Matsya Purana
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

588 श्लोकभाग 7/9 · श्लोक 397–464

पूर्ण अध्याय पाठ68 श्लोक

अध्याय 154

श्लोक 397

जयत्यसौ धन्यतरो हिमाचलस् तदाश्रयं यस्य सुता तपस्यति स दैत्यराजो ऽपि महाफलोदयो विमूलिताशेषसुरो हि तारकः

jayatyasau dhanyataro himācalas tadāśrayaṃ yasya sutā tapasyati sa daityarājo 'pi mahāphalodayo vimūlitāśeṣasuro hi tārakaḥ

हिन्दी अर्थ

अजित, अमेय और अव्यक्त स्थितिवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो । आप परमार्थके प्रयोजनस्वरूप, सर्वज्ञ, ज्ञानद्वारा जानने योग्य और अपनी महिमासे प्रकट होनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप सम्पूर्ण जगतूके साक्षी, जगत्के कर्ता और. जगतूके गुरु हैं, आपकी जय हो। देव! आप जगतूकी स्थिति, पालन और अन्त करनेवाले हैं, आपकी जय हो। आप शेषरूप, अशेषरूप तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित रहनेवाले हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 398

त्वदीयमंशं प्रविलोक्य कल्मषात् स्वकं शरीरं परिमोक्ष्यते हि यः स धन्यधीर्लोकपिता चतुर्मुखो हरिश्च यत्संभ्रमवह्निदीपितः

tvadīyamaṃśaṃ pravilokya kalmaṣāt svakaṃ śarīraṃ parimokṣyate hi yaḥ sa dhanyadhīrlokapitā caturmukho hariśca yatsaṃbhramavahnidīpitaḥ

हिन्दी अर्थ

हो। आप जगत्के आदि, मध्य और अन्त हैं, आपकी जय हो। सर्वज्ञाननिधे! आपकी जय हो। आप मोक्षार्थीजनोंद्वारा आज्ञात, स्वयंदृष्ट, ईश्वर, योगियोंको मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाले और दम आदि गुणोंसे विभूषित हैं, आपकी जय और अतीन्द्रिय हैं, आपकी बारंबार जय हो। आप अपनी योगमायामें स्थित रहनेवाले, शेषनागके फणपर शयन करनेवाले और अव्यय हैं, आपकी जय हो । आप एक दाँतके अग्रभागपर वसुंधराको उठाकर रख लेनेवाले (आदिवराह) शत्रुके वक्षःस्थलको विदीर्ण करनेवाले नृसिंह! आपकी जय हो। विश्वात्मन्! इस समय आप वामनरूपमें प्रकट हैं आपकी जय हो। केशव! आपकी जय हो। जगन्मूर्ति जनार्दन! आप अपनी मायाके आवरणसे छिपे रहते हैं, आपकी जय

English

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अध्याय 154

श्लोक 399

त्वदङ्घ्रियुग्मं हृदयेन बिभ्रतो महाभितापप्रशमैकहेतुकम् त्वमेव चैको विविधाकृतक्रियः किलेति वाचा विधुरैर् विभाष्यते

tvadaṅghriyugmaṃ hṛdayena bibhrato mahābhitāpapraśamaikahetukam tvameva caiko vividhākṛtakriyaḥ kileti vācā vidhurair vibhāṣyate

हिन्दी अर्थ

हो। प्रभो! आप अचिन्त्य, अनेक स्वरूप धारण करनेवाले और एकरूप हैं, आपकी जय हो। हरे! आप सम्पूर्ण प्रकृतिके विकारोंसे युक्त हैं, आपकी वृद्धि हो। आप परमेश्वरमें जगतूकी यह धर्ममर्यादा स्थित है। हरे! न मैं, न शंकर, न इन्द्रादि देवगण, न सनकादि मुनिगण और न योगीजन ही आपको जाननेमें समर्थ हैं। जगदीश्वर सर्वेश! इस जगत्में आपकी मायारूपी वस्त्रसे लिपटा हुआ कौन मनुष्य आपकी कृपाके बिना आपको जान सकता है।

English

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अध्याय 154

श्लोक 400

अथाद्य एकस्त्वमवादि नान्यथा जगत्तथा निर्घृणतां तव स्पृशेत् न वेत्सि वा दुःखमिदं प्रजात्मकं विहन्यते ते खलु सर्वतः क्रिया

athādya ekastvamavādi nānyathā jagattathā nirghṛṇatāṃ tava spṛśet na vetsi vā duḥkhamidaṃ prajātmakaṃ vihanyate te khalu sarvataḥ kriyā

हिन्दी अर्थ

प्रसन्नतासे सुन्दर मुखवाले देव! जिसने आपकी आराधना को है, केवल वही आपको जानता है, अन्य लोग नहीं। विश्वात्मन्! आप बड़े-बड़े नेत्रॉसे सुशोभित एवं नन्दीश्वरके स्वामी शंकररूप हैं। सामर्थ्यशाली वामन! आप इस विश्वकी उन्नतिके लिये वृद्धिको प्राप्त हों॥ ७४--८०॥ एवं स्तुतो हृषीकेशः स॒ तदा वामनाकृतिः। प्रहस्य भावगम्भीरमुवाचाब्जसमुद्भवम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 401

उपेक्षसे चेज् जगतामुपद्रवं दयामयत्वं तव केन कथ्यते स्वयोगमायामहिमागुहाश्रयं न विद्यते निर्मलभूतिगौरवम्

upekṣase cej jagatāmupadravaṃ dayāmayatvaṃ tava kena kathyate svayogamāyāmahimāguhāśrayaṃ na vidyate nirmalabhūtigauravam

हिन्दी अर्थ

यथा शक्राय दास्यामि त्रैलोक्यं हतकण्टकम् सोऽहं तथा करिष्यामि यथेन्द्रो जगतः पतिः। भविष्यति सहस्त्राक्षः सत्यमेतद् ब्रवीमि वः

English

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अध्याय 154

श्लोक 402

वयं च ते धन्यतराः शरीरिणां यदीदृशं त्वां प्रविलोकयामहे अदर्शनं तेन मनोरथो यथा प्रयाति साफल्यतया मनोगतम्

vayaṃ ca te dhanyatarāḥ śarīriṇāṃ yadīdṛśaṃ tvāṃ pravilokayāmahe adarśanaṃ tena manoratho yathā prayāti sāphalyatayā manogatam

हिन्दी अर्थ

ततः कृष्णाजिनं ब्रह्मा हृषीकेशाय दत्तवान्। यज्ञोपवीतं भगवान् ददौ तस्मै बृहस्पतिः आषाढमददाद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः। कमण्डलुं वसिष्ठश्च कौशं वेदमथाङ्गिराः सर्वदेवमयो भूप बलेरध्वरमभ्यगात्। यत्र यत्र पदं भूयो भूभागे वामनो ददौ

English

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अध्याय 154

श्लोक 403

जगद्विधानैकविधौ जगन्मुखे करिष्यसे ऽतो बलभिच्चरा वयम् विनेमुरित्थं मुनयो विसृज्य तां गिरं गिरीशश्रुतिभूमिसंनिधौ

jagadvidhānaikavidhau jaganmukhe kariṣyase 'to balabhiccarā vayam vinemuritthaṃ munayo visṛjya tāṃ giraṃ girīśaśrutibhūmisaṃnidhau

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--राजन्! ब्रह्माद्वारा इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वामनस्वरूपधारी भगवान् हषीकेशने उस समय हँसकर कमलजन्मा ब्रह्मासे भावोंसे युक्त गम्भीर वाणीमें कहा-- ब्रह्मन्! प्राचीनकालमें इन्द्रादि थी, उस समय मैंने आपलोगोंसे इन्द्रको त्रिभुवन दिलानेको प्रतिज्ञा की थी। पुनः अदितिने भी मेरी स्तुति की थी और मैंने उससे भी प्रतिज्ञा की थी कि इन्द्रको कण्टकरहित त्रिलोकीका राज्य समर्पित

