Matsya Purana
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

588 श्लोकभाग 8/9 · श्लोक 465–534

पूर्ण अध्याय पाठ70 श्लोक

अध्याय 154

श्लोक 465

इतीरते गिरिमवधानशालिनः सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया नियामिताः प्रययुरतीव हर्षिताश् चराचरं जगदखिलं ह्यपूरयन्

itīrate girimavadhānaśālinaḥ surāsurāḥ sapadi tu vīrakājñayā niyāmitāḥ prayayuratīva harṣitāś carācaraṃ jagadakhilaṃ hyapūrayan

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, बह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि

English

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अध्याय 154

श्लोक 466

इति स्तनत्ककुभि रसन्महार्णवे स्तनद्घने विदलितशैलकंदरे जगत्यभूत्तुमुल इवाकुलीकृतः पिनाकिना त्वरितगतेन भूधरः

iti stanatkakubhi rasanmahārṇave stanadghane vidalitaśailakaṃdare jagatyabhūttumula ivākulīkṛtaḥ pinākinā tvaritagatena bhūdharaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्ति होगी और न उसका मन मोहसे व्याकुल होगा। जो महान् भाग्यशाली मनुष्य इस कथाको सुनता है, वह राज्यच्युत हो तो अपने राज्यको और वियोगी हो तो अवाप्नोति महाभागो नरः श्रुत्वा कथामिमाम् ॥ ९६ अपने इष्टको प्राप्त कर लेता है इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वामनप्रादुर्भावो नाम षट्चत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय 154

श्लोक 467

परिज्वलत्कनकसहस्रतोरणं क्वचिन्मिलन्मरकतवेश्मवेदिकम् क्वचित् क्वचिद् विमलविदूरवेदिकं क्वचिद् गलज्जलधररम्यनिर्झरम्

parijvalatkanakasahasratoraṇaṃ kvacinmilanmarakataveśmavedikam kvacit kvacid vimalavidūravedikaṃ kvacid galajjaladhararamyanirjharam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वामनप्रादुर्भाव नामक दो सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ अर्जुनके वाराहावतारविषयक प्रश्‍न करनेपर शौनकजीद्वारा भगवत्स्वरूपका वर्णन

English

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अध्याय 154

श्लोक 468

चलद्ध्वजप्रवरसहस्रमण्डितं सुरद्रुमस्तबकविकीर्णचत्वरम् सितासितारुणरुचिधातुवर्णिकं श्रियोज्ज्वलं प्रविततमार्गगोपुरम्

caladdhvajapravarasahasramaṇḍitaṃ suradrumastabakavikīrṇacatvaram sitāsitāruṇarucidhātuvarṇikaṃ śriyojjvalaṃ pravitatamārgagopuram

हिन्दी अर्थ

प्रादुर्भावान् पुराणेषु विष्णोरमिततेजसः। अर्जुनने पूछा-विप्रवर! पुराणोंमें संतोंद्वारा अपरिमित तेजस्वी भगवान् विष्णुके अवतारोंके वर्णनमें सतां कथयतां विप्र वाराह इति नः श्रुतम्॥ ९ हमने वाराह-अवतारकी बात सुनी है, किंतु मैं उन

English

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अध्याय 154

श्लोक 469

विजृम्भिताप्रतिमध्वनिवारिदं सुगन्धिभिः पुरपवनैर्मनोहरम् ।हरो महागिरिनगरं समासदत्क्षणादिव प्रवरसुरासुरस्तुतः

vijṛmbhitāpratimadhvanivāridaṃ sugandhibhiḥ purapavanairmanoharam / haro mahāgirinagaraṃ samāsadatkṣaṇādiva pravarasurāsurastutaḥ

हिन्दी अर्थ

बुद्धिमान् भगवान्के चरित्र, विस्तार, कर्म, गुण और आराधनाविधिको नहीं जानता। वे वाराहभगवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 470

तं प्रविशन्तमगात्प्रविलोक्य व्याकुलतां नगरं गिरिभर्तुः व्यग्रपुरन्ध्रिजनं जययुक्तं धावितमार्गजनाकुलरथ्यम्

taṃ praviśantamagātpravilokya vyākulatāṃ nagaraṃ giribhartuḥ vyagrapurandhrijanaṃ jayayuktaṃ dhāvitamārgajanākularathyam

हिन्दी अर्थ

न कर्म गुणसंख्यानं न चाप्यन्तं मनीषिणः॥ २ किस प्रकारके हैं? उनका स्वरूप कैसा है? उनकी किमात्मको वराहोऽसौ किं मूर्तिः कास्य देवता। देवशक्ति कैसी है? उनका क्या प्रमाण और कितना किं प्रमाणः किं प्रभावः किं वा तेन पुरा कृतम्॥ ३ प्रभाव है? प्राचीनकालमें उन्होंने क्या कार्य किये हैं? एतत् ते कथयिष्यामि पुराणं ब्रह्मसम्मितम्। महावराहचरितं कृष्णस्याद्भुतकर्मणः

English

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अध्याय 154

श्लोक 471

हर्म्यगवाक्षगतामरनारीलोचननीलसरोरुहमालम् सुप्रकटा समदृश्यत काचित् स्वाभरणांशुवितानविगूढा

harmyagavākṣagatāmaranārīlocananīlasaroruhamālam suprakaṭā samadṛśyata kācit svābharaṇāṃśuvitānavigūḍhā

हिन्दी अर्थ

इदं पुराणं परमं पुण्यं वेहैश्च सम्मितम्। नानाश्रुतिसमायुक्तं नास्तिकाय न कोर्तयेत् पुराणं वेदमखिलं सांख्यं योगं च वेद यः। कार्स्न्येन विधिना प्रोक्तं सौख्यार्थ वेदयिष्यति

English

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अध्याय 154

श्लोक 472

काप्यखिलीकृतमण्डनभूषा त्यक्तसखीप्रणया हरम् ऐक्षत् काचिदुवाच कलं गतमाना कातरतां सखि मा कुरु मूढे

kāpyakhilīkṛtamaṇḍanabhūṣā tyaktasakhīpraṇayā haram aikṣat kāciduvāca kalaṃ gatamānā kātaratāṃ sakhi mā kuru mūḍhe

हिन्दी अर्थ

विश्वेदेवास्तथा साध्या रूद्रादित्यास्तथाश्चिनौ। प्रजानां पतयश्चैव सप्त चैव महर्षयः हैत्याः पिशाचा नागाश्च भूतानि विविधानि च। शिखाभिर्विधमँल्लोकानशोषयत वह्विना

English

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अध्याय 154

श्लोक 473

दग्धमनोभव एव पिनाकी कामयते स्वयमेव विहर्तुम् काचिदपि स्वयमेव पतन्ती प्राह परां विरहस्खलिताङ्गीम्

dagdhamanobhava eva pinākī kāmayate svayameva vihartum kācidapi svayameva patantī prāha parāṃ virahaskhalitāṅgīm

हिन्दी अर्थ

विवर्णवर्णा दग्धाङ्का हतार्चिष्मद्भिराननैः सर्वविद्याः क्रियाश्चैव सर्वधर्मपरायणाः

English

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अध्याय 154

श्लोक 474

मा चपले मदनव्यतिषङ्गं शंकरजं स्खलनेन वद त्वम् कापि कृतव्यवधानमदृष्ट्वा युक्तिवशाद्गिरिशो ह्ययमूचे

mā capale madanavyatiṣaṅgaṃ śaṃkarajaṃ skhalanena vada tvam kāpi kṛtavyavadhānamadṛṣṭvā yuktivaśādgiriśo hyayamūce

