Matsya Purana
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

588 श्लोकभाग 6/9 · श्लोक 327–396

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 154

श्लोक 327

सांप्रतं चापि निर्दग्धमदनं वीतरागिणम् कथमाराधयेदीशं मादृशी तादृशं शिवम्

sāṃprataṃ cāpi nirdagdhamadanaṃ vītarāgiṇam kathamārādhayedīśaṃ mādṛśī tādṛśaṃ śivam

हिन्दी अर्थ

यं बुद्ध्वा सर्वभूतानि देवदेवेशमव्ययम्। न पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्ति नमामि तम् यो यज्ञे यज्ञपरमैरीज्यते यज्ञसंज्ञितः। तं यज्ञपुरुषं विष्णुं नमामि प्रभुमीश्वरम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 328

इत्युक्ता मुनयस्ते तु स्थिरतां मनसस्ततः ज्ञातुमस्या वचः प्रोचुः प्रक्रमात्प्रकृतार्थकम्

ityuktā munayaste tu sthiratāṃ manasastataḥ jñātumasyā vacaḥ procuḥ prakramātprakṛtārthakam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं येन विश्वमिदं ततम्। मायाजालं समुत्तर्तु तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् विश्वं विश्वपतिं विष्णुं तं नमामि प्रजापतिम् यमाराध्य विशुद्धेन मनसा कर्मणा गिरा। तरन्त्यविद्यामखिलां तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 329

द्विविधं तु सुखं तावत् पुत्रि लोकेषु भाव्यते शरीरस्यास्य संभोगैश् चेतसश्चापि निर्वृतिः

dvividhaṃ tu sukhaṃ tāvat putri lokeṣu bhāvyate śarīrasyāsya saṃbhogaiś cetasaścāpi nirvṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

नृत्यत्यखिलभूतस्थस्तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् रात्रिजंसूर्यरूपीव तमुपेन्द्रं नमाम्यहम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 330

प्रकृत्या स तु दिग्वासा भीमः पितृवणेशयः कपाली भिक्षुको नग्नो विरूपाक्षः स्थिरक्रियः

prakṛtyā sa tu digvāsā bhīmaḥ pitṛvaṇeśayaḥ kapālī bhikṣuko nagno virūpākṣaḥ sthirakriyaḥ

हिन्दी अर्थ

हन्ति ज्ञानप्रदानेन तमुपेन्द्रं नमाम्यहम् यस्याक्षिणी चन्द्रसूर्यौ सर्वलोकशुभाशुभम्। पश्यतः कर्म सततमुपेन्द्रं तं नमाम्यहम् नानृतं तमजं विष्णुं नमामि प्रभवाप्ययम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 331

प्रमत्तोन्मत्तकाकारो बीभत्सकृतसंग्रहः यतिना तेन कस्ते ऽर्थो मूर्तानर्थेन काङ्क्षितः

pramattonmattakākāro bībhatsakṛtasaṃgrahaḥ yatinā tena kaste 'rtho mūrtānarthena kāṅkṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिवादन है। जो प्रवृत्ति और निवृत्तिमें अपने कर्मोद्वारा पूजित होते हैं तथा स्वर्ग और अपवर्गके फलदाता हैं, उन गदाधारीको नमस्कार है। जो मनसे चिन्तन किये जानेपर शीघ्र ही पापको नष्ट कर देते हैं, उन आदिकर्ता परात्पर विशुद्ध हरिको प्रणाम है। समस्त प्राणी जिन अविनाशी देवदेवेश्वरको जानकर पुनः जन्म-मरणको नहीं प्राप्त होते, उन्हें अभिवादन है। जो यज्ञपरायण लोगोंद्वारा यज्ञमें यज्ञनामसे पूजित होते हैं, उन सामर्थ्यशाली परमेश्वर

English

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अध्याय 154

श्लोक 332

यदि ह्यस्य शरीरस्य भोगमिच्छसि सांप्रतम् तत्कथं ते महादेवाद् भयभाजो जुगुप्सितात्

yadi hyasya śarīrasya bhogamicchasi sāṃpratam tatkathaṃ te mahādevād bhayabhājo jugupsitāt

हिन्दी अर्थ

यज्ञपुरुष विष्णुको मैं नमस्कार करती हूँ विद्वानोंके स्वामी जो भगवान् वेदवेत्ताओंद्वारा सम्पूर्ण वेदोंमें गाये जाते हैं, उन वेदोंद्वारा जाननेयोग्य विजयशील विष्णुको प्रणाम है। जिससे विश्व उत्पन्न हुआ है और जिसमें यह लीन हो जायगा, उन वेद-मर्यादाके रक्षक महात्मा विष्णुको अभिवादन है। जिसके द्वारा ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त इस विश्वका विस्तार हुआ है, उन उपेन्द्रको मायाजालसे उद्धार पानेके लिये मैं नमस्कार करती हूँ। जो ईश्वर जलरूपसे स्थित होकर सम्पूर्ण

English

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अध्याय 154

श्लोक 333

स्रवद्रक्तवसाभ्यक्तकपालकृतभूषणात् श्वसदुग्रभुजंगेन्द्रकृतभूषणभीषणात्

sravadraktavasābhyaktakapālakṛtabhūṣaṇāt śvasadugrabhujaṃgendrakṛtabhūṣaṇabhīṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

विश्वका भरण-पोषण करते हैं, उन विश्वेश्वर प्रजापति विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। विशुद्ध मन, वचन एवं कर्मद्वारा जिनकी आराधना कर मनुष्य सम्पूर्ण अविद्याको पार कर जाते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जो सभी चराचर जीवोंमें विद्यमान रहकर सुख- दुःखसे उत्पन्न हुए दुःख, संतोष और क्रोध आदिके वशीभूत हो निरन्तर नाचते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ। जो रात्रिजन्य अन्धकारको सूर्यकी

English

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अध्याय 154

श्लोक 334

श्मशानवासिनो रौद्रप्रमथानुगतात् सति सुरेन्द्रमुकुटव्रातनिघृष्टचरणो ऽरिहा

śmaśānavāsino raudrapramathānugatāt sati surendramukuṭavrātanighṛṣṭacaraṇo 'rihā

हिन्दी अर्थ

तरह असुरमय मूर्तिमान् अन्धकारका विनाश करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं प्रणाम करती हूँ। जो कपिल आदि महर्षियोंके रूपमें स्थित होकर ज्ञानदानद्वारा आज्ञानान्धकारको दूर करते हैं, उन उपेन्द्रको मैं अभिवादन करती हूँ। जिनके नेत्रस्वरूप चन्द्रमा और सूर्य समस्त संसारके शुभाशुभ कर्माको बराबर देखते रहते हैं, उन उपेन्द्रको मैं नमस्कार करती हूँ । जिन सर्वेश्वरके लिये मैंने इन सभी विशेषणोंको सत्यरूपसे वर्णन किया है, मिथ्या नहीं, उन अजन्मा एवं उत्पत्ति-विनाशके कारणभूत विष्णुको मैं प्रणाम करती हूँ। मैंने उनके विषयमें जितनी सत्य बातें कही हैं, जनार्दन उससे भी बढ़कर हैं। इस सत्यके

English

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अध्याय 154

श्लोक 335

हरिरस्ति जगद्धाता श्रीकान्तो ऽनन्तमूर्तिमान् नाथो यज्ञभुजामस्ति तथेन्द्रः पाकशासनः

harirasti jagaddhātā śrīkānto 'nantamūrtimān nātho yajñabhujāmasti tathendraḥ pākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