English

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अध्याय 154

श्लोक 404

उत्कृष्टकेदार इवावनीतले सुबीजमुष्टिं सुफलाय कर्षकाः

utkṛṣṭakedāra ivāvanītale subījamuṣṭiṃ suphalāya karṣakāḥ

हिन्दी अर्थ

करूँगा। वही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा, जिससे सहस्राक्ष इन्द्र पुनः जगत्के अधिपति होंगे, यह मैं आपलोगोंसे सत्य कह रहा हूँ।' तदनन्तर ब्रह्माने हृषीकेशको कृष्णमृगका चर्म दिया। भगवान् बृहस्पतिने उन्हें यज्ञोपवीत प्रदान किया। ब्रह्माके पुत्र महर्षि मरीचिने दो श्वेत वस्त्र समर्पित किये। फिर प्रणवके स्वरोंसे विभूषित वेद, सम्पूर्ण शास्त्र और सांख्ययोगकी उक्तियाँ उनके निकट उपस्थित हुई। राजन्! तत्पश्चात् सर्वदेवमय भगवान् वामन जटा, दण्ड, छत्र और

English

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अध्याय 154

श्लोक 405

तेषां श्रुत्वा तु तां रम्यां प्रक्रमोपक्रमक्रियाम् वाचं वाचस्पतिस्तुष्टः प्रोवाच स्मितसुन्दरीम्

teṣāṃ śrutvā tu tāṃ ramyāṃ prakramopakramakriyām vācaṃ vācaspatistuṣṭaḥ provāca smitasundarīm

हिन्दी अर्थ

कमण्डलु धारण करके बलिके यज्ञकी ओर प्रस्थित हुए। उस समय भगवान् वामन पृथ्वीतलपर जहाँ- जहाँ अपने चरणोंको रखते थे वहाँ-वहाँ अत्यन्त पीड़ित होनेके कारण पृथ्वीमें दरारें पड़ जाती थीं। इस प्रकार धीरे-धीरे मंद गतिसे चलते हुए भगवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 406

जाने लोकविधानस्य कन्या सत्कार्यमुत्तमम् जाता प्रालेयशैलस्य संकेतकनिरूपणाः

jāne lokavidhānasya kanyā satkāryamuttamam jātā prāleyaśailasya saṃketakanirūpaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

साब्धिद्वीपवतीं सर्वा चालयामास मेदिनीम्॥ ९० पृथ्वीको चलायमान कर दिया इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावे वामनोत्पत्तिर्नाम पञ्चचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामन-प्रादुर्भाव-प्रसंगमें वामन-जन्म नामक दो सौ पैतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 154

श्लोक 407

सत्यमुत्कण्ठिताः सर्वे देवकार्यार्थमुद्यताः तेषां त्वरन्ति चेतांसि किंतु कार्यं विवक्षितम्

satyamutkaṇṭhitāḥ sarve devakāryārthamudyatāḥ teṣāṃ tvaranti cetāṃsi kiṃtu kāryaṃ vivakṣitam

हिन्दी अर्थ

बलि-शुक्र-संवाद, वामनका बलिके यज्ञमें पदार्पण, बलिद्दवारा उन्हें तीन

English

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अध्याय 154

श्लोक 408

लोकयात्रानुगन्तव्या विशेषेण विचक्षणैः सेवन्ते ते यतो धर्मं तत्प्रामाण्यात्परे स्थिताः

lokayātrānugantavyā viśeṣeṇa vicakṣaṇaiḥ sevante te yato dharmaṃ tatprāmāṇyātpare sthitāḥ

हिन्दी अर्थ

डग पृथ्वीका दान, वामनद्वारा बलिका बन्धन और वर प्रदान कस्माच्चनासुरान् भागान् प्रतिगृह्णन्ति वह्ृय: इति पृष्ठोऽथ बलिना काव्यो वेदविदां वर: । उवाच हैत्याधिपतिं चिरं ध्यात्वा महामतिः

English

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अध्याय 154

श्लोक 409

इत्युक्ता मुनयो जग्मुस् त्वरितास्तु हिमाचलम् तत्र ते पूजितास्तेन हिमशैलेन सादरम् ऊचुर्मुनिवराः प्रीताः स्वल्पवर्णं त्वरान्विताः

ityuktā munayo jagmus tvaritāstu himācalam tatra te pūjitāstena himaśailena sādaram ūcurmunivarāḥ prītāḥ svalpavarṇaṃ tvarānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

स एष यज्ञमायाति तव दानवपुङ्गव। कम्पन्ते गिरयश्चामी क्षुभितो मकरालयः

English

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अध्याय 154

श्लोक 410

देवो दुहितरं साक्षात् पिनाकी तव मार्गते तच्छीघ्रं पावयात्मानम् आहुत्येवानलार्पणात्

devo duhitaraṃ sākṣāt pinākī tava mārgate tacchīghraṃ pāvayātmānam āhutyevānalārpaṇāt

हिन्दी अर्थ

सदेवासुरगन्धर्वयक्षराक्षसकिंनराः धारयत्यखिलान् देवो मन्वादींश्च महासुर धन्योऽहं कृतपुण्यश्च यन्मे यज्ञपतिः स्वयम्। यज्ञमभ्यागतो ब्रह्मन्मत्तः कोऽन्योऽधिकः पुमान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 411

कार्यमेतच्च देवानां सुचिरं परिवर्तते जगदुद्धरणायैष क्रियतां वै समुद्यमः

kāryametacca devānāṃ suciraṃ parivartate jagaduddharaṇāyaiṣa kriyatāṃ vai samudyamaḥ

हिन्दी अर्थ

द्रष्टुमिच्छन्ति देवेशं स मेऽध्वरमुपैष्यति होता भागप्रदोऽयं च यमुदगाता च गायति। तमध्वरेश्वरं विष्णुं मत्तः कोऽन्य उपैष्यति

English

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अध्याय 154

श्लोक 412

इत्युक्तस्तैस्तदा शैलो हर्षाविष्टो ऽवदन्मुनीन् असमर्थो ऽभवद्वक्तुम् उत्तरं प्रार्थयञ्छिवम्

ityuktastaistadā śailo harṣāviṣṭo 'vadanmunīn asamartho 'bhavadvaktum uttaraṃ prārthayañchivam

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने कहा--पर्वतों और काननोंसहित पृथ्वीको क्षुब्ध हुई देख बलिने शुद्धाचारी शुक्राचार्यको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उनसे पूछा- आचार्य! किस कारण समुद्र, पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी संक्षुब्ध हो उठी है और यज्ञोंमें अग्नियाँ आसुरी भागोंको नहीं ग्रहण कर रही हैं ?' बलिद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वेदज्ञोमें श्रेष्ठ महाबुद्धिमान् शुक्राचार्य कुछ देरतक ध्यान करके हैत्यराज बलिसे बोले--' दानवश्रेष्ठ! जगतूके उत्पत्तिस्थान विश्वात्मा अविनाशी श्रीहरि वामनरूपसे कश्यपके गृहमें अवतीर्ण हुए हैं। बही इस समय तुम्हारे यज्ञमें पधार रहे हैं। उन्हींके पैर रखनेसे संक्षुब्ध होकर यह पृथ्वी डगमगा रही है, ये पर्वत काँप रहे हैं और

English

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अध्याय 154

श्लोक 413

ततो मेना मुनीन्वीक्ष्य प्रोवाच स्नेहविक्लवा दुहितुस्तान्मुनींश्चैव चरणाश्रयम् अर्थवित्

tato menā munīnvīkṣya provāca snehaviklavā duhitustānmunīṃścaiva caraṇāśrayam arthavit