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा प्रभवं विश्वतोमुखम्। सर्वदेवगणाश्चैव त्रयस्त्रिंशत् तु कोटयः इसलिये पुराणॉंमें कही हुई वाराह-अवतारकी ये सारी बातें मुझे तथा विशेषकर यहाँ आये हुए इन ब्राह्मणोंको शौनकजी बोले--अर्जुन! मैं तुमसे अद्भुतकर्मा भगवान् श्रीकृष्णके महावाराह-अवतारके चरित्रको, जो पुराणोंमें वर्णित तथा ब्रह्मसम्मित है, कह रहा हूँ। राजन्! जिस प्रकार शत्रुसंहारक भगवान् विष्णुने वराह-रूप

English

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अध्याय 154

श्लोक 475

एष स यत्र सहस्रमखाद्या नाकसदामधिपाः स्वयमुक्तैः नामभिर् इन्दुजटं निजसेवाप्राप्तफलाय नतास्तु घटन्ते

eṣa sa yatra sahasramakhādyā nākasadāmadhipāḥ svayamuktaiḥ nāmabhir indujaṭaṃ nijasevāprāptaphalāya natāstu ghaṭante

हिन्दी अर्थ

धारणकर समुद्र-स्थित पृथ्वीका दाढोंपर रखकर उद्धार किया था तथा जिस प्रकार उदार श्रुतियोंने वैदिक वाणीद्वारा उनका अभिनन्दन किया था, यह सब इस समय मनको प्रसन्न करके सुनो। अर्जुन! यह पुराण परम पुण्यमय, वेदोंद्वारा अनुमोदित तथा अनेकों श्रुतियोंसे सम्पन्न है, इसे नास्तिक व्यक्तिसे नहीं कहना चाहिए। जो सभी पुराणों, वेदों, सांख्य और योगको पूरी विधिके साथ जानता है, उसीसे इसकी कथा कहनी चाहिए;

English

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अध्याय 154

श्लोक 476

एष न चैष स एष यदग्रे चर्मपरीततनुः शशिमौली धावति वज्रधरो ऽमरराजो मार्गममुं विवृतीकरणाय

eṣa na caiṣa sa eṣa yadagre carmaparītatanuḥ śaśimaulī dhāvati vajradharo 'mararājo mārgamamuṃ vivṛtīkaraṇāya

हिन्दी अर्थ

क्योंकि वही इसके अर्थको जान सकेगा। विश्वेदेवगण, सातों महर्षि, ब्रह्माके मानसिक संकल्पसे सर्वप्रथम उत्पन्न हुए सनकादि ब्रह्मर्षि, वसुगण, मरुद्गण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, हैत्य, पिशाच, नाग, विविध प्रकारके जीव, जातियाँ पृथ्वीपर हैं, सभी चौपाये, सैकड़ों तिर्यग्योनियाँ, जङ्गम प्राणी तथा अन्य जो जीव नामधारी हैं--इन सभीको एक हजार युग बीतनेके पश्चात् ब्रह्माका दिन आनेपर जब सभी प्रकारके उत्पात होने लगते हैं और

English

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अध्याय 154

श्लोक 477

एष स पद्मभवो ऽयमुपेत्य प्रांशुजटामृगचर्मनिगूढः सप्रणयं करघट्टितवक्त्रः किंचिदुवाच मितं श्रुतिमूले

eṣa sa padmabhavo 'yamupetya prāṃśujaṭāmṛgacarmanigūḍhaḥ sapraṇayaṃ karaghaṭṭitavaktraḥ kiṃciduvāca mitaṃ śrutimūle

हिन्दी अर्थ

सभी प्राणियोंका विनाश हो जाता है, तब हिरण्यरेता भगवान् जो वृषाकपि नामसे विख्यात हैं, तीन अग्निशिखाओंसे युक्त होकर अपनी उग्र ज्चालाओंद्वारा सभी लोकोंका विनाश करते हुए अग्निके प्रभावसे दग्ध उस दिनके प्राप्त होनेपर निकलती हुई तेजोराशिसे जिनके शरीर जल गये थे तथा झुलसे हुए मुखोंसे जिनका रंग बदल गया था, वे छहों अङ्गोंसहित

English

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अध्याय 154

श्लोक 478

एवमभूत्सुरनारिकुलानां चित्तविसंष्ठुलता गुरुरागात् शंकरसंश्रयणाद् गिरिजायाजन्मफलं परमं त्विति चोचुः

evamabhūtsuranārikulānāṃ cittavisaṃṣṭhulatā gururāgāt śaṃkarasaṃśrayaṇād girijāyājanmaphalaṃ paramaṃ tviti cocuḥ

हिन्दी अर्थ

धार्मिक क्रियाएँ और तैंतीस करोड़ सभी देवगण सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थानरूप ब्रह्माको आगे करके संहत्य लोकानखिलान् सदेवासुरमानुषान्। कृत्वा सुसंस्थां भगवानास्त एको जगद्गुरु: अव्ययः शाश्वतो देवो यस्य सर्वमिदं जगत्

English

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अध्याय 154

श्लोक 479

ततो हिमगिरेर्वेश्म विश्वकर्मनिवेदितम् महानीलमयस्तम्भं ज्वलत्काञ्चनकुट्टिमम्

tato himagirerveśma viśvakarmaniveditam mahānīlamayastambhaṃ jvalatkāñcanakuṭṭimam

हिन्दी अर्थ

नष्टार्ककिरणे लोके चन्द्रग्रहविवर्जिते। त्यक्तधूमाग्निपवने क्षीणयज्ञवषट्क्रिये अहश्ये सर्वलोकेऽस्मिन्नभावे सर्वकर्मणाम्। प्रशान्ते सर्वसम्पाते नष्टे वैरपरिग्रहे

English

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अध्याय 154

श्लोक 480

मुक्ताजालपरिष्कारं ज्वलितौषधिदीपितम् क्रीडोद्यानसहस्राढ्यं काञ्चनाम्बुजदीर्घिकम्

muktājālapariṣkāraṃ jvalitauṣadhidīpitam krīḍodyānasahasrāḍhyaṃ kāñcanāmbujadīrghikam

हिन्दी अर्थ

गते स्वभावसंस्थाने लोके नारायणात्मके । परमेष्ठी हृषीकेशः शयनायोपचक्रमे शिखासहस्त्रविकचजटाभारं समुद्वहन् ततः स्वपिति शान्तात्मा सर्वलोकशुभावहः। किम्रप्यमितयोगात्मा निद्रायोगमुपागतः

English

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अध्याय 154

श्लोक 481

महेन्द्रप्रमुखाः सर्वे सुरा दृष्ट्वा तदद्भुतम् नेत्राणि सफलान्यद्य मनोभिरिति ते दधुः

mahendrapramukhāḥ sarve surā dṛṣṭvā tadadbhutam netrāṇi saphalānyadya manobhiriti te dadhuḥ

हिन्दी अर्थ

ततश्चिन्तयते भूयः सृष्टिं लोकस्य लोककृत्। नरान् देवगणांश्चैव पारमेष्ठथेन कर्मणा हंसस्वरूप उन भगवान् विष्णुमें, जो सर्वोत्कृष्ट, अविनाशी, महान् आत्मबलसे सम्पन्न और जलशायी हैं, प्रविष्ट हो जाते हैं । उनका पुनः प्रकट होना उसी प्रकार जन्म-मृत्यु कहा जाता है, जैसे इस लोकमें सूर्यका निरन्तर उदय