एवं स्तुतः स भगवान् वासुंदेब उवाच ताम्। अदृश्य: सर्वभूतानां तस्याः संदर्शने स्थितः तांस्त्वं प्राप्स्यसि धर्मज्ञे मत्प्रसादान्न संशयः

English

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अध्याय 154

श्लोक 336

देवतानां निधिश्चास्ति ज्वलनः सर्वकामकृत् वायुरस्ति जगद्धाता यः प्राणः सर्वदेहिनाम्

devatānāṃ nidhiścāsti jvalanaḥ sarvakāmakṛt vāyurasti jagaddhātā yaḥ prāṇaḥ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

तमाशु व्रियतां कामं श्रेयस्ते सम्भविष्यति। मद्दर्शनं हि विफलं न कदाचिद् भविष्यति यदि देव प्रसन्नस्त्वं मद्भक्त्या भक्तवत्सल। त्रैलोक्याधिपतिः पुत्रस्तदस्तु मम वासवः हृतं राज्यं हृताश्चास्य यज्ञभागा महासुरैः । त्वयि प्रसन्ने वरदे तान् प्राप्नोतु सुतो मम

English

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अध्याय 154

श्लोक 337

तथा वैश्रवणो राजा सर्वार्थमतिमान्विभुः एभ्य एकतमं कस्मान् न त्वं सम्प्राप्तुमिच्छसि

tathā vaiśravaṇo rājā sarvārthamatimānvibhuḥ ebhya ekatamaṃ kasmān na tvaṃ samprāptumicchasi

हिन्दी अर्थ

हृतं राज्यं न दुःखाय मम पुत्रस्य केशव। सापत्नाद् दायनिभ्रशो बाधां नः कुरुते ह॒दि श्रीभगवानुवाच कृतः प्रसादो हि मया तव देवि यथेप्सितः। स्वांशेन चैव ते गर्भे सम्भविष्यामि कश्यपात्

English

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अध्याय 154

श्लोक 338

उतान्यदेहसंप्राप्त्या सुखं ते मनसेप्सितम् एवमेतत्तवाप्यत्र प्रभवो नाकसंपदाम् अस्मिन्नेव पराः सर्वाः कल्याणप्राप्तयस्तव

utānyadehasaṃprāptyā sukhaṃ te manasepsitam evametattavāpyatra prabhavo nākasaṃpadām asminneva parāḥ sarvāḥ kalyāṇaprāptayastava

हिन्दी अर्थ

प्रसीद देवदेवेश नमस्ते विश्वभावन। नाहं त्वामुदरे देव वोढुं शक्ष्यामि केशव प्रतिष्ठितं न मां शक्ता वोढं सेन्द्रा दिबौकसः किंत्वहं सकलाँल्लोकान् सदेवासुरमानुषान्। जङ्गमान् स्थावरान् सर्वास्त्वां च देवि सकश्यपाम्।

English

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अध्याय 154

श्लोक 339

पितुरेवास्ति तत्सर्वं सुरेभ्यो यन्न विद्यते अतस्तत्प्राप्तये क्लेशः स वाप्यत्राफलस्तव

piturevāsti tatsarvaṃ surebhyo yanna vidyate atastatprāptaye kleśaḥ sa vāpyatrāphalastava

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने कहा--इस प्रकार स्तुति किये जानेपर भगवान् वासुदेव, जो समस्त प्राणियोंके लिये अदर्शनीय हैं, अदितिके समक्ष उपस्थित होकर उनसे इस प्रकार बोले श्रीभगवान्ने कहा--धर्मज्ञा अदिते! तुम जिन अभीष्ट मनोरथोंको प्राप्त करना चाहती हो उन्हें तुम मेरी कृपासे प्राप्त करोगी, इसमें संदेह नहीं है। महाभाग्यशालिनि! सुनो, तुम्हारे हृदयमें जो वरदान स्थित है उसे शीघ्र ही

English

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अध्याय 154

श्लोक 340

प्रायेण प्रार्थितो भद्रे सुस्वल्पो ह्यतिदुर्लभः अस्य ते विधियोगस्य धाता कर्तात्र चैव हि

prāyeṇa prārthito bhadre susvalpo hyatidurlabhaḥ asya te vidhiyogasya dhātā kartātra caiva hi

हिन्दी अर्थ

इच्छानुसार माँग लो। तुम्हारा कल्याण होगा; क्योंकि मेरा दर्शन कभी विफल नहीं होता अदिति बोलीं भक्तवत्सल देव! यदि आप मेरी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो मेरा पुत्र इन्द्र पुनः त्रिलोकीका स्वामी हो जाय। महान् असुरोंद्वारा मेरे पुत्रका राज्य छीन लिया गया है तथा उसके यज्ञभागोंपर भी अधिकार कर लिया गया है। अब आप-जैसे वरदानीके प्रसन्न हो जानेपर मेरा पुत्र पुनः उन्हें प्राप्त करे। केशव ! मेरे पुत्रका छीना हुआ राज्य मुझे उतना कष्ट नहीं दे रहा है, जितना सौतेले पुत्रँद्वारा मेरे पुत्रोंका अपने हिस्सेसे भ्रष्ट हो जाना

English

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अध्याय 154

श्लोक 341

इत्युक्ता सा तु कुपिता मुनिवर्येषु शैलजा उवाच कोपरक्ताक्षी स्फुरद्भिर्दशनच्छदैः

ityuktā sā tu kupitā munivaryeṣu śailajā uvāca koparaktākṣī sphuradbhirdaśanacchadaiḥ

हिन्दी अर्थ

मेरे हृदयमें चुभ रहा है॥ ३८--४०॥ श्रीभगवानूने कहा--देवि ! मैंने तुम्हारे इच्छानुसार तुमपर कृपा की है। मैं अपने अंशसे युक्त कश्यपके सम्पर्कसे तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होऊँगा। इस प्रकार तुम्हारे गर्भसे उत्पन्न होकर मैं देवताओंके उन सभी

English

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अध्याय 154

श्लोक 342

असद्ग्रहस्य का प्रीतिर् व्यसनस्य क्व यन्त्रणा विपरीतार्थबोद्धारः सत्पथे केन योजिताः

asadgrahasya kā prītir vyasanasya kva yantraṇā viparītārthaboddhāraḥ satpathe kena yojitāḥ

हिन्दी अर्थ

शत्रुओंका वध करूँगा। नन्दिनि! अब तुम तपसे निवृत्त हो जाओ अदिति बोलीं--जगत्कर्ता देवेश्वर! आपको नमस्कार है। आप मुझपर कृपा कीजिये। केशव! मैं आपको गर्भमें धारण करनेमें समर्थ नहीं हो सकती। यह सारा विश्व जिसमें स्थित है तथा जो स्वयं इस विश्वके स्वामी हैं, उन दुर्धर्ष आपको मैं अपने गर्भमें धारण करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ

English

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अध्याय 154

श्लोक 343

एवं मां वेत्थ दुष्प्रज्ञां ह्य् अस्थानासद्ग्रहप्रियाम् न मां प्रतिविचारो ऽस्ति यत्रेहासद्ग्रहावितौ

evaṃ māṃ vettha duṣprajñāṃ hy asthānāsadgrahapriyām na māṃ prativicāro 'sti yatrehāsadgrahāvitau

