अध्याय 154
श्लोक 465
इतीरते गिरिमवधानशालिनः सुरासुराः सपदि तु वीरकाज्ञया नियामिताः प्रययुरतीव हर्षिताश् चराचरं जगदखिलं ह्यपूरयन्
itīrate girimavadhānaśālinaḥ surāsurāḥ sapadi tu vīrakājñayā niyāmitāḥ prayayuratīva harṣitāś carācaraṃ jagadakhilaṃ hyapūrayan
हिन्दी अर्थ
सूतजी कहते हैं--ऋषियो ! ऐसा कहकर अर्जुन गङ्गाद्वारको चले गये और महर्षि शौनक नैमिषारण्यकी ओर प्रस्थित हुए। इस प्रकार जो देवाधिदेव भगवान् वामनके इस उत्तम माहात्म्यका पाठ करता है, बह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। द्विजवरो! जो मनुष्य बलि और प्रह्लादके संवाद, बलि और शुक्रकी मन्त्रणा तथा बलि और विष्णुके कथनोपकथनका स्मरण करेगा, उस पुरुषको कभी भी न तो किसी प्रकारकी आधि-व्याधि
English
Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.