English

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अध्याय 154

श्लोक 482

विमर्दक्षीणकेयूरा हरिणा द्वारि रोधिताः कथंचित्प्रमुखास्तत्र विविशुर्नाकवासिनः

vimardakṣīṇakeyūrā hariṇā dvāri rodhitāḥ kathaṃcitpramukhāstatra viviśurnākavāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

और अस्त होता रहता है। एक हजार युग पूर्ण होनेपर कल्पकी समाप्ति कही जाती है, जिसमें सभी जीवोंके कार्य भी समाप्त हो जाते हैं। उस समय अकेले जगद्गुरु भगवान् विष्णु देवता, असुर और मानवसहित सभी लोकोंका संहारकर और उन्हें अपनेमें समाविष्ट कर विद्यमान रहते हैं। यह सारा जगत् जिनका अंशरूप है, वे सनातन अविनाशी भगवान् प्रत्येक कल्पकी समाप्तिपर बारंबार सभी जीवोंकी सृष्टि करते हैं। जब लोकमें सूर्यकी किरणें नष्ट हो जाती हैं, चन्द्रमा और ग्रह लुप्त हो जाते हैं, धूम, अग्नि और पवन दूर हो जाते हैं, यज्ञोंमें वषट्कारकी ध्वनि अस्त हो जाती है, पक्षिगणोंका उड़ना बंद हो जाता है, मार्गमें सभी प्राणियोंका अपहरण

English

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अध्याय 154

श्लोक 483

प्रणतेनाचलेन्द्रेण पूजितो ऽथ चतुर्मुखः चकार विधिना सर्वं विधिमन्त्रपुरःसरम्

praṇatenācalendreṇa pūjito 'tha caturmukhaḥ cakāra vidhinā sarvaṃ vidhimantrapuraḥsaram

हिन्दी अर्थ

होने लगता है, भीषणता मर्यादाकी सीमाके बाहर पहुँच जाती है, चारों ओर निविड़ अन्धकार छा जाता है, सारा लोक अदृश्य हो जाता है, सभी कर्मोंका अभाव हो जाता है, सारी उत्पत्ति प्रशान्त हो जाती है, वैरभाव नष्ट हो जाता है और सब कुछ नारायणरूपी लोकमें विलीन हो जाता है, उस समय इन्द्रियोंके स्वामी परमेष्ठी शयनके लिये उद्यत होते हैं

English

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अध्याय 154

श्लोक 484

शर्वस्य पाणिग्रहणम् अग्निसाक्षिकमक्षतम् दाता महीभृतां नाथो होता देवश्चतुर्मुखः

śarvasya pāṇigrahaṇam agnisākṣikamakṣatam dātā mahībhṛtāṃ nātho hotā devaścaturmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय महाबाहु भगवान् पीताम्बरधारी, लाल नेत्रोंसे युक्त, काले मेघकी-सी कान्तिसे सम्पन्न, हजारों शिखाओंसे युक्त जटाभारको वहन करनेवाले, श्रीवत्सके चिहसे सुशोभित एवं लाल चन्दनसे विभूषित वक्षःस्थलको धारण करते हुए बिजलीसहित मेघकी भाँति शोभायमान होते हैं। हजारों कमल-पुष्पोंकी बनी हुई सुन्दर माला उनकी शोभा बढ़ाती है। उनको पत्नी स्वयं लक्ष्मी उनके शरीरको आच्छादित करके विद्यमान रहती हैं। तत्पश्चात् शान्तात्मा, सभी लोकोंके कल्याणकारी और परम योगी भगवान् कुछ योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं। फिर एक हजार युग व्यतीत होनेपर देवेश्वर भगवान् पुरुषोत्तम

English

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अध्याय 154

श्लोक 485

वरः पशुपतिः साक्षात् कन्या विश्वारणिस्तथा चराचराणि भूतानि सुरासुरवराणि च

varaḥ paśupatiḥ sākṣāt kanyā viśvāraṇistathā carācarāṇi bhūtāni surāsuravarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

सर्वव्यापी होकर अपने-आप ही जागते हैं। तदनन्तर लोककर्ता भगवान् ब्रह्माके कर्मद्वारा मनुष्यों और ततः संचिन्तयन् कार्य देवेषु समितिञ्जयः। सम्भवं सर्वलोकस्य विदधाति सतां गतिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 486

तत्राप्येते नियमतो ह्य् अभवन्व्यग्रमूर्तयः मुमोचाभिनवान्सर्वान् सस्यशालीन्रसौषधीः

tatrāpyete niyamato hy abhavanvyagramūrtayaḥ mumocābhinavānsarvān sasyaśālīnrasauṣadhīḥ

हिन्दी अर्थ

कर्ता चैव विकर्ता च संहर्ता वै प्रजापतिः। नारायणः परो यज्ञो नारायणः परा गतिः। स स्वयम्भूरिति ज्ञेयः स स्त्रष्टा भुवनाधिपः स सर्वमिति विज्ञेयो ह्येष यज्ञः प्रजापतिः। यद् वेदितव्यस्त्रिदशैस्तदेष परिकीर्त्यते

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 487

व्यग्रा तु पृथिवी देवी सर्वभावमनोरमा गृहीत्वा वरुणः सर्वरत्नान्याभरणानि च

vyagrā tu pṛthivī devī sarvabhāvamanoramā gṛhītvā varuṇaḥ sarvaratnānyābharaṇāni ca

हिन्दी अर्थ

चत्तु वेद्यं भगवतो देवा अपि न तद् विदुः। यदस्य परमं रूपं न तत् पश्यन्ति देवताः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 488

पुण्यानि च पवित्राणि नानारत्नमयानि तु तस्थौ साभरणो देवो हर्षदः सर्वदेहिनाम्

puṇyāni ca pavitrāṇi nānāratnamayāni tu tasthau sābharaṇo devo harṣadaḥ sarvadehinām

हिन्दी अर्थ

दर्शितं यदि तेनैव तदवेक्षन्ति देवताः चतुराश्रमधर्मेशश्चातुर्होत्रफलाशनः तत्पश्चात् सत्पुरुषोंके आश्रयरूप एवं रणविजयी भगवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 489

धनदश्चापि दिव्यानि हैमान्याभरणानि च जातरूपविचित्राणि प्रयतः समुपस्थितः

dhanadaścāpi divyāni haimānyābharaṇāni ca jātarūpavicitrāṇi prayataḥ samupasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

लोककी सृष्टि करते हैं। वे ही परमात्मा इस समस्त सृष्टिके कर्ता, विकर्ता, संहर्ता और प्रजापति हैं। नारायण यज्ञ और नारायण ही परमगति हैं। उन्हें ही स्वयम्भू, सभी भुवनोंका अधीश्वर और स्रष्टा जानना चाहिए। उन्हींको सर्वरूप समझना चाहिए। ये यज्ञस्वरूप और प्रजापति हैं। देवताओंद्वारा जो जाननेयोग्य है, वह ये

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 490

वायुर्ववौ सुसुरभिः सुखसंस्पर्शनो विभुः छत्रमिन्दुकरोद्भासि सुसितं च शतक्रतुः

vāyurvavau susurabhiḥ sukhasaṃsparśano vibhuḥ chatramindukarodbhāsi susitaṃ ca śatakratuḥ