हिन्दी अर्थ

श्रीभगवानने कहा-- महाभागे! तुम सच कह रही हो। यह सारा जगत् मुझमें स्थित है, अतः इन्द्रसहित समस्त देवता मेरा भार वहन करनेमें समर्थ नहीं हो सकते, किंतु देवि! मैं देवताओं, असुरों और मनुष्योंसहित सभी लोकोंको, सम्पूर्ण चराचरको तथा

English

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अध्याय 154

श्लोक 344

प्रजापतिसमाः सर्वे भवन्तः सर्वदर्शिनः नूनं न वेत्थ तं देवं शाश्वतं जगतः प्रभुम्

prajāpatisamāḥ sarve bhavantaḥ sarvadarśinaḥ nūnaṃ na vettha taṃ devaṃ śāśvataṃ jagataḥ prabhum

हिन्दी अर्थ

धारयिष्यामि भद्रं ते तदलं सम्भ्रमेण ते॥ ४६ कश्यपसहित तुमको धारण करूँगा। तुम्हारा कल्याण हो, ९३४ मत्स्यपुराण न ते ग्लानिर्न ते खेदो गर्भस्थे भविता मयि । अब तुम्हें विकल नहीं होना चाहिए । तुम्हारे गर्भमें मेरे दाक्षायणि प्रसादं ते करोम्यन्यैः सुदुर्लभम्॥ ४७ स्थित होनेपर तुम्हें न तो ग्लानि होगी, न खेद होगा ।

English

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अध्याय 154

श्लोक 345

अजमीशानमव्यक्तम् अमेयमहिमोदयम्

ajamīśānamavyaktam ameyamahimodayam

हिन्दी अर्थ

दि दाक्षायणि! मैं तुमपर .ऐसी कृपा करूँगा जो दूसरोंके गर्भस्थे मयि पुत्राणां तव योउरिभविष्यति। लिये परम दुर्लभ है । मेरे गर्भमें स्थित रहनेपर तुम्हारे तेजसस्तस्य हानिं च करिष्ये मा व्यथां कृथाः ॥ ४८ पुत्रोंका जो शत्रु होगा उसके तेजोबलको मैं विनष्ट कर शौनक उवाच दूँगा। तुम दुःख मत करो॥ ४५--४८॥ एवमुक्त्वा ततः सद्यो यातोऽन्तर्धानमीश्वरः। शौनकजी बोले--कुरुश्रेष्ठ ऐसा कहकर भगवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 346

आस्तां तद्धर्मसद्भावसंबोधस्तावदद्भुतः विदुर्यं न हरिब्रह्मप्रमुखा हि सुरेश्वराः

āstāṃ taddharmasadbhāvasaṃbodhastāvadadbhutaḥ viduryaṃ na haribrahmapramukhā hi sureśvarāḥ

हिन्दी अर्थ

सापि कालेन तं गर्भमवाप कुरुसत्तम॥ तुरंत अन्तर्हित हो ग हि तात कुरुकत ४३ उस गर्भको धारण किया। भगवान् विष्णुके गर्भस्थित चकम्पिरे महाशैलाः क्षोभं जग्मुस्तथाब्धयः॥ ५० काँपने लगे तथा समुद्रमें ज्वार-भाटा उठने लगा। सुन्दर पद रखती थीं, वहाँ-वहाँ भारके कारण पृथ्वी ततस्ततः क्षितिः खेदान्ननाम वसुधाधिप॥ ५ विनम्र हो जाती थी। भगवान् विष्णुके गर्भस्थ होनेपर

English

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अध्याय 154

श्लोक 347

यत्तस्य विभवात्स्वोत्थं भुवनेषु विजृम्भितम् प्रकटं सर्वभूतानां तदप्यत्र न वेत्थ किम्

yattasya vibhavātsvotthaṃ bhuvaneṣu vijṛmbhitam prakaṭaṃ sarvabhūtānāṃ tadapyatra na vettha kim

हिन्दी अर्थ

हैत्यानामथ सर्वेषां गर्भस्थे मधुसूदने। सभी हैत्योंके तेज बिलकुल मन्द हो गये, जैसा कि बभूव तेजसां हानिर्यथोक्तं परमेष्ठिना॥ ५२ भगवान्ने अदितिसे पहले कहा था॥ ४९--५२॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावेऽदितिवरप्रदानं नाम चतुश्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 154

श्लोक 348

कस्यैतद्गगनं भूरितः कस्याग्निः कस्य मारुतः कस्य भूः कस्य वरुणः कश्चन्द्रार्कविलोचनः

kasyaitadgaganaṃ bhūritaḥ kasyāgniḥ kasya mārutaḥ kasya bhūḥ kasya varuṇaḥ kaścandrārkavilocanaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव-प्रसंगमें अदितिको वरदान नामक दो सौ चौवालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ बलिद्वारा विष्णुकी निन्दापर प्रह्मादका उन्हें शाप, बलिका अनुनय, ब्रह्माजीद्वारा वामनभगवानूका स्तवन, भगवान् वामनका देवताओंको आश्वासन तथा उनका बलिके यज्ञके लिये प्रस्थान शौनक उवाच शौनकजीने कहा-असुरराज बलिने समस्त निस्तेजसोऽसुरान् दृष्टा समस्तानसुरेश्वरः। हैत्योंको निस्तेज देखकर अपने पितामह प्रह्वादसे प्रह्मादमथ पप्रच्छ बलिरात्मपितामहम्॥ १ प्रश्‍न किया

English

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अध्याय 154

श्लोक 349

कस्यार्चयन्ति लोकेषु लिङ्गं भक्त्या सुरासुराः यं ब्रुवन्तीश्वरं देवा विधीन्द्राद्या महर्षयः

kasyārcayanti lokeṣu liṅgaṃ bhaktyā surāsurāḥ yaṃ bruvantīśvaraṃ devā vidhīndrādyā maharṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

याचे बलिने पूछा--तात! क्या बात है कि आज सहसा ये हैत्यगण अग्निसे जले हुएके समान निस्तेज तात निस्तेजसो हैत्या निर्दग्धा इव वहिना। ब्रहमदण्डसे मारे हुएकी भाँति निर्बल दिखायी पड़ने

English

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अध्याय 154

श्लोक 350

प्रभावं प्रभवं चैष तेषामपि न वेत्थ किम् अदितिः कस्य मातेयं कस्माज्जातो जनार्दनः

prabhāvaṃ prabhavaṃ caiṣa teṣāmapi na vettha kim aditiḥ kasya māteyaṃ kasmājjāto janārdanaḥ

हिन्दी अर्थ

किमेते सहसैवाद्य ब्रह्मदण्डहता इव॥२लगे हैं? क्या हैत्योके ऊपर कोई अरिष्ट आ गया है? र Fe या वैरियोंद्वारा निर्मित कोई कृत्या इनका विनाश करनेके अरिष्टं किं नु हैत्यानां किं कृत्या वैरिनिर्मिता। लिये प्रकट हुई है, जिससे ये असुर तेजोहीन- हो जाशायैषा समुद्भूता यया निस्तेजसोऽसुराः॥ ३ गये हैं ? इति हैत्यपतिर्धीरः पृष्टः पौत्रेण पार्थिव। चिरं ध्यात्वा जगाहैनमसुरेन्द्रं बलिं तदा

English

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अध्याय 154

श्लोक 351

अदितेः कश्यपाज्जाता देवा नारायणादयः मरीचेः कश्यपः पुत्रो ह्य् अदितिर्दक्षपुत्रिका

aditeḥ kaśyapājjātā devā nārāyaṇādayaḥ marīceḥ kaśyapaḥ putro hy aditirdakṣaputrikā