हिन्दी अर्थ

समुद्र क्षुब्ध हो उठा है। देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नरोंसे भरी हुई पृथ्वी समस्त जीवोंके स्वामी इन ईश्वरको वहन करनेमें समर्थ नहीं है। महासुर! इन्हीं परमात्माने पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाशको धारण कर रखा है तथा ये ही देवेश्वर सम्पूर्ण मनु आदिको धारण करते हैं । जगतूके लिये भगवान् विष्णुकी यही दुर्गम माया है, जिसके द्वारा धार्य-धारकभावसे सारा जगत् पीड़ित हो रहा है। असुरोत्तम! उन्हीं भगवानूके

English

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अध्याय 154

श्लोक 414

यदर्थं दुहितुर्जन्म नेच्छन्त्यपि महाफलम् तदेवोपस्थितं सर्वं प्रक्रमेणैव सांप्रतम्

yadarthaṃ duhiturjanma necchantyapi mahāphalam tadevopasthitaṃ sarvaṃ prakrameṇaiva sāṃpratam

हिन्दी अर्थ

समीपस्थ होनेसे असुरगण यज्ञमें अपने भागोंके अधिकारी नहीं रह गये। यही कारण है कि ये अग्नियाँ असुरोंके भागोंको ग्रहण नहीं कर रही हैं' बलिने कहा--ब्रह्मन्! मैं धन्य और पुण्यात्मा हूँ जो मेरे यज्ञमें साक्षात् भगवान् यज्ञपति उपस्थित हो रहे हैं। अब मुझसे बढ़कर दूसरा कौन पुरुष है? योगाभ्यासमें लगे हुए योगी जिन अविनाशी देवाधिदेव परमात्माको देखनेकी लालसा करते हैं, वे ही भगवान् मेरे यज्ञमें आ रहे हैं। होता जिन्हें यज्ञभाग प्रदान करते हैं और उद्गाता जिनका गान करते हैं, उन यज्ञपति विष्णुके निकट मेरे अतिरिक्त दूसरा कौन जा सकता है। शुक्राचार्यजी!

English

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अध्याय 154

श्लोक 415

कुलजन्मवयोरूपविभूत्यृद्धियुतो ऽपि यः वरस्तस्यापि चाहूय सुता देया ह्ययाचतः

kulajanmavayorūpavibhūtyṛddhiyuto 'pi yaḥ varastasyāpi cāhūya sutā deyā hyayācataḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुके मेरे यज्ञमें पधारनेपर मेरा यन्मया काव्य कर्तव्यं तन्ममादेष्टुमर्हसि॥ १३ जो कर्तव्य हो, उसका मुझे आदेश दीजिये

English

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अध्याय 154

श्लोक 416

तत्समस्ततपोघोरं कथं पुत्री प्रयास्यति पुत्रीवाक्याद्यदत्रास्ति विधेयं तद्विधीयताम्

tatsamastatapoghoraṃ kathaṃ putrī prayāsyati putrīvākyādyadatrāsti vidheyaṃ tadvidhīyatām

हिन्दी अर्थ

यज्ञभागभुजो देवा वेदप्रामाण्यतोऽसुर। त्वया तु दानवा हैत्या मखभागभुजः कृताः अयं च देवः सत्त्वस्थः करोति स्थितिपालनम्। विसृष्टेरनु चान्नेन स्वयमत्ति प्रजाः प्रभुः त्वत्कृते भविता नूनं देवो विष्णुः स्थितौ स्थितः। विदित्वैतन्महाभाग कुरु यत्नमनागतम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 417

इत्युक्ता मुनयस्ते तु प्रियया हिमभूभृतः ऊचुः पुनरुदारार्थं नारीचित्तप्रसादकम्

ityuktā munayaste tu priyayā himabhūbhṛtaḥ ūcuḥ punarudārārthaṃ nārīcittaprasādakam

हिन्दी अर्थ

त्वया हि हैत्याधिपते स्वल्पकेऽपि हि वस्तुनि। प्रतिज्ञा न हि वोढव्या वाच्यं साम वृथाफलम् नालं दातुमहं देव हैत्य वाच्यं त्वया वचः। कृष्णस्य देवभूत्यर्थं प्रवृत्तस्य महासुर

English

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अध्याय 154

श्लोक 418

ऐश्वर्यमवगच्छस्व शंकरस्य सुरासुरैः आराध्यमानपादाब्जयुगलत्वात्सुनिर्वृतैः

aiśvaryamavagacchasva śaṃkarasya surāsuraiḥ ārādhyamānapādābjayugalatvātsunirvṛtaiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मन् कथमहं ब्रूयामन्येनापि हि याचितः। नास्तीति किमु देवेन संसाराघौघहारिणा यज्ञाः क्रियन्ते देवेशः स मां देहीति वक्ष्यति तत्साधु सुकृतं कर्म तपः सुचरितं मम। यन्मया दत्तमीशेशः स्वयमादास्यते हरिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 419

यस्योपयोगि यद्रूपं सा च तत्प्राप्तये चिरम् घोरं तपस्यते बाला तेन रूपेण निर्वृतिः

yasyopayogi yadrūpaṃ sā ca tatprāptaye ciram ghoraṃ tapasyate bālā tena rūpeṇa nirvṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

नास्ति नास्तीत्यहं वक्ष्ये तमप्यागतमीश्वरम्। यदा वञ्चामि तं प्राप्तं वृथा तज्जन्मनः फलम् यज्ञेऽस्मिन् यदि यज्ञेशो याचते मां जनार्दन: । निजमूर्धानमप्यत्र तद् दास्याम्यविचारितम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 420

यस्तद्व्रतानि दिव्यानि नयिष्यति समापनम् तत्र सावहिता तावत् तस्मात् सैव भविष्यति

yastadvratāni divyāni nayiṣyati samāpanam tatra sāvahitā tāvat tasmāt saiva bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

नाबाधकारि यद् दानं तदमङ्कलवत् स्मृतम् शुक्रने कहा--असुर ! वेदोंके प्रमाणानुसार देवगण ही यज्ञभागके अधिकारी हैं, किंतु तुमने तो हैत्यों और दानवोंको यज्ञभागका अधिकारी बना दिया है। ये सामर्थ्यशाली भगवान् सत्त्वगुणमें स्थित होकर सृष्टिकी उत्पत्ति और पालन करते हैं तथा प्रलयकालमें प्रजाओंको अपना ग्रास बना लेते हैं। महाभाग! वे भगवान् विष्णु तुम्हारे लिये ही भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं, अत: इसे जानकर भविष्यके लिये उपाय करो। हैत्याधिपते! तुम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 421

इत्युक्त्वा गिरिणा सार्धं ते ययुर्यत्र शैलजा जितार्कज्वलनज्वाला तपस्तेजोमयी ह्युमा

ityuktvā giriṇā sārdhaṃ te yayuryatra śailajā jitārkajvalanajvālā tapastejomayī hyumā

हिन्दी अर्थ

उन्हें थोड़ी-सी भी वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा न करना, झूठ- ऐसा वचन कहना चाहिए कि “देव! मैं आपको कुछ भी देनेमें समर्थ नहीं हूँ'

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 422

प्रोचुस्तां मुनयः स्निग्धं संमान्य पथमागतम् रम्यं प्रियं मनोहारि मा रूपं तपसा दह

procustāṃ munayaḥ snigdhaṃ saṃmānya pathamāgatam ramyaṃ priyaṃ manohāri mā rūpaṃ tapasā daha