हिन्दी अर्थ

ही कहे जाते हैं ॥ २८--३७॥ भगवानका जो स्वरूप जाननेयोग्य है, उसे देवगण भी नहीं जानते। सभी प्रजापति, देवतागण और ऋषिगण खोजते रहते हैं, किंतु इनका अन्त नहीं पाते-ऐसी श्रुति है। इस परमात्माका जो परम स्वरूप है, उसे देवतालोग भी नहीं देख पाते। उनके प्रादुर्भावकालमें जिस स्वरूपके दर्शन होते हैं, देवगण उसीकी पूजा करते हैं। यदि उन्होंने स्वयं ही अपने रूपको दिखा दिया तो देवगण उसे देख पाते हैं। वे जिस रूपका दर्शन नहीं कराते,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 491

जग्राह मुदितः स्रग्वी बाहुभिर्बहुभूषणैः जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः

jagrāha muditaḥ sragvī bāhubhirbahubhūṣaṇaiḥ jagurgandharvamukhyāśca nanṛtuścāpsarogaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

उसकी खोज करनेके लिये कौन तत्पर हो सकता है? जो सभी जीवोंके नायक, अग्नि और वायुकी गति, तेज, तपस्या और अमृतके निधान, चारों आश्रमधर्मोके स्वामी, चातुर्होत्र यज्ञके फलका भक्षण करनेवाले, चारों समुद्रोंतक व्याप्त और चारों युगोंकी निवृत्ति करनेवाले हैं, वे ही महायोगी भगवान् इस जगतका संहारकर अपने उदरमें रख लेते हैं और हजार वर्षोतक धारण करनेके पश्चात् उस अण्डको उत्पन्न कर देते हैं। तत्पश्चात् प्रजापति

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 492

वादयन्तो ऽतिमधुरं जगुर् गन्धर्वकिंनराः मूर्ताश्च ऋतवस्तत्र जगुश्च ननृतुश्च वै

vādayanto 'timadhuraṃ jagur gandharvakiṃnarāḥ mūrtāśca ṛtavastatra jaguśca nanṛtuśca vai

हिन्दी अर्थ

भगवान् अपने शरीरसे सुर, असुर, द्विज, सर्प, अप्सराओंके तदासृजज्जगदिदमात्मना प्रभुः॥ ४४ श्रृतियोंसे युक्त इस जगत्को सृष्टि करते हैं॥ ३८--४४॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावे सप्तचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 493

चपलाश्च गणास्तस्थुर् लोलयन्तो हिमाचलम् उत्तिष्ठन्क्रमशश्चात्र विश्वभुग्भगनेत्रहा

capalāśca gaṇāstasthur lolayanto himācalam uttiṣṭhankramaśaścātra viśvabhugbhaganetrahā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ सँतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ वराहभगवान्का प्रादुर्भाव, हिरण्याक्षद्वारा रसातलमें ले जायी गयी पृथ्वीदेवीद्वारा यज्ञवराहका स्तवन और भगवानद्वारा उनका उद्धार

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 494

चकारौद्वाहिकं कृत्यं पत्न्या सह यथोचितम् दत्तार्घो गिरिराजेन सुरवृन्दैर् विनोदितः

cakāraudvāhikaṃ kṛtyaṃ patnyā saha yathocitam dattārgho girirājena suravṛndair vinoditaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रजापतेरियं मूर्तिरितीयं वैदिकी श्रुतिः लोकसर्जनहेतोस्तु बिभेदाधोमुखं पुनः भूयोऽष्टधा बिभेदाण्डं विष्णुर्वै लोकजन्मकृत्। चकार जगतश्चात्र विभागं स विभागकृत्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 495

अवसत्तां क्षपां तत्र पत्न्या सह पुरान्तकः ततो गन्धर्वगीतेन नृत्येनाप्सरसामपि

avasattāṃ kṣapāṃ tatra patnyā saha purāntakaḥ tato gandharvagītena nṛtyenāpsarasāmapi

हिन्दी अर्थ

यच्छिद्रमूर्ध्वमाकाशं विवराकृतितां गतम्। यदण्डमकरोत् पूर्व॑ देवो लोकचिकीर्षया।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 496

स्तुतिभिर् देवदैत्यानां विबुद्धो विबुधाधिपः आमन्त्र्य हिमशैलेन्द्रं प्रभाते चोमया सह जगाम मन्दरगिरिं वायुवेगेन शृङ्गिणा

stutibhir devadaityānāṃ vibuddho vibudhādhipaḥ āmantrya himaśailendraṃ prabhāte comayā saha jagāma mandaragiriṃ vāyuvegena śṛṅgiṇā

हिन्दी अर्थ

तत्र यत् सलिलं स्कन्नं सोऽभवत् काञ्चनो गिरिः उद्धारार्थ मनश्चक्रे तस्या वै हितकाम्यया रसातलं प्रविशति पङ्के गौरिव दुर्बला

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 497

ततो गते भगवति नीललोहिते सहोमया रतिमलभन्न भूधरः सबान्धवो भवति च कस्य नो मनो विह्वलं च जगति हि कन्यकापितुः

tato gate bhagavati nīlalohite sahomayā ratimalabhanna bhūdharaḥ sabāndhavo bhavati ca kasya no mano vihvalaṃ ca jagati hi kanyakāpituḥ

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने कहा अर्जुन! यह जगत् पहले दिव्य हिरण्मय अण्डके रूपमें था। यह प्रजापतिकी मूर्ति है- ऐसी वैदिकी श्रुति है। एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सर्वव्यापी एवं लोकोंके जन्मदाता विष्णुने उस अण्डके ऊर्ध्व मुखका भेदन किया और पुनः लोकसृष्टिके लिये उसके अधोमुखको भी फोड़ दिया। फिर उस अण्डको आठ भागोंमें विभक्त कर दिया। तत्पश्चात् विभागकर्ता विष्णुने जगतका भी विभाजन किया। विश्वस्नष्टा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 498

ज्वलन्मणिस्फटिकहाटकोत्कटं स्फुटद्युति स्फटिकगोपुरं पुरम् हरो गिरौ चिरमनुकल्पितं तदा विसर्जितामरनिवहो ऽविशत्स्वकम्

jvalanmaṇisphaṭikahāṭakotkaṭaṃ sphuṭadyuti sphaṭikagopuraṃ puram haro girau ciramanukalpitaṃ tadā visarjitāmaranivaho 'viśatsvakam

हिन्दी अर्थ

भगवान्द्वारा किया गया जो ऊपरका छिद्र था, वह विवरके आकारवाला आकाश और जो नीचेका छिद्र था, वह रसातल हुआ। भगवानूने पूर्वकालमें लोकसृष्टिकी कामनासे जिस अण्डको उत्पन्न किया था, उससे जो जल टपका था, वह स्वर्णमय सुमेरु पर्वत हुआ और हजारों पर्वतोंके संयोगसे विशाल पृथ्वी विषमा अर्थात् ऊँची-नीची हो गयी। उस समय अनेकों योजन विस्तृत उन भारी पर्वतसमूहोंसे पीड़ित हुई पृथ्वी व्याकुल हो गयी। महामते! तब पृथ्वी जो स्वर्णमय तेजसे युक्त, महान् बलसे सम्पन्न और नारायणस्वरूप था, उस दिव्य हिरण्मय अण्डको धारण करनेमें असमर्थ होकर उसे त्यागकर नीचेकी ओर जाने लगीं; क्योंकि वह उन भगवानूके