हिन्दी अर्थ

सर्वे समुद्राः क्षुभिता हैत्या निस्तेजसः कृता: देवानां च परा लक्ष्मीः कारणैरनुमीयते

English

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अध्याय 154

श्लोक 352

मरीचिश्चापि दक्षश्च पुत्रौ तौ ब्रह्मणः किल ब्रह्मा हिरण्मयात्त्वण्डाद् दिव्यसिद्धिविभूतिकम्

marīciścāpi dakṣaśca putrau tau brahmaṇaḥ kila brahmā hiraṇmayāttvaṇḍād divyasiddhivibhūtikam

हिन्दी अर्थ

महदेतन्महाबाहो कारणं दानवेश्वर। न ह्यल्पमिति मन्तव्यं त्वया कार्य सुरार्दन अत्यन्तभक्तो देवेशं जगाम मनसा हरिम् विचारयामास ततो यतो देवो जनार्दनः

English

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अध्याय 154

श्लोक 353

कस्य प्रादुरभूद्ध्यानात् प्रक्षुब्धाः प्राकृतांशकाः प्रकृतौ तु तृतीयायां मधुद्विड्जननक्रिया

kasya prādurabhūddhyānāt prakṣubdhāḥ prākṛtāṃśakāḥ prakṛtau tu tṛtīyāyāṃ madhudviḍjananakriyā

हिन्दी अर्थ

अन्तःस्थान् बिश्नतं सप्त लोकानादिप्रजापतिम् वयोमनुष्यानखिलांस्तथैव च सरीसृपान्। समस्तलोकस््रष्टारं ब्रह्माणं भवमेव च। ग्रहनक्षत्रनागांश्च॒ दक्षाद्यांश्च प्रजापतीन्

English

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अध्याय 154

श्लोक 354

जाता ससर्ज षड्वर्गान् बुद्धिपूर्वान् स्वकर्मजान् अजातको ऽभवद्वेधा ब्रह्मणो ऽव्यक्तजन्मनः

jātā sasarja ṣaḍvargān buddhipūrvān svakarmajān ajātako 'bhavadvedhā brahmaṇo 'vyaktajanmanaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रह्मादः प्राह हैत्येन्द्रं बलिं वैरोचनिं तदा देवदेवो जगद्योनिरयोनिर्जगदादिकृत्। अनादिरादिर्विश्वस्य वरेण्यो वरदो हरिः शौनकजीने कहा--राजन्! इस प्रकार अपने पौत्र बलिद्वारा पूछे जानेपर धेर्यशाली हैत्यपति प्रह्णादने बहुत देरतक ध्यानकर उस असुरनायक बलिसे कहा

English

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अध्याय 154

श्लोक 355

यः स्वयोगेन संक्षोभ्य प्रकृतिं कृतवानिदम् ब्रह्मणः सिद्धसर्वार्थम् ऐश्वर्यं लोककर्तृताम्

yaḥ svayogena saṃkṣobhya prakṛtiṃ kṛtavānidam brahmaṇaḥ siddhasarvārtham aiśvaryaṃ lokakartṛtām

हिन्दी अर्थ

प्रह्लाद बोले--दानवराज बलि! इस समय पर्वत काँप उठे हैं, पृथ्वीने अपनी स्वाभाविक धीरता छोड़ दी है, सभी समुद्र विक्षुब्ध हो उठे हैं और हैत्यगण तेजोहीन कर दिये गये हैं। ग्रहगण सूर्योदय होनेपर जिस प्रकार पहले सूर्यका अनुगमन करते थे वैसा अब नहीं कर रहे हैं। कुछ कारणोंसे ऐसा अनुमान होता है कि

English

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अध्याय 154

श्लोक 356

विदुर्विष्ण्वादयो यच्च स्वमहिम्ना सदैव हि कृत्वान्यं देहम् अन्या दृक् तादृक् कृत्वा पुनर्हरिः

vidurviṣṇvādayo yacca svamahimnā sadaiva hi kṛtvānyaṃ deham anyā dṛk tādṛk kṛtvā punarhariḥ

हिन्दी अर्थ

इसका कोई महान् कारण है। सुरार्दन ! तुम्हें इस कार्यको तुच्छ नहीं मानना चाहिए शौनकजीने कहा--परम भक्त असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद दानवराज बलिसे ऐसा कहकर मन-ही-मन देवेश्वर श्रीहरिकी शरणमें गये। तत्पश्चात् प्रह्लाद परम मनोहर ध्यानयोगका आश्रय लेकर देवाधिदेव जनार्दनका ध्यान करने लगे। तब उन्होंने अदितिके उदरमें वामनरूपमें उन आदिप्रजापतिको देखा जिनके भीतर सातों लोक विराजमान थे। उस समय प्रह्णादने भगवान्के भीतर वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, विश्वेदेव, आदित्य,

English

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अध्याय 154

श्लोक 357

कुरुते जगतः कृत्यम् उत्तमाधममध्यमम् एवमेव हि संसारो यो जन्ममरणात्मकः

kurute jagataḥ kṛtyam uttamādhamamadhyamam evameva hi saṃsāro yo janmamaraṇātmakaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने-आप, पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि, समुद्र, वृक्ष, नदियाँ, सरोवर, पशु, मृग, पक्षी, मनुष्य, सर्पादि जीव, सभी लोकोंके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, शिव, ग्रह, नक्षत्र, नाग तथा दक्ष आदि प्रजापतियोंको भी देखा। यह देखकर प्रह्माद आश्चर्यचकित हो गये। पुनः क्षणभर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 358

कर्मणश्च फलं ह्येतन् नानारूपसमुद्भवम् अथ नारायणो देवः स्वकां छायां समाश्रयत्

karmaṇaśca phalaṃ hyetan nānārūpasamudbhavam atha nārāyaṇo devaḥ svakāṃ chāyāṃ samāśrayat

हिन्दी अर्थ

बलिसे इस प्रकार कहा प्रह्लाद बोले--वत्स! जिस कारण तुम राक्षसोंके यह हानि उत्पन्न हुई है उस सारे रहस्यको मैं जान गया। उसे तुम पूर्णरूपसे सुनो। जो देवाधिदेव, जगतूके उत्पत्तिस्थान, अजन्मा, जगतके आदिकर्ता, अनादि, विश्वके आदिं, सर्वश्रेष्ठ, वरदायक,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 359

तत्प्रेरितः प्रकुरुते जन्म नानाप्रकारकम् सापि कर्मण एवोक्ता प्रेरणा विवशात्मनाम्

tatpreritaḥ prakurute janma nānāprakārakam sāpi karmaṇa evoktā preraṇā vivaśātmanām

हिन्दी अर्थ

प्रमाणं च प्रमाणानां सप्तलोकगुरोर्गुरुः मनादिमध्यो भगवाननन्तः । त्रैलोक्यमंशेन सनाथमेष

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 360

यथोन्मादादिजुष्टस्य मतिरेव हि सा भवेत् इष्टान्येव यथार्थानि विपरीतानि मन्यते

yathonmādādijuṣṭasya matireva hi sā bhavet iṣṭānyeva yathārthāni viparītāni manyate

हिन्दी अर्थ

कर्तु महात्मादितिजोऽवतीर्णः जानन्ति हैत्याधिप यत्स्वरूपं स वासुदेवः कलयावतीर्णः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 361

लोकस्य व्यवहारेषु सृष्टेषु सहते सदा धर्माधर्मफलावाप्तौ विष्णुरेव निबोधितः

lokasya vyavahāreṣu sṛṣṭeṣu sahate sadā dharmādharmaphalāvāptau viṣṇureva nibodhitaḥ