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा-- ब्रह्मन्! साधारण याचकोंके याचना करनेपर मैंने उन्हें कभी नकारात्मक उत्तर नहीं दिया, फिर संसारके पापसमूहोंको दूर करनेवाले परमात्माद्वारा याचना किये जानेपर मैं कैसे कहूँगा कि मेरे पास नहीं है । भला, जो श्रीहरिं विविध व्रतों और उपवासोंद्वारा प्राप्त किये जाते हैं, वे गोविन्द यदि ऐसा कहेंगे कि ' दो' तो इससे बढ़कर और क्या बात होगी ? जिनकी प्राप्तिके लिये तप और शौच आदि गुणोंसे युक्त याज्ञिक लोग उपहार-सामग्रियोसे परिपूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, वे ही देवेश मुझसे 'दो' ऐसी याचना करेंगे। यदि देवाधिदेव श्रीहरि मेरे द्वारा दिये गये दानको स्वयं ग्रहण करेंगे, तब तो मेरे कर्म पुण्यमय हो

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 423

प्रातस्ते शंकरः पाणिम् एष पुत्रि ग्रहीष्यति वयमर्थितवन्तस्ते पितरं पूर्वमागताः

prātaste śaṃkaraḥ pāṇim eṣa putri grahīṣyati vayamarthitavantaste pitaraṃ pūrvamāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

परमेश्वरके आनेपर भी “नहीं है, नहीं है' ऐसा कहूँ और उन्हें ठगूँ, तब. तो मेरे जन्म लेनेका फल ही व्यर्थ है। इसलिये इस यज्ञमें यदि यज्ञेश्वर जनार्दन मुझसे मेरा मस्तक भी माँगेंगे तो मैं उसे बिना हिचकिचाहरके दे डालूँगा । जब मैंने अन्य साधारण याचकोंको “नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहा, तब भला भगवान् अच्युतके आनेपर वह अनभ्यस्त कैसे कहूँगा ? दान देनेसे आनेवाली विपत्तियाँ वीर पुरुषोंके लिये प्रशंसनीय हैं । जो दान देनेके बाद बाधा नहीं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 424

पित्रा सह गृहं गच्छ वयं यामः स्वमन्दिरम्

pitrā saha gṛhaṃ gaccha vayaṃ yāmaḥ svamandiram

हिन्दी अर्थ

पहुंचाता, वह अमङ्गलके समान कहा गया है । महाभाग! मेरे राज्यमें कोई भी प्राणी दुःखी, दरिद्र, आतुर, भूषारहित, उद्विग्न और माला आदिसे रहित नहीं है, प्रत्युत सभी लोग दृष्ट, संतुष्ट, सुगन्धित द्रव्यासे विभूषित, तृप्त और सभी सुखोंसे सम्पन्न हैं। फिर मैं सदा सुखी हूँ, इसके लिये तो जनः सर्वो महाभाग किमुताहं सदा सुखी॥ २८ कहना ही क्या है ?॥ १९--२८॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 425

इत्युक्ता तपसः सत्यं फलमस्तीति चिन्त्य सा त्वरमाणा ययौ वेश्म पितुर्दिव्यार्थशोभितम्

ityuktā tapasaḥ satyaṃ phalamastīti cintya sā tvaramāṇā yayau veśma piturdivyārthaśobhitam

हिन्दी अर्थ

भृगुवंशसिंह ! मेरे दानरूपी बीजका ही यह फल विदितं भृगुशार्दूल मयैतत् त्वत्प्रसादतः ॥ २९ है, जो मुझे इस प्रकार दान देनेयोग्य विशिष्ट पात्र प्राप्त

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 426

सा तत्र रजनीं मेने वर्षायुतसमां सती हरदर्शनसंजातमहोत्कण्ठा हिमाद्रिजा

sā tatra rajanīṃ mene varṣāyutasamāṃ satī haradarśanasaṃjātamahotkaṇṭhā himādrijā

हिन्दी अर्थ

मत्तो दानमवाप्येशो यदि पुष्णाति देवताः। उपभोगाद् दशगुणं दानं श्लाघ्यतमं मम मत्प्रसादपरो नूनं यज्ञेनाराधितो हरिः। तेनाभ्येति न संदेहो दर्शनादुपकारकृत् अथ कोपेन चाभ्येति देवभागोपरोधिनम्। मां निहन्तुमनाश्चैव वधः श्लाघ्यतरोऽच्युतात्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 427

ततो मुहूर्ते ब्राह्मे तु तस्याश्चक्रुः सुरस्त्रियः नानामङ्गलसंदोहान् यथावत्क्रमपूर्वकम्

tato muhūrte brāhme tu tasyāścakruḥ surastriyaḥ nānāmaṅgalasaṃdohān yathāvatkramapūrvakam

हिन्दी अर्थ

स मां हन्तुं हृषीकेशः कथं यत्नं करिष्यति एतद् विदित्वा न गुरो दानविघ्नकरेण च। त्वया भाव्यं जगन्नाथे गोविन्दे समुपस्थिते

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 428

दिव्यमण्डनमङ्गानां मन्दिरे बहुमङ्गले उपासत गिरिं मूर्ता ऋतवः सार्वकामिकाः

divyamaṇḍanamaṅgānāṃ mandire bahumaṅgale upāsata giriṃ mūrtā ṛtavaḥ sārvakāmikāḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो मायावामनरूपधृक् तं दृष्टा यज्ञवाटान्तःप्रविष्टमसुराः प्रभुम्। प्रत्येकं देवदेवेशं पूजयामास चेतसा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 429

वायवो वारिदाश्चासन् संमार्जनविधौ गिरेः हर्म्येषु श्रीः स्वयं देवी कृतनानाप्रसाधना

vāyavo vāridāścāsan saṃmārjanavidhau gireḥ harmyeṣu śrīḥ svayaṃ devī kṛtanānāprasādhanā

हिन्दी अर्थ

अथासुरपतिं प्रह्वं दृष्टा मुनिवरांश्च तान्। देवदेवपत्िः साक्षी विष्णुर्वामनरूपधृक् तुष्टाव यज्ञवह्िं च यजमानमथत्विजः। यज्ञकर्माधिकारस्थान् सदस्यान् द्रव्यसम्पदः

English

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अध्याय 154

श्लोक 430

कान्तिः सर्वेषु भावेषु ऋद्धिश्चाभवदाकुला चिन्तामणिप्रभृतयो रत्नाः शैलं समन्ततः

kāntiḥ sarveṣu bhāveṣu ṛddhiścābhavadākulā cintāmaṇiprabhṛtayo ratnāḥ śailaṃ samantataḥ

हिन्दी अर्थ

होगा। यह मुझे आपकी कृपासे ही ज्ञात हुआ है। अतः गुरो! यह सब जानते हुए यदि मेरा यह दानबीज जनार्दनरूपी महापात्रमें पड़ जाय तो फिर मुझे क्या नहीं मिला अर्थात् मुझे सब कुछ प्राप्त हो गया। यदि परमेश्वर मुझसे दान लेकर देवताओंका पालन-पोषण करते हैं तो उनके उपभोगसे मेरा दान दसगुना प्रशंसनीय हो जायगा। इसमें सन्देह नहीं कि यज्ञद्वारा आराधित श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो गये हैं, इसी कारण दर्शन देकर उपकार करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं। यदि क्रुद्ध होकर देवभागको रोकनेवाले मुझको मार डालनेके विचारसे आ रहे हैं तो भगवानूके हाथोंसे मेरा वध भी प्रशंसनीय है! यह सब कुछ उन्हींका स्वरूप है।

English

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अध्याय 154

श्लोक 431

उपतस्थुर्नगाश्चापि कल्पकाममहाद्रुमाः ओषध्यो मूर्तिमत्यश्च दिव्यौषधिसमन्विताः

upatasthurnagāścāpi kalpakāmamahādrumāḥ oṣadhyo mūrtimatyaśca divyauṣadhisamanvitāḥ