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 499

तदोमासहितो देवो विजहार भगाक्षिहा पुरोद्यानेषु रम्येषु विविक्तेषु वनेषु च

tadomāsahito devo vijahāra bhagākṣihā purodyāneṣu ramyeṣu vivikteṣu vaneṣu ca

हिन्दी अर्थ

तेजसे पीड़ित हो रही थी। तब भगवान् मधुसूदनने पृथ्वीको नीचे प्रवेश करती हुई देखकर लोककल्याण- भावनासे उसके उद्धारका विचार किया॥ १--१०॥ श्रीभगवानूने कहा--यह तपस्विनी पृथ्वी मेरे तेजको प्राप्तकर (धारण करनेमें असमर्थ हो) कीचड्में फँसी हुई दुबली गौकी भाँति रसातलमें प्रवेश कर रही है

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 500

सुरक्तहृदयो देव्या मकराङ्कपुरःसरः ततो बहुतिथे काले सुतकामा गिरेः सुता

suraktahṛdayo devyā makarāṅkapuraḥsaraḥ tato bahutithe kāle sutakāmā gireḥ sutā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीने कहा--जो तीन पगमें पृथ्वीको नाप लेनेवाले धनुष, चक्र, खड्ग और गदा धारण करनेवाले हैं, ऐसे आपको नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद॥ १२ नमस्कार है। देवश्रेष्ठ! आप मुझपर प्रसन्न हो जाइये।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 501

सखीभिः सहिता क्रीडां चक्रे कृत्रिमपुत्रकैः कदाचिद्गन्धतैलेन गात्रमभ्यज्य शैलजा

sakhībhiḥ sahitā krīḍāṃ cakre kṛtrimaputrakaiḥ kadācidgandhatailena gātramabhyajya śailajā

हिन्दी अर्थ

तव देहाज्जगज्जातं पुष्करद्वीपमुत्थितम्। ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः तव प्रसादाद् देवोऽयं दिवं भुङ्क्ते पुरन्दरः । तव क्रोधाद्धि बलवान् जनार्दन जितो बलिः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 502

चूर्णैरुद्वर्तयामास मलिनान्तरितां तनुम् तदुद्वर्तनकं गृह्य नरं चक्रे गजाननम्

cūrṇairudvartayāmāsa malināntaritāṃ tanum tadudvartanakaṃ gṛhya naraṃ cakre gajānanam

हिन्दी अर्थ

मनुः कृतान्तोऽधिपतिज्जलनः पवनो घनः वर्णाश्चाश्रमधर्माश्च सागरास्तरवोऽचलाः। नद्यो धर्मश्च कामश्च यज्ञा यज्ञस्य च क्रियाः विद्या वेद्यं च सत्त्वं च ह्वः श्रीः कीर्तिर्धृतिः क्षमा। पुराणं वेदवेदाङ्गं सांख्ययोगौ भवाभवौ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 503

पुत्रकं क्रीडती देवी तं चाप्यर्पयदम्भसि जाह्नव्यास्तु शिवासख्यास् ततः सो ऽभूद्बृहद्वपुः

putrakaṃ krīḍatī devī taṃ cāpyarpayadambhasi jāhnavyāstu śivāsakhyās tataḥ so 'bhūdbṛhadvapuḥ

हिन्दी अर्थ

सर्व॑ तच्च त्रिलोकेषु प्रभावोपहितं तव सर्वलोकमनःकान्तः सर्वसत्त्वमनोहरः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 504

कायेनातिविशालेन जगदापूरयत्तदा पुत्रेत्युवाच ते देवी पुत्रेत्यूचे च जाह्नवी

kāyenātiviśālena jagadāpūrayattadā putretyuvāca te devī putretyūce ca jāhnavī

हिन्दी अर्थ

दिव्यलोकमहास्कन्ध: सत्यलोकप्रशाखवान् सागराकारनिर्यासो रसातलजलाश्रयः। नागेन्द्रपादपोपेतो जन्तुपक्षिनिषेवितः शीलाचारार्यगन्धस्त्वं सर्वलोकमयोद्रुमः। द्वादशार्कमयद्वीपो रुट्रैकादशपत्तनः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 505

गाङ्गेय इति देवैस्तु पूजितो ऽभूद्गजाननः विनायकाधिपत्यं च ददावस्य पितामहः

gāṅgeya iti devaistu pūjito 'bhūdgajānanaḥ vināyakādhipatyaṃ ca dadāvasya pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

वस्वष्टाचलसंयुक्तस्त्रैलोक्याम्भोमहोदधिः । सिद्धसाध्योर्मिकलिलः सुपर्णानिलसेवितः हैत्यलोकमहाग्राहो रक्षोरगझषाकुलः। पितामहमहाधैर्यः स्वर्गस्त्रीरत्नभूषितः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 506

पुनः सा क्रीडनं चक्रे पुत्रार्थं वरवर्णिनी मनोज्ञमङ्कुरं रूढम् अशोकस्य शुभानना

punaḥ sā krīḍanaṃ cakre putrārthaṃ varavarṇinī manojñamaṅkuraṃ rūḍham aśokasya śubhānanā

हिन्दी अर्थ

धीश्रीह्रीकान्तिभिर्नित्यं नदीभिरुपशोभितः। कालयोगमहापर्वप्रयागगतिवेगवान् कालो भूत्वा प्रसन्नाभिरदभिह्णादयसे पुनः त्वया सृष्टास्त्रयो लोकास्त्वयैव प्रतिसंहृताः । विशन्ति योगिनः सर्वे त्वामेव प्रतियोजिताः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 507

वर्धयामास तं चापि कृतसंस्कारमङ्गला बृहस्पतिमुखैर्विप्रैर् दिवस्पतिपुरोगमैः

vardhayāmāsa taṃ cāpi kṛtasaṃskāramaṅgalā bṛhaspatimukhairviprair divaspatipurogamaiḥ

हिन्दी अर्थ

युगे युगे युगान्ताग्निः कालमेघो युगे युगे। मम भारावताराय देव त्वं हि युगे युगे प्रभो! आपके शरीरसे जगत् उत्पन्न हुआ है, पुष्कर द्वीपकी उत्पत्ति हुई है और ब्रह्मा प्रकट हुए हैँ, आप सभी लोकों और प्राणियोंके सनातन पुरुष माने जाते हैं। आपकी कृपासे ये देवराज इन्द्र स्वर्गका उपभोग

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 508

ततो देवैश्च मुनिभिः प्रोक्ता देवी त्विदं वचः भवानि भवती भव्या सम्भूता लोकभूतये

tato devaiśca munibhiḥ proktā devī tvidaṃ vacaḥ bhavāni bhavatī bhavyā sambhūtā lokabhūtaye

हिन्दी अर्थ

कर रहे हैं। जनार्दन! आपके क्रोधसे बलवान् बलि जीता गया है । आप धाता, विधाता और संहर्ता हैं। आपमें समस्त जगत् प्रतिष्ठित है। मनु, प्रजापति, यम, अग्नि, पवन, मेघ, वर्णधर्म, आश्रमधर्म, समुद्र, वृक्ष, पर्वत, नदियाँ, धर्म, काम, यज्ञ; यज्ञकी क्रियाएं, विद्या, जाननेयोग्य अन्य बातें, जीवगण, लज्जा, ही, श्री, कीर्ति, धैर्य, क्षमा,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 509