हिन्दी अर्थ

विशन्ति यञ्ज्ञानविधूतपापाः। तं वासुदेवं प्रणमामि नित्यम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 362

अथानादित्वमस्यास्ति सामान्यात्तु तदात्मना न ह्यस्य जीवितं दीर्घं दृष्टं देहे तु कुत्रचित्

athānāditvamasyāsti sāmānyāttu tadātmanā na hyasya jīvitaṃ dīrghaṃ dṛṣṭaṃ dehe tu kutracit

हिन्दी अर्थ

तं वासुदेवं प्रणमाम्यचिन्त्यम् स्तं वासुदेवं प्रणमाम्यजस्त्रम् 'तमीशमाद्यं प्रणतोऽस्मि विष्णुम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 363

भवद्भिर्यस्य नो दृष्टम् अन्तरग्रमथापि वा देहिनां धर्म एवैष क्वचिज्जायेत्कचिन्म्रियेत्

bhavadbhiryasya no dṛṣṭam antaragramathāpi vā dehināṃ dharma evaiṣa kvacijjāyetkacinmriyet

हिन्दी अर्थ

पापनाशक, परावरोंमें उत्तम, परात्पर, प्रमाणोंके प्रमाण, सातों लोकोंके गुरुके गुरु, प्रभुके प्रभु, पर-से-परे, आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा महान् आत्मबलसे सम्पन्न हैं, वे भगवान् अपने अंशसे त्रिलोकीको सनाथ करनेके लिये अदितिके गर्भसे अवतीर्ण हो रहे हैं। हैत्यपते! जिनके स्वरूपको रुद्र, पद्मयोनि ब्रह्मा, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, मरीचि प्रभृति महर्षिगण नहीं जानते, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे उत्पन्न हो रहे हैं। जिन भगवानूने पूर्वकालमें

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 364

क्वचिद्गर्भगतो नश्येत् क्वचिज् जीवेज्जरामयः क्वचित्समाः शतं जीवेत् क्वचिद्बाल्ये विपद्यते

kvacidgarbhagato naśyet kvacij jīvejjarāmayaḥ kvacitsamāḥ śataṃ jīvet kvacidbālye vipadyate

हिन्दी अर्थ

अपनी एक कलाद्वारा नृसिंहरूपमें अवतीर्ण होकर मेरे पिता (हिरण्यकशिपु)-का वध किया था तथा जो सभी योगिराजोंके मनमें निवास करनेवाले हैं, वे भगवान् वासुदेव अपनी कलासे अवतीर्ण हो रहे हैं। जिनके ज्ञानसे पापमुक्त हुए वेदवेत्ता जिन अव्यय भगवान्को जानकर उनमें प्रवेश करते हैं तथा जिनमें प्रवेश कर पुन: जन्म नहीं धारण करते, उन भगवान् वासुदेवको मैं नित्य प्रणाम करता हुँ समस्त प्राणी समुद्रसे लहरोंकी भाँति जिनसे निरन्तर उत्पन्न होते हैं और प्रलयकालमें पुन: जिनमें लय हो जाते हैं, उन अचिन्त्य वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। जिन परम पुरुषके स्वरूप, बल, प्रभाव और भावको

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 365

शतायुः पुरुषो यस्तु सो ऽनन्तः स्वल्पजन्मनः जीवितो न म्रियत्यग्रे तस्मात्सो ऽमर उच्यते

śatāyuḥ puruṣo yastu so 'nantaḥ svalpajanmanaḥ jīvito na mriyatyagre tasmātso 'mara ucyate

हिन्दी अर्थ

शिव तथा ब्रह्मा आदि देवगण भी नहीं समझ पाते, उन भगवान् वासुदेवको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ। जिन भगवान् वासुदेवने मनुष्योंको स्वरूप देखनेके लिये नेत्र, स्पर्शके लिये चमड़ा, रसास्वादनके लिये जिह्वा, शब्द सुननेके लिये कान तथा सुगन्ध ग्रहण करनेके लिये नासिका दी है, जिन्होंने अपने एक दाँतके अग्रभागपर इस पृथ्वीको, जो सभी पर्वतोंको धारण करती है, धारण किया है, तथा जिनमें यह समस्त जगत् शयन करता है,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 366

अदृष्टजन्मनिधना ह्य् एवं विष्ण्वादयो मताः एतत्संशुद्धमैश्वर्यं संसारे को लभेदिह

adṛṣṭajanmanidhanā hy evaṃ viṣṇvādayo matāḥ etatsaṃśuddhamaiśvaryaṃ saṃsāre ko labhediha

हिन्दी अर्थ

उन आदिभूत भगवान् विष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ । न घ्राणचक्षुः श्रवणादिभिर्यः शक्यस्तमीड्यं मनसैव देवं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 367

तत्र क्षयादियोगात्तु नानाश्चर्यस्वरूपिणि तस्माद्दिवश्चरान्सर्वान् मलिनान्स्वल्पभूतिकान्

tatra kṣayādiyogāttu nānāścaryasvarūpiṇi tasmāddivaścarānsarvān malinānsvalpabhūtikān

हिन्दी अर्थ

नमामि तं देवमनन्तमीश- देवो जगद्योनिरयं महात्मा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 368

नाहं भद्राः किलेच्छामि ऋते शर्वात्पिनाकिनः स्थितं च तारतम्येन प्राणिनां परमं त्विदम्

nāhaṃ bhadrāḥ kilecchāmi ṛte śarvātpinākinaḥ sthitaṃ ca tāratamyena prāṇināṃ paramaṃ tvidam

हिन्दी अर्थ

स देवमातुर्जठरं प्रविष्टो तात कोऽयं हरिर्नाम यतो नो भयमागतम्। सन्ति मे शतशो हैत्या वासुदेवबलाधिकाः अयःशिराश्चाश्वशिरा भङ्गकारी महाहनुः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 369

धीबलैश्वर्यकार्यादिप्रमाणं महतां महत् यस्मान्न किंचिदपरं सर्वं यस्मात्प्रवर्तते

dhībalaiśvaryakāryādipramāṇaṃ mahatāṃ mahat yasmānna kiṃcidaparaṃ sarvaṃ yasmātpravartate

हिन्दी अर्थ

एते चान्ये च मे सन्ति हैतेया दानवास्तथा पौत्रस्यैतद् वचः श्रुत्वा प्रह्मादो हैत्यपुंगवः । धिग्धिगित्याह स बलिं वैकुण्ठाक्षेपवादिनम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 370

यस्यैश्वर्यमनाद्यन्तं तमहं शरणं गता एष मे व्यवसायश्च दीर्घो ऽतिविपरीतकः

yasyaiśvaryamanādyantaṃ tamahaṃ śaraṇaṃ gatā eṣa me vyavasāyaśca dīrgho 'tiviparītakaḥ

हिन्दी अर्थ

विनाशमुपयास्यन्ति मन्ये हैतेयदानवाः। येषां त्वमीहशो राजा दुर्बुद्धिरविवेकवान् देवदेवं महाभागं वासुदेवमजं विभुम्। त्वामृते पापसंकल्पः कोऽन्य एवं वदिष्यति य एते भवता प्रोक्ताः समस्ता हैत्यदानवाः। सब्रह्मकास्तथा देवाः स्थावरानन्तभूमयः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 371