हिन्दी अर्थ

जिनके लिये कुछ भी अप्राप्य नहीं है, वे ही श्रीहरि यदि मुझसे माँगनेके लिये आ रहे हैं तो यह उनके अनुग्रहके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। जो स्वयम्भू परमात्मा सबकी सृष्टि करते हैं और मनकी कल्पनासे ही उसका विनाश कर देते हैं, वे हृषीकेश भला मुझे मारनेके लिये क्यों यत्न करेंगे? गुरो! ऐसा जानकर मेरे यज्ञमें जगन्नाथ गोविन्दके उपस्थित होनेपर आपको मेरे दानमें विघ्न नहीं करना चाहिए॥ २९--३६॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 432

रसाश्च धातवश्चैव सर्वे शैलस्य किंकराः किंकरास्तस्य शैलस्य व्यग्राश्चाज्ञानुवर्तिनः

rasāśca dhātavaścaiva sarve śailasya kiṃkarāḥ kiṃkarāstasya śailasya vyagrāścājñānuvartinaḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--बलि इस प्रकार कह ही रहे थे कि सर्वदेवमय, अचिन्त्य एवं मायासे वामनरूपधारी जगदीश्वर वहाँ आ पहुँचे । यज्ञशालाके भीतर प्रविष्ट हुए उन प्रभुको देखकर सभी सभासद असुरगण क्षुब्ध हो उठे; क्योंकि वामनके तेजसे वे तेजोहीन हो गये थे। उस महान् यज्ञमें आये हुए मुनिगण जप करने लगे। बलिने अपना समस्त जीवन सफल मान लिया। इसके बाद सभी संक्षुब्ध थे, अतः किसीने भी किसीसे कुछ भी नहीं कहा। सभीने हृदयसे देवदेवेशकी पूजा की। तत्पश्चात् देवाधिदेव वामनरूपधारी साक्षात् विष्णुने विनीत बलि और उन मुनिवरोंको देखकर यज्ञाग्नि, . यज्ञकर्माधिकारी सदस्यों और यजमान, पुरोहित, कर्ममें

English

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अध्याय 154

श्लोक 433

नद्यः समुद्रा निखिलाः स्थावरं जङ्गमं च यत् तत्सर्वं हिमशैलस्य महिमानमवर्धयत्

nadyaḥ samudrā nikhilāḥ sthāvaraṃ jaṅgamaṃ ca yat tatsarvaṃ himaśailasya mahimānamavardhayat

हिन्दी अर्थ

प्रस्तुत द्रव्य-सम्पत्तियोंकी प्रशंसा की। तदनन्तर यज्ञशालामें स्थित वामनभगवान्को अत्यन्त प्रसन्न देखकर उसी यज्ञवाटस्थितं वीरः साधु साध्वित्युदीरयन्॥ ४३ समय सदस्यगण 'साधु-साधु' की ध्वनि करने लगे।

English

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अध्याय 154

श्लोक 434

अभवन्मुनयो नागा यक्षगन्धर्वकिंनराः शंकरस्यापि विबुधा गन्धमादनपर्वते

abhavanmunayo nāgā yakṣagandharvakiṃnarāḥ śaṃkarasyāpi vibudhā gandhamādanaparvate

हिन्दी अर्थ

उसी समय रोमाञ्चित शरीरवाले महासुर बलिने अर्घ्य लेकर पूजयामास गोविन्दं प्राह चेदं महासुरः ॥ ४४ गोविन्दकी पूजा की और इस प्रकार कहा॥ ३७--४४॥ स्त्रियो चस्त्राण्यलङ्कारांस्तथा ग्रामांश्च पुष्कलान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 435

सर्वे मण्डनसंभारास् तस्थुर्निर्मलमूर्तयः शर्वस्यापि जटाजूटे चन्द्रखण्डं पितामहः

sarve maṇḍanasaṃbhārās tasthurnirmalamūrtayaḥ śarvasyāpi jaṭājūṭe candrakhaṇḍaṃ pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

इत्युक्तो हैत्यपतिना प्रीतिगर्भान्वितं वचः। प्राह सस्मितगम्भीरं भगवान् वामनाकृतिः त्रिभिः प्रयोजनं किं ते पाहैः पदवतां वर। शतं शतसहस्त्राणां पदानां मार्गतां भवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 436

बबन्ध प्रणयोदारविस्फारितविलोचनः कपालमालां विपुलां चामुण्डा मूर्ध्न्यबन्धयत्

babandha praṇayodāravisphāritavilocanaḥ kapālamālāṃ vipulāṃ cāmuṇḍā mūrdhnyabandhayat

हिन्दी अर्थ

धर्मबुद्ध्या हैत्यपते कृतकृत्योऽस्मि तावता। अन्येषामर्थिनां वित्तमीहितं दास्यते भवान् सर्वदेवमयं रूपं दर्शयामास तत्क्षणात् पादाङ्गल्यः पिशाचास्तु हस्ताङ्गल्यश्च गुह्यकाः

English

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अध्याय 154

श्लोक 437

उवाच चापि वचनं पुत्रं जनय शंकर यो दैत्येन्द्रकुलं हत्वा मां रक्तैस्तर्पयिष्यति

uvāca cāpi vacanaṃ putraṃ janaya śaṃkara yo daityendrakulaṃ hatvā māṃ raktaistarpayiṣyati

हिन्दी अर्थ

विश्वेदेवाश्च जानुस्था जङ्घे साध्याः सुरोत्तमाः। यक्षा नखेषु सम्भूता रेखाश्चाप्सरसस्तथा दृष्टौ ऋक्षाण्यशेषाणि केशाः सूर्यांशवः प्रभोः । तारका रोमकूपाणि रोमाणि च महर्षयः

English

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अध्याय 154

श्लोक 438

सौरिर् ज्वलच्छिरोरत्नमुकुटं चानलोल्बणम् भुजगाभरणं गृह्य सज्जं शंभोः पुरो ऽभवत्

saurir jvalacchiroratnamukuṭaṃ cānalolbaṇam bhujagābharaṇaṃ gṛhya sajjaṃ śaṃbhoḥ puro 'bhavat

हिन्दी अर्थ

अश्विनौ श्रवणे तस्य नासा वायुर्महात्मनः प्रसादश्चन्द्रमा देवो मनो धर्मः समाश्रितः। सत्यं तस्याभवद् वाणी जिह्वा देवी सरस्वती ग्रीवादितिर्देवमाता विद्यास्तद्वलयस्तथा। स्वर्गद्वारमभून्मैत्रं त्वष्टा पूषा च वै श्रुवौ

English

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अध्याय 154

श्लोक 439

शक्रो गजाजिनं तस्य वसाभ्यक्ताग्रपल्लवम् दध्रे सरभसं स्विद्यद् विस्तीर्णमुखपङ्कजम्

śakro gajājinaṃ tasya vasābhyaktāgrapallavam dadhre sarabhasaṃ svidyad vistīrṇamukhapaṅkajam

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--सुवर्ण एवं रत्नोंके समूह, असंख्य सम्पत्ति तथा सम्पूर्ण पृथ्वी-इनमेंसे जो आपको अभीष्ट हो अथवा जिसके लिये आप वामनरूपसे आये हैं, उसे आप माँगिये। मैं आपको वह प्रदान करूँगा

English

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अध्याय 154

श्लोक 440

वायुश्च विपुलं तीक्ष्णशृङ्गं हिमगिरिप्रभम् वृषं विभूषयामास हरयानं महौजसम्

vāyuśca vipulaṃ tīkṣṇaśṛṅgaṃ himagiriprabham vṛṣaṃ vibhūṣayāmāsa harayānaṃ mahaujasam

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--हैत्यपति बलिके ऐसा कहनेपर गम्भीररूपसे मुसकराते हुए वामनरूपधारी भगवान् प्रेमभरी वाणीमें बोले वामनभगवानूने कहा राजन्! अग्निस्थापनके आदि उनके याचकोंको प्रदान कीजिये