प्रायः सुतफलो लोकः पुत्रपौत्रैश्च लभ्यते अपुत्राश्च प्रजाः प्रायो दृश्यन्ते दैवहेतवः

prāyaḥ sutaphalo lokaḥ putrapautraiśca labhyate aputrāśca prajāḥ prāyo dṛśyante daivahetavaḥ

हिन्दी अर्थ

पुराण, वेद, वेदाङ्ग, सांख्य, योग, जन्म, मरण, जंगम, स्थावर, भूत और भविष्यत् -ये सभी तीनों लोकोंमें आपके प्रभावसे आच्छादित हैं। आप देवताओंको उत्तम 'फल देनेवाले, स्वर्गकी रमणियोंके लिये सुन्दर पल्लवरूप,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 510

अधुना दर्शिते मार्गे मर्यादां कर्तुमर्हसि फलं किं भविता देवि कल्पितैस्तरुपुत्रकैः इत्युक्ता हर्षपूर्णाङ्गी प्रोवाचोमा शुभां गिरम्

adhunā darśite mārge maryādāṃ kartumarhasi phalaṃ kiṃ bhavitā devi kalpitaistaruputrakaiḥ ityuktā harṣapūrṇāṅgī provācomā śubhāṃ giram

हिन्दी अर्थ

सभी लोगोंके मनको प्रिय लगनेवाले, सभी जीवोंके मनके हरणकर्ता, विमानरूपी अनेक वृक्षांसे युक्त, मेघोंके जलरूप मधु टपकानेवाले, दिव्य लोकरूप महान् स्कन्धवाले, सत्यलोकरूप शाखाओंसे युक्त, सागररूप रस, रसातलकी तरह जलके आश्रयस्थान, ऐरावतरूप वृक्षसे युक्त तथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 511

एवं निरुदके देशे यः कूपं कारयेद्बुधः बिन्दौ बिन्दौ च तोयस्य वसेत्संवत्सरं दिवि

evaṃ nirudake deśe yaḥ kūpaṃ kārayedbudhaḥ bindau bindau ca toyasya vasetsaṃvatsaraṃ divi

हिन्दी अर्थ

जन्तुओं और पक्षियोंसे सुसेवित हैं आप शील, सदाचार और श्रेष्ठ गन्धसे युक्त,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 512

दशकूपसमा वापी दशवापीसमो ह्रदः दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः एषैव मम मर्यादा नियता लोकभाविनी

daśakūpasamā vāpī daśavāpīsamo hradaḥ daśahradasamaḥ putro daśaputrasamo drumaḥ eṣaiva mama maryādā niyatā lokabhāvinī

हिन्दी अर्थ

सर्वलोकमय वृक्ष, बारह आदित्योंसे युक्त द्वीप, ग्यारह रुद्ररूप नगर, आठों वसुरूप पर्वत, त्रिलोकीरूप जलसे परिपूर्ण महासागर, सिद्ध और साध्यरूप लहरोंसे युक्त,

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 513

इत्युक्तास्तु ततो विप्रा बृहस्पतिपुरोगमाः जग्मुः स्वमन्दिराण्येव भवानीं वन्द्य सादरम्

ityuktāstu tato viprā bṛhaspatipurogamāḥ jagmuḥ svamandirāṇyeva bhavānīṃ vandya sādaram

हिन्दी अर्थ

गरुड्रूप वायुसे सेवित, हैत्यसमूहरूप महान् ग्राह, राक्षस और नागरूपी मछलियोंसे व्याप्त, ब्रह्मारूप महान् धैर्यसम्पन्न, स्वर्गकी अप्सरारूप रत्नसे विभूषित हैं। आप बुद्धि, लक्ष्मी, लज्जा और कान्तिरूपी नदियोंसे नित्य सुशोभित तथा कालके योगसे उत्पन्न होनेवाले महापर्वके समय वेगपूर्वक प्रयागमें गमन करनेवाले हैं। नारायण! आप अपने योगरूपी महापराक्रमसे सम्पन्न महासागर हैं और पुनः आप ही काल बनकर निर्मल जलसे

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 514

गतेषु तेषु देवो ऽपि शंकरः पर्वतात्मजाम् पाणिनालम्ब्य वामेन शनैः प्रावेशयच्छुभाम्

gateṣu teṣu devo 'pi śaṃkaraḥ parvatātmajām pāṇinālambya vāmena śanaiḥ prāveśayacchubhām

हिन्दी अर्थ

जगतको आह्वादित करते हैं। आपने तीनों लोकोंकी सृष्टि की है और आपसे ही उनका संहार होता है। आपके द्वारा नियुक्त किये गये सभी योगी आपमें ही प्रविष्ट होते हैं। देव! आप प्रत्येक युगमें प्रलयाग्नि और प्रत्येक युगमें प्रलयकालीन मेघ हैं तथा मेरा भार उतारनेके लिये आप प्रत्येक युगमें अवतीर्ण होते हँ । द्वापरे रक्तसंकाशः कृष्णः कलियुगे भवान्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 515

चित्तप्रसादजननं प्रासादमनुगोपुरम् लम्बमौक्तिकदामानं मालिकाकुलवेदिकम्

cittaprasādajananaṃ prāsādamanugopuram lambamauktikadāmānaṃ mālikākulavedikam

हिन्दी अर्थ

बैवणर्यमभिधत्से त्वं प्राप्तेषु युगसंधिषु। वैवर्ण्य सर्वधर्माणामुत्पादयसि वेदवित् भासि वासि प्रतपसि त्वं च पासि विचेष्टसे। क्रुछ्यसि क्षान्तिमायासि त्वं दीपयसि वर्षसि

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 516

निर्धौतकलधौतं च क्रीडागुहमनोरमम् प्रकीर्णकुसुमामोदमत्तालिकुलकूजितम्

nirdhautakaladhautaṃ ca krīḍāguhamanoramam prakīrṇakusumāmodamattālikulakūjitam

हिन्दी अर्थ

निःशेषयसि भूतानि कालो भूत्वा युगक्षये शेषमात्मानमालोक्य विशेषयसि त्वं पुनः। युगान्ताग्न्यवलीढेषु सर्वभूतेषु किञ्जन यातेषु शेषो भवसि तस्माच्छेषोऽसि कीर्तितः। च्यवनोत्पत्तियुक्तेषु ब्रह्ोन्द्रवरुणादिषु

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 517

किंनरोद्गीतसंगीतगृहान्तरितभित्तिकम् सुगन्धिधूपसंघातमनःप्रार्थ्यमलक्षितम्

kiṃnarodgītasaṃgītagṛhāntaritabhittikam sugandhidhūpasaṃghātamanaḥprārthyamalakṣitam

हिन्दी अर्थ

यस्मान्न च्यवसे स्थानात् तस्मात् संकीर्त्यसेऽच्युतः । ब्रह्माणमिन्द्रं च यमं रुद्रं वरुणमेव च निगृह्य हरसे यस्माद् तस्माद्धरिरिहोच्यसे। संतानयसि भूतानि वपुषा यशसा श्रिया

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 518

क्रीडन्मयूरनारीभिर् वृतं वै ततवादिभिः हंससंघातसंघुष्टं स्फटिकस्तम्भवेदिकम्

krīḍanmayūranārībhir vṛtaṃ vai tatavādibhiḥ haṃsasaṃghātasaṃghuṣṭaṃ sphaṭikastambhavedikam