यात वा तिष्ठतैवाथ मुनयो मद्विधायकाः एवं निशम्य वचनं देव्या मुनिवरास्तदा

yāta vā tiṣṭhataivātha munayo madvidhāyakāḥ evaṃ niśamya vacanaṃ devyā munivarāstadā

हिन्दी अर्थ

समुद्र्वीपलोकाश्च न समं केशवस्य हि जो अक्षयात्मा सर्वेश्वर नासिका, नेत्र और काने -आदि इन्द्रियोंद्वारा जाने नहीं जा सकते, जिन्हें केवल मनद्वारा ग्रहण किया जा सकता है उन पूज्य परमेश्वर भगवान् विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ। जिन्होंने गर्भमें अपने अंशमात्रसे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 372

आनन्दाश्रुपरीताक्षाः सस्वजुस्तां तपस्विनीम् ऊचुश्च परमप्रीताः शैलजां मधुरं वचः

ānandāśruparītākṣāḥ sasvajustāṃ tapasvinīm ūcuśca paramaprītāḥ śailajāṃ madhuraṃ vacaḥ

हिन्दी अर्थ

अवतीर्ण होकर बड़े-बड़े हैत्योंके तेजोंका हरण कर लिया है, जो समस्त संसाररूपी वृक्षके लिये कुठारस्वरूप हैं उन अनन्त परमात्मदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। महासुरेन्द्र ! जो ये महान् आत्मबलसे सम्पन्न एवं जगत्के उत्पत्तिस्थान भगवान् विष्णु हैं, ये अपने सोलह अंशॉंसे माता अदितिके उदरमें प्रविष्ट हुए हैं, उन्होंने ही बलपूर्वक तुमलोगोंके शरीरको निस्तेज कर दिया है बलिने कहा--तात! यह हरि कौन है जिससे हम लोगोंको भय प्राप्त हो गया है? मेरे पास तो उस वासुदेवसे भी अधिक बलवान् सैकड़ों हैत्य है । विप्रचित्ति, शिवि, शङ्कु, अयःशङ्क, अयःशिरा, अश्वशिरा, भङ्गकारी,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 373

अत्यद्भुतास्यहो पुत्रि ज्ञानमूर्तिरिवामला प्रसादयति नो भावं भवभावप्रतिश्रयात्

atyadbhutāsyaho putri jñānamūrtirivāmalā prasādayati no bhāvaṃ bhavabhāvapratiśrayāt

हिन्दी अर्थ

महाहनु, प्रताप, प्रघस, शुम्भ, अत्यन्त कठिनाईसे जीतने योग्य कुकुर--ये तथा इनके अतिरिक्त और भी हैत्य एवं दानव मेरे अधिकारमें हैं। ये सभी महाबली, महान् पराक्रमी तथा पृथ्वीके भारको उठानेमें समर्थ हँ । इनमेंसे एक-एकके आधे पराक्रमसे भी कृष्णकी कोई समानता नहीं है॥ ३०--३३ ॥

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 374

ननु विद्मो वयं तस्य देवस्यैश्वर्यमद्भुतम् त्वन्निश्चयस्य दृढतां वेत्तुं वयमिहागताः

nanu vidmo vayaṃ tasya devasyaiśvaryamadbhutam tvanniścayasya dṛḍhatāṃ vettuṃ vayamihāgatāḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले--हैत्यश्रेष्ठ प्रहाद अपने पौत्रकी यह बात सुनकर भगवानूकी निन्दा करनेवाले उस बलिको धिक्कारते हुए बोले प्रह्मादने कहा--मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जिनका तुम-जैसा अविवेकी एवं दुर्बुद्धि राजा है, उन हैत्यों और दानवोंका विनाश हो जायगा। तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन ऐसा पापी होगा जो देवाधिदेव, महाभाग, अजन्मा एवं सर्वव्यापी वासुदेवको ऐसा कहेगा? तुमने जिनका नाम गिनाया है ये सभी हैत्य-दानव, ब्रह्मासहित देवगण, चराचर जगत्, तुम, मैं, पर्वत, वृक्ष, नदी और नदोंसहित यह संसार, समुद्र, द्वीप और लोक--ये

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 375

अचिरादेव तन्वङ्गि कामस्ते ऽयं भविष्यति क्वादित्यस्य प्रभा याति रत्नेभ्यः क्व द्युतिः पृथक्

acirādeva tanvaṅgi kāmaste 'yaṃ bhaviṣyati kvādityasya prabhā yāti ratnebhyaḥ kva dyutiḥ pṛthak

हिन्दी अर्थ

सभी भगवान् केशवकी समानता नहीं कर सकते! ९३८ मत्स्यपुराण

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 376

को ऽर्थो वर्णालिकाव्यक्तः कथं त्वं गिरिशं विना यामो नैकाभ्युपायने तमभ्यर्थयितुं वयम्

ko 'rtho varṇālikāvyaktaḥ kathaṃ tvaṃ giriśaṃ vinā yāmo naikābhyupāyane tamabhyarthayituṃ vayam

हिन्दी अर्थ

एकांशेन जगत् सर्व कस्तमेवं प्रवक्ष्यति यस्य त्वमीदृशः पुत्रो देवदेवस्य निन्दकः इति जानात्ययं लोको न भवान् दितिजाधम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 377

अस्माकमपि वै सो ऽर्थः सुतरां हृदि वर्तते अतस्त्वमेव सा बुद्धिर् यतो नीतिस्त्वमेव हि

asmākamapi vai so 'rthaḥ sutarāṃ hṛdi vartate atastvameva sā buddhir yato nītistvameva hi

हिन्दी अर्थ

निन्दां करोषि तस्य त्वमकुर्वन् गौरवं मम विरोचनस्तव गुरर्गुरुस्तस्याप्यहं॑ बले।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 378

अतो निःसंशयं कायं शंकरो ऽपि विधास्यति इत्युक्त्वा पूजिता याता मुनयो गिरिकन्यया

ato niḥsaṃśayaṃ kāyaṃ śaṃkaro 'pi vidhāsyati ityuktvā pūjitā yātā munayo girikanyayā

हिन्दी अर्थ

निन्दां करोषि यस्तस्मिन् कृष्णे गुरुगुरोर्गुरौः। यस्मात्तस्मादिहैश्वर्यादचिराद् भ्रंशमेष्यसि मम देवो जगन्नाथो बले तावज्जनार्दनः।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 379

प्रययुर्गिरिशं द्रष्टुं प्रस्थं हिमवतो महत् गङ्गाम्बुप्लावितात्मानं पिङ्गबद्धजटासटम्

prayayurgiriśaṃ draṣṭuṃ prasthaṃ himavato mahat gaṅgāmbuplāvitātmānaṃ piṅgabaddhajaṭāsaṭam

हिन्दी अर्थ

भवत्वहमुपेक्ष्यस्ते प्रीतिमानस्तु मे गुरुः इति हैत्यपतिः श्रुत्वा गुरोर्वचनमप्रियम्।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 380

भृङ्गानुयातपाणिस्थमन्दारकुसुमस्रजम् गिरेः सम्प्राप्य ते प्रस्थं ददृशुः शंकराश्रमम्

bhṛṅgānuyātapāṇisthamandārakusumasrajam gireḥ samprāpya te prasthaṃ dadṛśuḥ śaṃkarāśramam