English

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अध्याय 154

श्लोक 441

वितेनुर्नयनान्तःस्थाः शम्भोः सूर्यानलेन्दवः स्वां द्युतिं लोकनाथस्य जगतः कर्मसाक्षिणः

vitenurnayanāntaḥsthāḥ śambhoḥ sūryānalendavaḥ svāṃ dyutiṃ lokanāthasya jagataḥ karmasākṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--पदधारियोंमें श्रेष्ठ! तीन पग पृथ्वीसे आपका क्या काम चलेगा? आप सौ अथवा लाख पदोंके लिये याचना कीजिये वामनभगवानूने कहा--हैत्यपते ! मैं धर्मबुद्धिसे उतनेसे ही कृतार्थ हूँ। आप अन्य याचकोंको उनका अभीष्ट धन प्रदान कीजिये

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 442

चिताभस्म समाधाय कपाले रजतप्रभम् मनुजास्थिमयीं मालाम् आबबन्ध च पाणिना

citābhasma samādhāya kapāle rajataprabham manujāsthimayīṃ mālām ābabandha ca pāṇinā

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले-महात्मा वामनकी ऐसी बातें सुनकर महाबाहु बलिने उन वामनको तीन पग भूमि देनेका संकल्प कर लिया। हाथमें संकल्पका जल गिरते सर्वदेवमय रूप प्रकट कर दिया। चन्द्र-सूर्य उनके नेत्र, आकाश मस्तक, पृथ्वी दोनों चरण, पिशाचगण पैरोंकी अंगुलियाँ, गुह्यक हाथोंकी अंगुलियाँ, विश्वेदेव घुटने, सुरश्रेष्ठ साध्यगण जंघे थे। नखोंमें यक्ष, रेखाओंमें अप्सराएँ, ेत्रज्योतिमें नक्षत्रगण थे। सूर्यकिरणे केश, ताराएँ रोमकूप, महर्षिगण रोमावलि थे। उन महात्माकी भुजाओंमें दिशाओंके कोण और श्रोत्रॉमें दिशाएँ थीं । श्रवणेन्द्रियमें अश्विनीकुमार और नासिकामें वायुका निवास था। प्रसन्नतामें चन्द्रदेव

English

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अध्याय 154

श्लोक 443

प्रेताधिपः पुरो द्वारे सगदः समवर्तत नानाकारमहारत्नभूषणं धनदाहृतम्

pretādhipaḥ puro dvāre sagadaḥ samavartata nānākāramahāratnabhūṣaṇaṃ dhanadāhṛtam

हिन्दी अर्थ

और मनमें धर्म स्थित थे। सत्य उनकी वाणी और सरस्वती देवी जिह्वा हुईं। देवमाता अदिति ग्रीवा, विद्याएँ वैश्वानर उनके मुख, प्रजापति अण्डकोष, परब्रह्म हृदय

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 444

विहायोदग्रसर्पेन्द्रकटकेन स्वपाणिना कर्णोत्तंसं चकारेशो वासुकिं तक्षकं स्वयम्

vihāyodagrasarpendrakaṭakena svapāṇinā karṇottaṃsaṃ cakāreśo vāsukiṃ takṣakaṃ svayam

हिन्दी अर्थ

हृदयं च परं ब्रह्म पुंस्त्वं वै कश्यपो मुनिः पृष्ठेऽञस्य वसवो देवा मरुतः सर्वसंधिषु। सर्वसूक्तानि दशना ज्योतींषि विमलप्रभाः वक्षःस्थले महादेवो धैर्ये चास्य महार्णवाः। उदरे चास्य गन्धर्वाः सम्भूताश्च महाबलाः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 445

जलाधीशाहृतां स्थास्नुप्रसूनावेष्टितां पृथक् ततस्तु ते गणाधीशा विनयात्तत्र वीरकम्

jalādhīśāhṛtāṃ sthāsnuprasūnāveṣṭitāṃ pṛthak tatastu te gaṇādhīśā vinayāttatra vīrakam

हिन्दी अर्थ

'लक्ष्मीर्मेधा धृतिः कान्तिः सर्वविद्याश्च वै कटिः। सर्वज्योतींषि जानीहि तस्य तत्परमं महः तस्य देवाधिदेवस्य तेजः प्रोदभूतमुत्तमम्। स्तनौ कुक्षी च वेदाश्च उदरं च महामखाः

English

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अध्याय 154

श्लोक 446

प्रोचुर्व्यग्राकृते त्वं गां समावेदय शूलिने निष्पन्नाभरणं देवं प्रसाध्येशं प्रसाधनैः

procurvyagrākṛte tvaṃ gāṃ samāvedaya śūline niṣpannābharaṇaṃ devaṃ prasādhyeśaṃ prasādhanaiḥ

हिन्दी अर्थ

तस्य देवमयं रूपं दृष्टा विष्णोर्महाबलाः उपासर्पन्त हैत्येन्द्रः पतङ्गा इव पावकम्। प्रमथ्य सर्वानसुरान् पादहस्ततलैर्विभुः कृत्वा रूपं महाकायं जहाराशु स मेदिनीम्। तस्य विक्रमतो भूमिं चन्द्रादित्यौ स्तनान्तरे

English

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अध्याय 154

श्लोक 447

सप्त वारिधयस्तस्थुः कर्तुं दर्पणविभ्रमम् ततो विलोकितात्मानं महाम्बुधिजलोदरे

sapta vāridhayastasthuḥ kartuṃ darpaṇavibhramam tato vilokitātmānaṃ mahāmbudhijalodare

हिन्दी अर्थ

परं विक्रमतस्तस्य जानुमूले प्रभाकरौ विष्णोरास्तां महीपाल देवपालनकर्मणि। जित्वा लोकत्रयं कृत्स्नं हत्वा चासुरपुङ्गवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 448

धरामालिङ्ग्य जानुभ्यां स्थाणुं प्रोवाच केशवः शोभसे देव रूपेण जगदानन्ददायिना

dharāmāliṅgya jānubhyāṃ sthāṇuṃ provāca keśavaḥ śobhase deva rūpeṇa jagadānandadāyinā

हिन्दी अर्थ

पुरंदराय त्रैलोक्यं ददौ विष्णुरुरुक्रमः। सुतलं नाम पातालमधस्ताद् वसुधातलात् बलेर्दत्त॑ भगवता विष्णुना प्रभविष्णुना। अथ हैत्येश्वरं प्राह विष्णुः सर्वे श्वरेश्वर: सावर्णिके तु सम्प्राप्ते भवानिन्द्रो भविष्यति

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 449

मातरः प्रेरयन् कामवधूं वैधव्यचिह्निताम् कालो ऽयमिति चालक्ष्य प्रकारेङ्गितसंज्ञया

mātaraḥ prerayan kāmavadhūṃ vaidhavyacihnitām kālo 'yamiti cālakṣya prakāreṅgitasaṃjñayā

हिन्दी अर्थ

साम्प्रतं देवराजाय त्रैलोक्यं सकलं मया। दत्तं चतुर्युगाणां च साधिका ह्योकसप्ततिः और कश्यप मुनि पुंस्त्व थे। उनके पीठ-भागमें वसुगण और संधिभागोंमें मरुद्गण थे। सभी सूक्त दाँत और निर्मल कान्ति ज्योतिर्गण थे॥ ५१--६० ॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 450

ततस्ताश्चोदिता देवम् ऊचुः प्रहसिताननाः रतिः पुरस्तव प्राप्ता नाभाति मदनोज्झिता

tatastāścoditā devam ūcuḥ prahasitānanāḥ ratiḥ purastava prāptā nābhāti madanojjhitā