हिन्दी अर्थ

परेण वपुषा देव तस्माच्चासि सनातनः। यस्माद् ब्रह्मादयो देवा मुनयश्चोग्रतेजसः न तेऽन्तं त्वधिगच्छन्ति तेनानन्तस्त्वमुच्यसे । न क्षीयसे न क्षरसे कल्पकोटिशतैरपि तस्मात् त्वमक्षरत्वाच्च अक्षरश्च प्रकीर्तितः। विष्टब्धं यत्त्वया सर्व जगत्स्थावरजङ्गमम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 519

अनाविलमसंभ्रान्त्या बहुशः किंनराकुलम् शुकैर्यत्राभिहन्यन्ते पद्मरागविनिर्मिताः

anāvilamasaṃbhrāntyā bahuśaḥ kiṃnarākulam śukairyatrābhihanyante padmarāgavinirmitāḥ

हिन्दी अर्थ

जगद्रिष्टम्भनाच्चैव विष्णुरेवेति कीर्त्यसे। विष्टभ्य तिष्ठसे नित्यं त्रैलोक्यं सचराचरम् व्याप्तं त्वयैव विशता त्रैलोक्यं सचराचरम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 520

भित्तयो दाडिमभ्रान्त्या प्रतिबिम्बितमौक्तिकाः तत्राक्षक्रीडया देवी विहर्तुमुपचक्रमे

bhittayo dāḍimabhrāntyā pratibimbitamauktikāḥ tatrākṣakrīḍayā devī vihartumupacakrame

हिन्दी अर्थ

तस्माद् विष्णुरिति प्रोक्तः स्वयमेव स्वयम्भुवा। नारा इत्युच्यते ह्यापो ह्यूषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः गोविन्देति ततो नाम्ना प्रोच्यसे ऋषिभिस्तथा। हषीकाणीन्द्रियाण्याहुस्तत्त्वज्ञानविशारदाः ईशिता च त्तमेतेषां हृषीकेशस्तथोच्यसे।

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 521

स्वच्छेन्द्रनीलभूभागे क्रीडने यत्र धिष्ठितौ वपुःसहायतां प्राप्तौ विनोदरसनिर्वृतौ

svacchendranīlabhūbhāge krīḍane yatra dhiṣṭhitau vapuḥsahāyatāṃ prāptau vinodarasanirvṛtau

हिन्दी अर्थ

आप कृतयुगमें श्वेतवर्ण, त्रेतामें चम्पक-पुष्प-सदृश पीतवर्ण, द्वापरमें रक्तवर्ण और कलियुगमें श्यामवर्ण हो जाते हैं। वेदज्ञ! युग-संधियोंके प्राप्त होनेपर आप विवर्णताको धारण करते हैं और सभी धर्मोमें विपरीतता उत्पन्न कर देते हैं। आप प्रकाशित होते, प्रवाहित होते, तपते, रक्षा करते और चेष्टा करते हैं । आप क्रोध करते, शान्ति धारण करते, उद्दीप्त करते और वर्षा करते हैं। आप हँसते, स्थिर रहते, मारते और जागते रहते हैं तथा प्रलयकालमें काल

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 522

एवं प्रक्रीडतोस्तत्र देवीशंकरयोस्तदा प्रादुर्भवन्महाशब्दस् तद्गृहोदरगोचरः

evaṃ prakrīḍatostatra devīśaṃkarayostadā prādurbhavanmahāśabdas tadgṛhodaragocaraḥ

हिन्दी अर्थ

बनकर सभी जीवोंको निःशेष कर देते हैं॥ २२--३२॥ फिर अपनेको शेष बचा हुआ देखकर पुनः आप उसकी वृद्धि करते हैं। युगान्तकी अग्निमें सभी भूतोंके दग्ध हो जानेपर एकमात्र आप शेष रहते हैं, इसलिये आप “शेष' नामसे पुकारे जाते हैं। ब्रह्मा, इन्द्र, वरुण आदि स्थानसे च्युत नहीं होते, इसलिये ' अच्युत' कहलाते हैं। चूँकि आप ब्रह्मा, इन्द्र, यम, रुद्र और वरुणका निग्रहपूर्वक हरण करते हैं, इसलिये यहाँ “हरि' कहे जाते हैं। देव!

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 523

तच्छ्रुत्वा कौतुकाद्देवी किमेतदिति शंकरम् पप्रच्छ तं शुभतनुर् हरं विस्मयपूर्वकम्

tacchrutvā kautukāddevī kimetaditi śaṃkaram papraccha taṃ śubhatanur haraṃ vismayapūrvakam

हिन्दी अर्थ

जीवोंका विस्तार करते हैं, इसलिये 'सनातन' हैं। चूँकि ब्रह्मा आदि देवगण और उग्र तेजस्वी मुनिगण आपका अन्त नहीं जान पाते, इसीलिये आप “अनन्त” कहे जाते हैं। सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी न तो आप क्षीण होते हैं और न नष्ट होते हैं, इसलिये विनाशरहित होनेके कारण आप 'अक्षर' कहे गये हैं। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्को स्तम्भित किये रहते हैं, इसीलिये जगतका विष्टम्भन करनेके कारण “विष्णु” कहे जाते हैं। आप सचराचर

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 524

उवाच देवीं नैतत्ते दृष्टपूर्वं सुविस्मिते एते गणेशाः क्रीडन्ते शैले ऽस्मिन्मत्प्रियाः सदा

uvāca devīṃ naitatte dṛṣṭapūrvaṃ suvismite ete gaṇeśāḥ krīḍante śaile 'sminmatpriyāḥ sadā

हिन्दी अर्थ

त्रिलोकीको नित्य अवरुद्ध करके स्थित रहते हैं तथा आप ही यक्षों एवं गन्धर्वोके नगरोंसे सम्पन्न और महान् नागोंसे युक्त चराचरसहित त्रिलोकीमें प्रवेश करके उसे व्याप्त किये रहते हैं, इसीलिये स्वंय ब्रह्माने आपको “विष्णु” नामसे अभिहित किया है। तत्त्वदर्शी ऋषियोंने जलका नाम “नारा” कहा है और वह पूर्वकालमें आपका निवासस्थान था, इसीसे आप “नारायण” कहे जाते हैं। विष्णो! प्रत्येक युगमें नष्ट हुई गोरूपिणी पृथ्वीको तत्त्वत: आप ही प्राप्त करते हैं, इसीलिये ऋषिगण आपको 'गोविन्द' नामसे पुकारते हैं। तत्त्वज्ञानमें निपुणजन इन्द्रियोंको हृषीक कहते हैं और आप उन इन्द्रियोंके शासक हैं, अतः “हृषीकेश' कहे जाते हैं

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 525

तपसा ब्रह्मचर्येण नियमैः क्षेत्रसेवनैः यैरहं तोषितः पूर्वं त एते मनुजोत्तमाः

tapasā brahmacaryeṇa niyamaiḥ kṣetrasevanaiḥ yairahaṃ toṣitaḥ pūrvaṃ ta ete manujottamāḥ

हिन्दी अर्थ

वसन्ति त्वयि भूतानि ब्रह्मादीनि युगक्षये त्वं वा वससि भूतेषु वासुदेवस्तथोच्यसे। संकर्षयसि भूतानि कल्पे कल्पे पुनः पुनः