हिन्दी अर्थ

जिन सर्वव्यापी एवं वन्दनीयोंके भी वन्दनीय परमात्माके एक अंशसे यह सारा जगत् उत्पन्न हुआ है, उन्हें अकेले तुम-जैसे अविवेकी, विनाशोन्मुख, कुबुद्धि, अजितात्मा, वृद्धोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करनेवालेके हुआ, जिसके घरमें तुम्हारा नीच पिता उत्पन्न हुआ, जिसके तुम इस प्रकार देवाधिदेव विष्णुकी निन्दा करनेवाले पुत्र हुए। संसारमें जन्म लेकर उपार्जित किये गये पापोंको नष्ट करनेवाली भगवान् कृष्णके चरणोंमें हैत्याधम ! भगवान् (विष्णु) -से बढ़कर मुझे अपना शरीर भी प्रिय नहीं है, इसे यह संसार जानता है, किंतु तुम्हें विदित नहीं है। मेरे प्राणोंसे भी बढ़कर प्रिय भगवान् विष्णुको जानते हुए भी तुम मेरे गौरवकी रक्षा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 381

प्रशान्ताशेषसत्त्वौघं नवस्तिमितकाननम् निःशब्दाक्षोभसलिलप्रपातं सर्वतोदिशम्

praśāntāśeṣasattvaughaṃ navastimitakānanam niḥśabdākṣobhasalilaprapātaṃ sarvatodiśam

हिन्दी अर्थ

न करते हुए उनकी निन्दा कर रहे हो। बलि! तुम्हारा गुरु विरोचन है और मैं उसका भी गुरु हूँ तथा मेरे एवं समस्त संसारके गुरुके भी गुरु नारायण हैं। चूँकि तुम उन गुरुओंके गुरु विष्णुकी निन्दा कर रहे हो, इसलिये इस लोकमें शीघ्र ही ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाओगे। बलि! जगदीश्वर जनार्दन मेरे देवता हैं। वे मेरे गुरु मुझपर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 382

तत्रापश्यंस्ततो द्वारि वीरकं वेत्रपाणिनम् सप्त ते मुनयः पूज्या विनीताः कार्यगौरवात्

tatrāpaśyaṃstato dvāri vīrakaṃ vetrapāṇinam sapta te munayaḥ pūjyā vinītāḥ kāryagauravāt

हिन्दी अर्थ

(मुझे इसकी परवा नहीं है।) चूँकि तुमने बिना विचारे त्रिलोकोके गुरु भगवान्की जो इस प्रकार इतनी निन्दा को है, इसीलिये मैं तुम्हें शाप दे रहा हूँ। जिस प्रकार तुमने मेरा सिर काट लेनेसे भी बढ़कर यह भगवान् अच्युतको निन्दा करनेवाला वचन कहा है, उसी प्रकार तुम राज्यसे भ्रष्ट होकर (अवनतिके गर्तमें) गिर जाओ। जिस प्रकार इस संसारसागरमें विष्णुसे बढ़कर अन्य कोई शरणदाता नहीं है, (मेरी यह बात सत्य है तो) मैं शीघ्र ही तुम्हें राज्यसे च्युत हुआ देखूँ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 383

ऊचुर्मधुरभाषिण्या वाचा ते वाग्मिनां वराः द्रष्टुं वयमिहायाताः शरण्यं गणनायकम्

ūcurmadhurabhāṣiṇyā vācā te vāgmināṃ varāḥ draṣṭuṃ vayamihāyātāḥ śaraṇyaṃ gaṇanāyakam

हिन्दी अर्थ

शौनकजी बोले हैत्यराज बलिने अपने पितामह प्रह्दादकी ऐसी अप्रिय बात सुनकर उन्हें बारम्बार प्रणाम कर सभी प्रकारसे प्रसन्न करते हुए इस प्रकार कहना प्रसीद तात मा कोपं कुरु मोहहते मयि । बलावलेपमत्तेन मयैतद् वाक्यमीरितम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 384

त्रिलोचनं विजानीहि सुरकार्यप्रचोदिताः त्वमेव नो गतिस्तत्त्वं यथा कालानतिक्रमः

trilocanaṃ vijānīhi surakāryapracoditāḥ tvameva no gatistattvaṃ yathā kālānatikramaḥ

हिन्दी अर्थ

मोहोपहतविज्ञानः पापोऽहं दितिजोत्तम। यच्छप्तोऽस्मि दुराचारस्तत्साधु भवता कृतम् राज्यश्चंशं वसुश्रंशं सम्प्राप्स्यामीति न त्वहम्। विषण्णोऽस्मि यथा तात तवैवाविनये कृते त्रैलोक्यराज्यमैश्वर्यमन्यद्वा नाति दुर्लभम्। संसारे दुर्लभास्ते तु गुरवो ये भवद्विधाः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 385

सा प्रार्थनैषा प्रायेण प्रतीहारमयः प्रभुः इत्युक्तो मुनिभिः सो ऽथ गौरवात्तानुवाच सः

sā prārthanaiṣā prāyeṇa pratīhāramayaḥ prabhuḥ ityukto munibhiḥ so 'tha gauravāttānuvāca saḥ

हिन्दी अर्थ

तत् प्रसीद न मे कोपं कर्तुमर्हसि हैत्यप। त्वत्कोपदृष्ट्या ताताहं परितप्ये न शापतः वत्स कोपेन मोहो मे जनितस्तेन ते मया। शापो दत्तो विवेकश्च मोहेनापहतो मम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 386

सवनस्यापरां संध्यां स्नातुं मन्दाकिनीजले क्षणेन भविता विप्रास् तत्र द्रक्ष्यथ शूलिनम्

savanasyāparāṃ saṃdhyāṃ snātuṃ mandākinījale kṣaṇena bhavitā viprās tatra drakṣyatha śūlinam

हिन्दी अर्थ

तत्कथं सर्वगं जानन् हरिं किंचिच्छपाम्यहम् अद्यप्रभृति देवेशे भगवत्यच्युते हरौ। भवेथा भक्तिमानीशे स ते त्राता भविष्यति यथा तथा यतिष्येऽहं श्रेयसा योज्यसे यथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 387

इत्युक्ता मुनयस्तस्थुस् ते तत्कालप्रतीक्षिणः गम्भीराम्बुधरं प्रावृट्तृषिताश्चातका यथा

ityuktā munayastasthus te tatkālapratīkṣiṇaḥ gambhīrāmbudharaṃ prāvṛṭtṛṣitāścātakā yathā

हिन्दी अर्थ

एवमुक्त्वा स हैत्येन्द्रं विरराम महामतिः। अजायत स गोविन्दो भगवान् वामनाकृतिः देवाश्च मुमुचुर्दःखं देवमातादितिस्तथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 388

ततः क्षणेन निष्पन्नसमाधानक्रियाविधिः वीरासनं बिभेदेशो मृगचर्मनिवासितम्

tataḥ kṣaṇena niṣpannasamādhānakriyāvidhiḥ vīrāsanaṃ bibhedeśo mṛgacarmanivāsitam

हिन्दी अर्थ

धर्मे च सर्वभूतानां तदा मतिरजायत नोद्वेगश्चाप्यभूत् तत्र मनुजेनद्रासुरेष्वपि। तदादि सर्वभूतानां भूम्यम्बरदिवौकसाम् तं जातमात्रं भगवान् ब्रह्मा लोकपितामहः। जातकर्मादिकं कृत्वा कृष्णं दृष्टा च पार्थिव।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 389

ततो विनीतो जानुभ्याम् अवलम्ब्य महीस्थितिम् उवाच वीरको देवं प्रणामैकसमाश्रयः

tato vinīto jānubhyām avalambya mahīsthitim uvāca vīrako devaṃ praṇāmaikasamāśrayaḥ