हिन्दी अर्थ

उनके वक्ष:स्थलमें महादेव और धैर्यमें महासागर थे। उनके उदरमें महाबली गन्धर्व उत्पन्न हुए थे। लक्ष्मी, मेधा, धृति, कान्ति और सभी विद्याएँ उनके कटिप्रदेशमें थीं। सभी ज्योतियोंको उनका परम तेज जानना चाहिए। वहाँ उन देवाधिदेवका अनृपम तेज भासमान हो रहा था। उनके स्तनों और कुक्षियोंमें वेदोंका निवास था तथा उदरमें महायज्ञ, इष्टियाँ, पशुओंके बलिदान और ब्राह्मणोंकी चेष्टाएँ थीं। उन विष्णुके देवमय स्वरूपको देखकर महाबली हैत्यगण अग्निमें पतंगोंकी भाँति उनपर टूट पड़े। तब सर्वव्यापी परमात्माने उन सभी असुरोंको पैरों तथा हाथोंके चपेटसे मसल डाला और शीघ्र ही विशालकाय स्वरूप धारणकर सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 451

ततस्तां संनिर्वायाह वामहस्ताग्रसंज्ञया प्रयाणं गिरिजावक्त्रदर्शनोत्सुकमानसः

tatastāṃ saṃnirvāyāha vāmahastāgrasaṃjñayā prayāṇaṃ girijāvaktradarśanotsukamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

भूलोकको नापते समय चन्द्रमा और सूर्य भगवान्के स्तनोंके मध्यभागमें थे, अन्तरिक्षलोक नापते समय वे दोनों नाभिप्रदेशमें और उससे ऊपर जाते समय सक्थि भागमें आ गये। उससे भी ऊपर जाते समय वे दोनों प्रकाश फैलानेवाले चन्द्रमा और सूर्य भगवान् विष्णुके घुरनोंके मूलभागमें स्थित हो गये। महीपाल! इस प्रकार लम्बे डगवाले भगवान् विष्णुने देवहितके लिये समूची त्रिलोकीको जीतकर और असुरश्रेष्ठोंका संहार कर तीनों लोकोंका

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 452

ततो हरो हिमगिरिकन्दराकृतिं सितं कशामृदुहतिभिः प्रचोदयत् महावृषं गणतुमुलाहितेक्षणं स भूधरानशनिरिव प्रकम्पयन्

tato haro himagirikandarākṛtiṃ sitaṃ kaśāmṛduhatibhiḥ pracodayat mahāvṛṣaṃ gaṇatumulāhitekṣaṇaṃ sa bhūdharānaśaniriva prakampayan

हिन्दी अर्थ

राज्य इन्द्रको सौंप दिया। साथ ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने भूमितलके नीचे सुतल नामक पाताललोकका राज्य बलिको दे दिया। उस समय सर्वेश्वरेश्वर भगवान् विष्णुने हैत्यराज बलिसे इस प्रकार कहा॥ ६१--७०॥ श्रीभगवान् बोले-हैत्यराज बले! जो तुमने मुझे जलका दान दिया है और मैंने उसे हाथमें ग्रहण कर लिया है, उसके फलस्वरूप तुम एक कल्पतक दीर्घजीवन प्राप्त करोगे और इस वैवस्वत मन्वन्तरके व्यतीत हो जानेपर सावर्णिक मन्वन्तरके आनेपर तुम इन्द्र होओगे। इस समय मैंने एकहत्तर चतुर्युगीतकके लिये त्रिलोकीका सम्पूर्ण राज्य देवराज इन्द्रको दे दिया है। साथ ही इन्द्रके जितने शत्रु होंगे, उन

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 453

ततो हरिर्द्रुतपदपद्धतिः पुरः पुरःसरान्द्रुमनिकरेषु संश्रितान् धरारजःशबलितभूषणो ऽब्रवीत् प्रयात मा कुरुत पथो ऽस्य संकटम्

tato harirdrutapadapaddhatiḥ puraḥ puraḥsarāndrumanikareṣu saṃśritān dharārajaḥśabalitabhūṣaṇo 'bravīt prayāta mā kuruta patho 'sya saṃkaṭam

हिन्दी अर्थ

सबका भी मुझे नियन्त्रण करना है; क्योंकि इन्द्रने तेनाहं परया भक्त्या पूर्वमाराधितो बले॥ ७४ पूर्वकालमें परम भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 454

प्रभोः पुनः प्रथमनियोगमूर्जयन् सुतो ऽब्रवीद् भ्रुकुटिमुखो ऽपि वीरकः वियच्चरा वियति किमस्ति कान्तकं प्रयात नो धरणिधराविदूरतः

prabhoḥ punaḥ prathamaniyogamūrjayan suto 'bravīd bhrukuṭimukho 'pi vīrakaḥ viyaccarā viyati kimasti kāntakaṃ prayāta no dharaṇidharāvidūrataḥ

हिन्दी अर्थ

ममाज्ञया कालमिमं तिष्ठ स्त्रीशतसंवृतः यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरोधं करिष्यसि। तावदेतान् महाभोगानवाप्स्यसि महासुर यदा च देवविप्राणां विरोधं त्वं करिष्यसि। बन्धिष्यन्ति तदा पाशा वारुणास्त्वामसंशयम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 455

महार्णवाः कुरुत शिलोपमं पयः सुरद्विषागमनमहातिकर्दमम् गणेश्वराश् चपलतया न गम्यतां सुरेश्वरैः स्थिरमतिभिर् निरीक्ष्यते

mahārṇavāḥ kuruta śilopamaṃ payaḥ suradviṣāgamanamahātikardamam gaṇeśvarāś capalatayā na gamyatāṃ sureśvaraiḥ sthiramatibhir nirīkṣyate

हिन्दी अर्थ

न विरोध: सुरैः कार्यो विप्रैर्वा हैत्यसत्तम इत्येवमुक्तो देवेन विष्णुना प्रभविष्णुना बलिः प्राह महाराज प्रणिपत्य मुदा युतः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 456

न भृङ्गिणा स्वतनुमवेक्ष्य नीयते पिनाकिनः पृथुमुखमण्डम् अग्रतः वृथा यमः प्रकटितदन्तकोटरं त्वमायुधं वहसि विहाय संभ्रमम्

na bhṛṅgiṇā svatanumavekṣya nīyate pinākinaḥ pṛthumukhamaṇḍam agrataḥ vṛthā yamaḥ prakaṭitadantakoṭaraṃ tvamāyudhaṃ vahasi vihāya saṃbhramam

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवानुवाच दानान्यविधिदत्तानि श्राद्धान्यश्रोत्रियाणि च। हुतान्यश्रद्धया यानि तानि दास्यन्ति ते फलम् अदक्षिणास्तथा यज्ञाः क्रियाश्चाविधिना कृता: । फलानि तव दास्यन्ति अधीतान्यव्रतानि च प्रशशास यथापूर्वमिन्द्रसत्रैलोक्यपूजितः। सिषेवे च परान् कामान् बलिः पातालसंस्थित:

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 457

पदं न यद्रथतुरगैः पुरद्विषः प्रमुच्यते बहुतरमातृसंकुलम् अमी सुराः पृथगनुयायिभिर्वृताः पदातयो द्विगुणपथान् हरप्रियाः

padaṃ na yadrathaturagaiḥ puradviṣaḥ pramucyate bahutaramātṛsaṃkulam amī surāḥ pṛthaganuyāyibhirvṛtāḥ padātayo dviguṇapathān harapriyāḥ

हिन्दी अर्थ

इहैव देवदेवेन बद्धोऽसौ दानवोत्तमः। देवानां कार्यकरणे भूयोऽपि जगति स्थितः सम्बन्धी ते महाभाग द्वारकायां व्यवस्थितः।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 458