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 526

मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः

matsamīpamanuprāptā mama hṛdyāḥ śubhānane kāmarūpā mahotsāhā mahārūpaguṇānvitāḥ

हिन्दी अर्थ

ततः संकर्षणः प्रोक्तस्तत्त्वज्ञानविशारहैः। प्रतिव्यूहेन तिष्ठन्ति सदेवासुरराक्षसाः प्रविद्युः सर्वधर्माणां प्रद्युम्नस्तेन चोच्यसे। निरोद्धा विद्यते यस्मान्न ते भूतेषु कश्चन त्वमेव कुरुषे देव नारायण युगे युगे। मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 527

कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम् चराचरस्य जगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः

karmabhirvismayaṃ teṣāṃ prayāmi balaśālinām carācarasya jagataḥ sṛṣṭisaṃharaṇakṣamāḥ

हिन्दी अर्थ

तावन्मेऽस्ति भयं देव यावन्न त्वां ककुद्धिनम्। शरणं यामि मनसा शतशोऽप्युपलक्षये उपमानं न ते शक्ताः कर्तु सेन्द्रा दिवौकसः। तत्त्वं त्वमेव तद् वेत्सि निरुत्तरमतः परम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 528

ब्रह्मविष्ण्विन्द्रगन्धर्वैः सकिंनरमहोरगैः समावृतो ऽप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे

brahmaviṣṇvindragandharvaiḥ sakiṃnaramahoragaiḥ samāvṛto 'pyahaṃ nityaṃ naibhirvirahito rame

हिन्दी अर्थ

ततः प्रीतः स भगवान् पृथिव्यै शाङ्गचक्रधृक् । काममस्या यथाकाममभिपूरितवान् हरिः अब्रवीच्च महादेवि माधवीयं स्तवोत्तमम्। धारयिष्यति यो मर्त्यो नास्ति तस्य पराभवः लोकान् निष्कल्मषांश्चैव वैष्णवान् प्रतिपत्स्यते। एतदाश्चर्यसर्वस्वं माधवीयं स्तवोत्तमम्

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 529

हृद्या मे चारुसर्वाङ्गि त एते क्रीडिता गिरौ इत्युक्ता तु ततो देवी त्यक्त्वा तद्विस्मयाकुला

hṛdyā me cārusarvāṅgi ta ete krīḍitā girau ityuktā tu tato devī tyaktvā tadvismayākulā

हिन्दी अर्थ

अधीतवेदः पुरुषो मुनिः प्रीतमना भवेत् युगान्तके समय ब्रह्मा आदि सभी प्राणी आपमें निवास करते हैं और आप प्राणियोंमें निवास करते हैं, इसीलिये आप 'वासुदेव' कहलाते हैं। प्रत्येक कल्पमें आप पुन:-पुनः प्राणियोंको आकर्षित करते हैं, इसीलिये

English

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अध्याय 154

श्लोक 530

गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना यावन्तस्ते कृशा दीर्घा ह्रस्वाः स्थूला महोदराः

gavākṣāntaramāsādya prekṣate vismitānanā yāvantaste kṛśā dīrghā hrasvāḥ sthūlā mahodarāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञानविशारदोंने आपको 'संकर्षण' कहा है। आपके प्रभावसे देवता, असुर और राक्षस अपने-अपने व्यूहोंमें स्थित रहते हैं तथा आप सभी धर्मोके विशेषज्ञ हैं, अतः “प्रदयुम्न' नामसे कहे जाते हैं। चूँकि सभी प्राणियोंमें कोई भी आपका निरोध करनेवाला नहीं है, इसीलिये महर्षियोंने पहलेसे ही आपका ' अनिरुद्ध' नाम रख दिया है। आप विश्वको धारण करते हैं, आप ही जगतका संहार भी करते हैं, आप ही प्राणियोंको धारण करते हैं और आप ही भुवनका पालन-पोषण करते हैं। आप अपने तेज और बलसे जो कुछ धारण करते हैं, उसीको पीछे मैं भी धारण करती हूँ। आपके द्वारा धारण न की हुई वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं

English

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अध्याय 154

श्लोक 531

व्याघ्रेभवदनाः केचित् केचिन्मेषाजरूपिणः अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिङ्गलाः

vyāghrebhavadanāḥ kecit kecinmeṣājarūpiṇaḥ anekaprāṇirūpāśca jvālāsyāḥ kṛṣṇapiṅgalāḥ

हिन्दी अर्थ

है, जिसे आपने इस जगत्में धारण न किया हो। नारायण देव! आप ही प्रत्येक युगमें संसारकी कल्याण-भावनासे मेरे ऊपर पड्नेवाले असहनीय भारको दूर करते हैं। मैं आपके ही तेजसे आक्रान्त हो रसातलमें पहुँच गयी हूँ। सुरश्रेष्ठ! मैं आपकी शरणागत हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। मैं दुरात्मा दानवों एवं राक्षसोंसे पीड़ित होकर नित्य आप सनातनकी ही शरणमें जाती हूँ। देव! मेरे लिये भय तभीतक रहता है, जबतक मैं मनसे आप ककुद्मीकी

English

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अध्याय 154

श्लोक 532

सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः

saumyā bhīmāḥ smitamukhāḥ kṛṣṇapiṅgajaṭāsaṭāḥ nānāvihaṅgavadanā nānāvidhamṛgānanāḥ

हिन्दी अर्थ

शरणमें नहीं आती हूँ। मैंने सैकड़ों बार ऐसा देखा है। इन्द्रसहित समस्त देवगण आपकी समानता करनेमें समर्थ नहीं हैं। आप ही उस परम तत्त्वके ज्ञाता हैं। इसके बाद अब मुझे कुछ नहीं कहना है शौनकजीने कहा--तदनन्तर शार्ङ्गधनुष और चक्र धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने पृथ्वीपर प्रसन्न होकर उसके यथेष्ट मनोरथको पूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने कहा--' महादेवि! जो मनुष्य इस उत्तम माधवीय स्तोत्रको धारण करेगा, उसका कभी पराभव नहीं होगा। वह पापरहित वैष्णव-लोकोंको प्राप्त होगा। यह उत्तम माधवीय स्तोत्र सभी आश्चयाँसे परिपूर्ण है। वेदाध्यायी पुरुष और मुनि इससे प्रसन्न हो जाते हैं। धरणि! तुम भय मत करो।

English

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अध्याय 154

श्लोक 533

कौशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः

kauśeyacarmavasanā nagnāścānye virūpiṇaḥ gokarṇā gajakarṇāśca bahuvaktrekṣaṇodarāḥ

हिन्दी अर्थ

कल्याणि! तुम मेरे सामने शान्ति धारण करो। मैं तुम्हें मनसेप्सित उचित स्थान प्राप्त कराऊँगा' अधुष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्म संस्थितम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 534

बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानास्त्रपाणयः अनेककुसुमापीडा नानाव्यालविभूषणाः

bahupādā bahubhujā divyanānāstrapāṇayaḥ anekakusumāpīḍā nānāvyālavibhūṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

नीलजीमूतसंकाशं मेघस्तनितनिःस्वनम् विद्युदग्निप्रतीकाशमादित्यसमतेजसम् । पीनवृत्तायतस्कन्धं प्तशार्दूलगामिनम् अग्निजिह्णो दर्भलोमा ब्रह्मशीर्षो महातपाः। अहोरात्रेक्षणधरो वेदाङ्ग श्रुतिभूषणः

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।