हिन्दी अर्थ

नमः परमकल्याण कल्याणायादिवेधसे श्रियः कान्ताय दान्ताय परमार्थाय चक्रिणे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 320

गौरवाधीनतां प्राप्ताः पप्रच्छुस्तां पुनस्तथा सापि गौरवगर्भेण मनसा चारुहासिनी

gauravādhīnatāṃ prāptāḥ papracchustāṃ punastathā sāpi gauravagarbheṇa manasā cāruhāsinī

हिन्दी अर्थ

नमः शङ्खासिहस्ताय नमः कनकरेतसे निर्गुणायाविशेषाय हरये ब्रह्मरूपिणे नमः स्थूलातिसूक्ष्माय तस्मै देवाय शार्क्रिणे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 321

मुनीञ्शान्तकथालापान् प्रेक्ष्य प्रोवाच वाग्यमम् भगवन्तो विजानन्ति प्राणिनां मानसं हितम्

munīñśāntakathālāpān prekṣya provāca vāgyamam bhagavanto vijānanti prāṇināṃ mānasaṃ hitam

हिन्दी अर्थ

अपश्यद्भिर्जगत्यत्र स देवो हृदि संस्थितः पतिः सुराणां यस्तस्मै नमः कृष्णाय वेधसे

English

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अध्याय 154

श्लोक 322

मनोगतीभिरत्यर्थं कदर्थन्ते हि देहिनः केचित् तु निपुणास्तत्र घटन्ते विबुधोद्यमैः

manogatībhiratyarthaṃ kadarthante hi dehinaḥ kecit tu nipuṇāstatra ghaṭante vibudhodyamaiḥ

हिन्दी अर्थ

अर्जुनने पूछा--महर्षे! किस फलको प्राप्तिके लिये वामनभगवान्की पूजा की जाती है? प्राचीनकालमें वराहरूपधारी भगवान् किस कारण पूज्य माने गये और किस निमित्तसे यह क्षेत्र भगवान् वामनको प्रिय शौनकजी बोले--कुरुनन्दन! मैं भगवान् वामन एवं ज्ञानस्वरूप वराहके माहात्म्यको संक्षेपमें पुनः तुम्हें बतला रहा हुँ। प्राचीनकालमें दानवोंद्वारा देवताओंके पराजित हो जानेपर तथा इन्द्रको निर्वासित कर दिये जानेपर देवमाता अपने पुत्रोंके पुनरुत्थानके लिये चिन्ता करने लगीं । राजन्! देवमाता अदितिने एक हजार वर्षोतक परम दुष्कर तप किया। उस समय वे मौन होकर वायुका आहार करती हुई श्रीकृष्णको आराधनामें तत्पर

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अध्याय 154

श्लोक 323

उपायैर्दुर्लभान्भावान् प्राप्नुवन्ति ह्यतन्द्रिताः अपरे तु परिच्छिन्ना नानाकाराभ्युपक्रमाः

upāyairdurlabhānbhāvān prāpnuvanti hyatandritāḥ apare tu paricchinnā nānākārābhyupakramāḥ

हिन्दी अर्थ

थीं। कुरुनन्दन! वे अपने पुत्रोंको हैत्योंद्वारा तिरस्कृत हुआ देखकर “मैं निष्फल पुत्रवाली हूँ', इस दुःखसे दुःखी होकर श्रीहरिकी शरणागत हुई । तत्पश्चात् परमार्थको समझनेवाली अदिति देवाधिदेव, इन्द्रियोंके स्वामी, सर्वव्यापी श्रीहरिको नमस्कार कर अभीष्ट वाणीद्वारा उनकी स्तुति करने लगीं

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अध्याय 154

श्लोक 324

देहान्तरार्थमारम्भम् आश्रयन्ति हितप्रदम् मम त्वाकाशसम्भूतपुष्पदामा विभूषितम्

dehāntarārthamārambham āśrayanti hitapradam mama tvākāśasambhūtapuṣpadāmā vibhūṣitam

हिन्दी अर्थ

अदिति बोलीं--सभीके दुःखोंका नाश करनेवाले आपको नमस्कार है। कमल-मालाधारीको प्रणाम है। परम कल्याणके भी कल्याणस्वरूप एवं आदिविधाताको अभिवादन है। आप कमलनेत्र, कमलनाभि, लक्ष्मीपति, दमनकर्ता, परमार्थस्वरूप और चक्रधारी हैं, आपको बारंबार नमस्कार है। ब्रह्माको उत्पत्तिके स्थानस्वरूप एवं आत्मयोनिको प्रणाम है। आप हाथोंमें शङ्ख और खड्ग धारण करनेवाले एवं स्वर्णरेता हैं, आपको बारंबार अभिवादन है। आप आत्मज्ञान-विज्ञानके योगियोंद्वारा चिन्तनीय, आत्मयोगी, निर्गुण, अविशेष, ब्रह्मस्वरूप श्रीहरि है । आप समस्त जगत्में स्थित हैं, परंतु जगतृद्वारा देखे नहीं जाते, आप स्थूल और अति सूक्ष्मस्वरूप हैं

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अध्याय 154

श्लोक 325

वन्ध्या सुतं प्राप्तुकामा मनः प्रसरते मुहुः अहं किल भवं देवं पतिं प्राप्तुं समुद्यता

vandhyā sutaṃ prāptukāmā manaḥ prasarate muhuḥ ahaṃ kila bhavaṃ devaṃ patiṃ prāptuṃ samudyatā

हिन्दी अर्थ

आप शार्ङ्ग-धनुषधारी देवको नमस्कार है। सम्पूर्ण जगतको देखते हुए भी मनुष्य जिसे देख नहीं पाते, वह देवता इस जगत्में उन्हींके हृदयमें स्थित हैं। यह सारा जगत् उन्हींमें लीन हो जाता है। जिसका यह समस्त जगत् है और जो समस्त जगतूके आधार हैं, उन्हें बारंबार प्रणाम है। जो आद्य प्रजापतियोंमें अग्रगण्य, प्रभुओंके भी प्रभु, परात्पर और देवताओंके स्वामी हैं, उन आदिकर्ता कृष्णको

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अध्याय 154

श्लोक 326

प्रकृत्यैव दुराधर्षं तपस्यन्तं तु संप्रति सुरासुरैरनिर्णीतं परमार्थक्रियाश्रयम्

prakṛtyaiva durādharṣaṃ tapasyantaṃ tu saṃprati surāsurairanirṇītaṃ paramārthakriyāśrayam

हिन्दी अर्थ

९३२ मत्स्यपुराण यः प्रवृत्तौ निवृत्तौ च इज्यते कर्मभिः स्वकैः । स्वर्गापवर्गफलदो नमस्तस्मै गदाभृते यश्चिन्त्यमानो मनसा सद्यः पापं व्यपोहति। नमस्तस्मै विशुद्धाय पराय हरिवेधसे

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।