स्ववाहनैः पवनविधूतचामरैश् चलध्वजैर्व्रजत विहारशालिभिः सुराः स्वकं किमिति सरागमूर्जितं विचार्यते नियतलयत्रयानुगम्

svavāhanaiḥ pavanavidhūtacāmaraiś caladhvajairvrajata vihāraśālibhiḥ surāḥ svakaṃ kimiti sarāgamūrjitaṃ vicāryate niyatalayatrayānugam

हिन्दी अर्थ

असुर! तुम सुतल नामक मनोहर पाताललोकमें जाकर मेरे आदेशका ठीक-ठीक पालन करते हुए निवास करो महासुर! जो दिव्य वनोंसे युक्त एवं सैकड़ों महलोंसे समन्वित है, जिसके सरोवरोंमें कमल खिले हुए हैं, जहाँ शुद्ध एवं श्रेष्ठ नदियाँ बह रही हैं, जो नाच-गानसे मनको लुभानेवाला है, उस सुतललोकमें तुम सुगन्धित धूप, माला, वस्त्र और उत्तम आभूषणोंसे विभूषित तथा माला और चन्दनादिसे हर्षित होकर विविध प्रकारके अन्न-पान आदिका उपभोग करो और मेरी आज्ञासे सैकड़ों स्त्रियोंके साथ उतने समयतक निवास करो। महासुर! जबतक तुम देवताओं और ब्राह्मणोंसे विरोध नहीं करोगे, तबतक तुम इन सभी महाभोगोंको प्राप्त

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 459

न किंनरैर् अभिभवितुं हि शक्यते विभूषणचयसमुद्भवो ध्वनिः अजातिजाः किमिति न षड्जमध्यम् अपृथुस्वरं बहुतरमत्र वक्ष्यते

na kiṃnarair abhibhavituṃ hi śakyate vibhūṣaṇacayasamudbhavo dhvaniḥ ajātijāḥ kimiti na ṣaḍjamadhyam apṛthusvaraṃ bahutaramatra vakṣyate

हिन्दी अर्थ

करते रहोगे। जब तुम देवताओं तथा ब्राह्मणोंका विरोध करोगे, तब तुम्हें वरुणके पाश बाँध लेंगे-इसमें संदेह नहीं है। हैत्यश्रेष्ठ! ऐसा जानकर तुम मेरी आज्ञाओंका पूर्णरूपसे पालन करो! तुम्हें देवताओं अथवा ब्राह्मणोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिए ॥७१--८१॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 460

नतानतानतनततानतां गताः पृथक्तया समयकृता विभिन्नताम् विशङ्किता भवदतिभेदशीलिनः प्रयान्त्यमी द्रुतपदमेव गौडकाः

natānatānatanatatānatāṃ gatāḥ pṛthaktayā samayakṛtā vibhinnatām viśaṅkitā bhavadatibhedaśīlinaḥ prayāntyamī drutapadameva gauḍakāḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले-महाराज! प्रभावशाली भगवान् विष्णुके द्वारा ऐसा कहे जानेपर बलि प्रमुदित हो प्रणाम करके बोला बलिने पूछा-- भगवन्! आपके आदेशसे उस पाताललोकमें निवास करते समय मेरे लिये सुखभोगोंको प्राप्त करानेवाले कौन-से उपादान कारण होंगे ? श्रीभगवानूने कहा--जो विधानसे रहित किये गये दान, बिना श्रोत्रिय ब्राह्मणके किये गये श्राद्ध और श्रद्धाहित किये हुए हवन हैं, ये सब तुम्हें अपना फल प्रदान करेंगे। दक्षिणाहीन यज्ञ, बिना विधिके की हुई

English

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अध्याय 154

श्लोक 461

विसंहताः किमिति न षाड्गवादयः स्वगीतकैर् ललितपदप्रयोगजैः प्रभोः पुरो भवति हि यस्य चाक्षतं समुद्गतार्थकमिति तत्प्रतीयते

visaṃhatāḥ kimiti na ṣāḍgavādayaḥ svagītakair lalitapadaprayogajaiḥ prabhoḥ puro bhavati hi yasya cākṣataṃ samudgatārthakamiti tatpratīyate

हिन्दी अर्थ

क्रियाएँ और ब्रह्मचर्य-व्रतसे रहित अध्ययन-ये सभी तुम्हें अपना फल देंगे शौनकजीने कहा--बलिको यह वरदान तथा इन्द्रको स्वर्गका राज्य देकर भगवान् विष्णु अपने उस सर्वव्यापक रूपके साथ अदृश्य हो गये। तत्पश्चात् इन्द्र तीनों लोकोंमें पूजित होकर पूर्ववत् शासन करने लगे तथा

English

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अध्याय 154

श्लोक 462

अमी पृथग्विरचितरम्यरासकं विलासिनो बहुगमकस्वभावकम् प्रयुञ्जते गिरिशयशोविसारिणं प्रकीर्णकं बहुतरनागजातयः

amī pṛthagviracitaramyarāsakaṃ vilāsino bahugamakasvabhāvakam prayuñjate giriśayaśovisāriṇaṃ prakīrṇakaṃ bahutaranāgajātayaḥ

हिन्दी अर्थ

बलि पातालमें स्थित होकर उत्तम मनोरथोंका सेवन करने लगे। महाभाग! वह दानवराज बलि भगवान् विष्णुद्वारा यहीं बाँधा गया था। वे भगवान् देवताओंका कार्य करनेके लिये फिर इस पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए हैं, जो दानवॉका दानवानां विनाशाय भारावतरणाय च॥ ८९ विनाश तथा पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये सहायभूतः सारथ्यं करिष्यति बलानुजः

English

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अध्याय 154

श्लोक 463

अमी कथं ककुभि कथाः प्रतिक्षणं ध्वनन्ति ते विविधवधूविमिश्रिताः न जातयो ध्वनिमुरजासमीरिता न मूर्छिताः किमिति च मूर्छनात्मकाः

amī kathaṃ kakubhi kathāḥ pratikṣaṇaṃ dhvananti te vividhavadhūvimiśritāḥ na jātayo dhvanimurajāsamīritā na mūrchitāḥ kimiti ca mūrchanātmakāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रुतवानिह ते पृष्टं माहात्म्यं केशवस्य च। गङ्काद्वारमितो यास्याम्यानुज्ञां देहि मे विभो एवमुक्त्वा ययौ पार्थो नैमिषं शौनको गतः। इत्येतद् देवदेवस्य विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्। वामनस्य पठेद् यस्तु सर्वपापैः प्रमुच्यते

English

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अध्याय 154

श्लोक 464

श्रुतिप्रियक्रमगतिभेदसाधनं ततादिकं किमिति न तुम्बरेरितम् ।न हन्यते बहुविधवाद्यडम्बरं प्रकीर्णवीणामुरजादि नाम यत्

śrutipriyakramagatibhedasādhanaṃ tatādikaṃ kimiti na tumbareritam / na hanyate bahuvidhavādyaḍambaraṃ prakīrṇavīṇāmurajādi nāma yat

हिन्दी अर्थ

कृष्णरूपसे यदुकुलमें उत्पन्न होकर विराजमान हैं। वे तुम्हारे सम्बन्धी हैं। बलरामके छोटे भाई वे श्रीकृष्ण तुम्हारे शत्रुओंके निग्रहके समय सारथिरूपसे तुम्हारी सहायता करेंगे। महावीर अर्जुन! बुद्धिमान् वामनके अवतारकी यह सारी कथा मैंने तुमसे वर्णन कर दी, जिसे अर्जुन बोले--विभो ! भगवान् विष्णुके माहात्म्यको, जिसे मैंने पूछा था, उसे मैं आपके मुखसे सुन चुका। अब मैं यहाँसे गङ्गाद्वार (हरिद्वार) जाना चाहता हूँ, इसके लिये आप मुझे आज्ञा प्रदान कीजिये

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।