हिन्दी अर्थ

बलिने कहा--तात! प्रसन्न हो जाइये। आज्ञानसे मारे हुए मुझपर क्रोध मत कीजिये। मैंने बलके गर्वसे उन्मत्त होकर ऐसी बात कह दी है। हैत्यश्रेष्ठ ! मेरा सारा ज्ञान मोहसे नष्ट हो गया है, मैं पापी और दुराचारी हूँ। अतः आपने जो मुझे यह शाप दिया है, वह अच्छा ही किया है। तात! मैं राज्यसे च्युत और सम्पत्तिसे रहित हो जाऊँगा-इससे मैं उतना दुःखी नहीं हूँ जितना आपके साथ अविनयपूर्ण व्यवहार करनेसे मुझे कष्ट हो

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 390

सम्प्राप्ता मुनयः सप्त त्वां द्रष्टुं दीप्ततेजसः विभो समादिश द्रष्टुम् अवगन्तुम् इहार्हसि ते ऽब्रुवन्देवकार्येण तव दर्शनलालसाः

samprāptā munayaḥ sapta tvāṃ draṣṭuṃ dīptatejasaḥ vibho samādiśa draṣṭum avagantum ihārhasi te 'bruvandevakāryeṇa tava darśanalālasāḥ

हिन्दी अर्थ

रहा है। त्रिलोकीका राज्य, ऐश्वर्य अथवा अन्य कोई भी वस्तु अत्यन्त दुर्लभ नहीं है, परंतु आपके समान जो गुरुजन हैं, वे विश्वमें अवश्य दुर्लभ है । इसलिये हैत्योंके पालक! आप प्रसन्न हो जाइये, मुझपर क्रोध न कीजिये। तात! मैं आपकी क्रोधपूर्ण दृष्टिसे दुःखी हो रहा हूँ, शापसे नहीं प्रह्लाद बोले--वत्स ! कोपके कारण मुझे मोह उत्पन्न हो गया, जिससे अभिभूत होकर मैंने तुम्हें शाप दे दिया; क्योंकि मोहने मेरे विवेकको नष्ट कर दिया था। महासुर! यदि मोहके द्वारा मेरा ज्ञान नष्ट हुआ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 391

इत्युक्तो धूर्जटिस्तेन वीरकेण महात्मना भूभङ्गसंज्ञया तेषां प्रवेशाज्ञां ददौ तदा

ityukto dhūrjaṭistena vīrakeṇa mahātmanā bhūbhaṅgasaṃjñayā teṣāṃ praveśājñāṃ dadau tadā

हिन्दी अर्थ

होता तो भगवान् विष्णुको सर्वव्यापी जानता हुआ मैं शाप क्यों देता? असुरश्रेष्ठ ! मैंने तुम्हें जो यह शाप दिया है, यह तुम्हारे लिये अवश्य घटित होगा, अतः तुम विषाद मत करो। आजसे जो देवेश्वर, कभी च्युत न होनेवाले और शास्ता हैं, उन भगवान् श्रीहरिके प्रति तुम

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 392

मूर्ध्नः कम्पेन तान्सर्वान् वीरको ऽपि महामुनीन् आजुहावाविदूरस्थान् दर्शनाय पिनाकिनः

mūrdhnaḥ kampena tānsarvān vīrako 'pi mahāmunīn ājuhāvāvidūrasthān darśanāya pinākinaḥ

हिन्दी अर्थ

इस शापके घटित होनेपर तुम मेरा स्मरण करना। तुम जैसे स्मरण करोगे वैसे ही मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि जिससे तुम कल्याणके भागी होओगे। हैत्यराज बलिसे ऐसा कहकर महामतिमान् प्रह्लाद चुप हो गये। उधर भगवान् गोविन्द वामनरूपमें प्रकट हुए। सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी उन जगन्नाथके अवतरित होनेपर देवगण तथा देवमाता अदिति दुःखसे विमुक्त हो गयीं। उस समय सुख-स्पर्शी वायु बहने लगी, आकाश निर्मल हो गया और सभी प्राणियोंकी बुद्धि धर्में संलग्न हो गयी। तभीसे राजाओं और राक्षसोंके तथा पृथ्वी, आकाश और स्वर्गमें निवास करनेवाले सभी जीवोंके मनोंमें उद्ठेग नहीं हुआ। राजन्! भगवानूके उत्पन्न होते ही लोकपितामह

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 393

त्वराबद्धार्धचूडास्ते लम्बमानाजिनाम्बराः विविशुर्वेदिकां सिद्धां गिरिशस्य विभूतिभिः

tvarābaddhārdhacūḍāste lambamānājināmbarāḥ viviśurvedikāṃ siddhāṃ giriśasya vibhūtibhiḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् ब्रह्माने उनका जातकर्म आदि संस्कार किया। तत्पश्चात् उन देवदेवेश्वर श्रीविष्णुका दर्शन कर वे ऋषियोंके तुष्टाव देवदेवेशमृषीणां चैव शृण्वताम्॥ ६६ सुनते हुए उनकी स्तुति करने लगे॥५७=६६॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 394

बद्धपाणिपुटाक्षिप्तनाकपुष्पोत्करास्ततः पिनाकिपादयुगलं वन्द्यं नाकनिवासिनाम्

baddhapāṇipuṭākṣiptanākapuṣpotkarāstataḥ pinākipādayugalaṃ vandyaṃ nākanivāsinām

हिन्दी अर्थ

जयाद्योश जयाजेय जय सर्वात्मकात्मक। जय जन्मजरापेत जयानन्त जयाच्युत जयाशेषजगत्साक्षिञ्जगत्कर्तर्जगदगुरो । जगतोऽस्यन्तकृद् देव स्थिति पालयितुं जय जय स्थूलातिसूक्ष्म त्वं जयातीन्द्रिय सेन्द्रिय

English

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अध्याय 154

श्लोक 395

ततः स्निग्धेक्षिताः शान्ता मुनयः शूलपाणिना मन्मथारिं ततो हृष्टाः समं तुष्टुवुरादृताः

tataḥ snigdhekṣitāḥ śāntā munayaḥ śūlapāṇinā manmathāriṃ tato hṛṣṭāḥ samaṃ tuṣṭuvurādṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

नृकेसरिन् जयारातिवक्षःस्थलविदारण। साम्प्रतं जय विश्वात्मन् जय वामन केशव वर्धस्व वर्धिताशेषविकारप्रकृते हरे। त्वय्येषा जगतामीशे संस्थिता धर्मपद्धतिः

English

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अध्याय 154

श्लोक 396

अहो कृतार्था वयमेव सांप्रतं सुरेश्वरो ऽप्यत्र वरो भविष्यति भवत्प्रसादामलवारिसेकतः फलेन काचित् तपसा नियुज्यते

aho kṛtārthā vayameva sāṃprataṃ sureśvaro 'pyatra varo bhaviṣyati bhavatprasādāmalavārisekataḥ phalena kācit tapasā niyujyate

हिन्दी अर्थ

न ज्ञातुमीशा मुनयः सनकाद्या न योगिनः स एव केवलो देव वेत्ति त्वां नेतरे जनाः ब्रह्मा बोले आदि परमेश्वर! आपकी जय हो। अजेय! आपकी जय हो । सर्वात्मस्वरूप ! आपकी जय हो। आप जन्म एवं वृद्धतासे विमुक्त, अन्तरहित तथा कभी च्युत होनेवाले नहीं हैं, आपकी जय हो, जय हो, जय हो। आप

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।