Matsya Purana
154
अध्याय 154 / 176

Adhyaya 154

588 श्लोकभाग 9/9 · श्लोक 535–588

पूर्ण अध्याय पाठ54 श्लोक

अध्याय 154

श्लोक 535

वृकाननायुधधरा नानाकवचभूषणाः विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः

vṛkānanāyudhadharā nānākavacabhūṣaṇāḥ vicitravāhanārūḍhā divyarūpā viyaccarāḥ

हिन्दी अर्थ

सत्यधर्ममयः श्रीमान् कर्मविक्रमसत्कृतः वाय्वन्तरात्मा यज्ञास्थिविकृतिः सोमशोणितः। वेदस्कन्धो हविर्गन्धो हव्यकव्यविभागवान्

English

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अध्याय 154

श्लोक 536

वीणावाद्यमुखोद्घुष्टा नानास्थानकनर्तकाः गणेशांस्तांस्तथा दृष्ट्वा देवी प्रोवाच शंकरम्

vīṇāvādyamukhodghuṣṭā nānāsthānakanartakāḥ gaṇeśāṃstāṃstathā dṛṣṭvā devī provāca śaṃkaram

हिन्दी अर्थ

प्राग्वंशकायो द्युतिमान् नानादीक्षाभिरन्वितः। उपाकर्मोष्ठरुचकः प्रवर्ग्यावर्तभूषण: । प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्टराग्रेणोज्जहार ताम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 537

गणेशाः कतिसंख्याताः किंनामानः किमात्मकाः एकैकशो मम ब्रूहि धिष्ठिता ये पृथक्पृथक्

gaṇeśāḥ katisaṃkhyātāḥ kiṃnāmānaḥ kimātmakāḥ ekaikaśo mama brūhi dhiṣṭhitā ye pṛthakpṛthak

हिन्दी अर्थ

शौनकजीने'कहा--तदनन्तर भगवान् विष्णुने मनमें दिव्य स्वरूपका चिन्तन किया और सोचने लगे कि मैं कौन-सा रूप धारणकर इस पृथ्वीका उद्धार करूँ। ऐसा सोचते हुए उन्हें जलक्रीडाकी रुचि उत्पन्न हो गयी,

English

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अध्याय 154

श्लोक 538

कोटिसंख्या ह्यसंख्याता नानाविख्यातपौरुषाः जगदापूरितं सर्वैर् एभिर्भीमैर्महाबलैः

koṭisaṃkhyā hyasaṃkhyātā nānāvikhyātapauruṣāḥ jagadāpūritaṃ sarvair ebhirbhīmairmahābalaiḥ

हिन्दी अर्थ

इसलिये उन्होंने शूकरका शरीर धारण किया। वह रूप सभी प्राणियोंके लिये अजेय, वाङ्मय, ब्रह्मस्वरूप, सौ योजनोंमें विस्तृत, उससे दुगुना ऊँचा, नील मेघके समान कान्तिमान्, मेघोंकी गड़गड़ाहटके सदृश शब्दसे युक्त, पर्वतके समान सुदृढ़, भयंकर, श्वेत एवं तीखे अग्रभागवाले दाढ़ोंसे युक्त, बिजली एवं अग्निकी भाँति कान्तिमान्, सूर्यके समान तेजस्वी, मोटे एवं चौड़े कंधेसे सुशोभित, गर्वीले सिंहकी-सी चालवाला, मोरे एवं ऊँचे कटिभागसे सम्पन्न और वृषभके लक्षणोंसे युक्त था। तब अजेय भगवान् विष्णुने ऐसा विशाल वाराह स्वरूप धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन महातपस्वी भगवान् वराहके वेद चारों पैर थे, यज्ञ-

English

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अध्याय 154

श्लोक 539

सिद्धक्षेत्रेषु रथ्यासु जीर्णोद्यानेषु वेश्मसु दानवानां शरीरेषु बालेषून्मत्तकेषु च एते विशन्ति मुदिता नानाहारविहारिणः

siddhakṣetreṣu rathyāsu jīrṇodyāneṣu veśmasu dānavānāṃ śarīreṣu bāleṣūnmattakeṣu ca ete viśanti muditā nānāhāravihāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

स्तम्भ उनको दाढ़ें थीं, यज्ञ उनके दाँत थे, यज्ञका कुण्ड उनका मुख था, अग्नि उनको जीभ थी, कुश उनके रोएँ थे, ब्रह्म उनका मस्तक था, दिन और रात उनके नेत्र थे, वेदोंके छः अङ्ग कानके आभूषण थे, घृताहुति उनकी नासिका थी, खुवा उनका थूथुन था, सामवेदका उच्चस्वर शब्द था, वे सत्य और धर्मसे युक्त, श्रीसम्पन्न और कर्मरूप पराक्रमसे सत्कृत थे। प्रायश्चित्त उनके भीषण नख और पशुगण जानु भाग थे। यज्ञ उनकी

English

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अध्याय 154

श्लोक 540

ऊष्मपाः फेनपाश्चैव धूमपा मधुपायिनः रक्तपाः सर्वभक्षाश्च वायुपा ह्यम्बुभोजनाः

ūṣmapāḥ phenapāścaiva dhūmapā madhupāyinaḥ raktapāḥ sarvabhakṣāśca vāyupā hyambubhojanāḥ

हिन्दी अर्थ

आकृति थी। उद्गीथद्वारा किया गया हवन उनका लिङ्ग था, बीज और ओषधियाँ महान् फल थीं, वायु उनका अन्तरात्मा, यज्ञ अस्थिविकार, सोमरस रक्त, वेद कंधे और हवि गन्ध था। वे भगवान् हव्य तथा कव्यके विभाग करनेवाले थे। प्राग्वंश उनका शरीर था। वे कान्तिमान् और अनेकों दीक्षाओंसे दीक्षित थे। दक्षिणा उनका हृदय था, वे परम योगी और महान् यज्ञमय महापुरुष थे। उपाकर्म उनके होंठोंके फलक, प्रवर्ग्य सम्पूर्ण उनकी आसन थीं। छाया उनकी पत्नी थी, वे मणि- भृङ्गके समान ऊँचे थे। ऐसे वराहभगवानूने रसातलमें जाकर डूबी हुई पृथ्वीका लोकहितकी कामनासे अपने दाढ़ोंके अग्रभागपर रखकर उद्धार किया॥ ६२--७४॥

English

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अध्याय 154

श्लोक 541

गेयनृत्योपहाराश्च नानावाद्यरवप्रियाः न ह्येषां वै अनन्तत्वाद् गुणान्वक्तुं हि शक्यते

geyanṛtyopahārāśca nānāvādyaravapriyāḥ na hyeṣāṃ vai anantatvād guṇānvaktuṃ hi śakyate

हिन्दी अर्थ

इसके बाद पृथ्वीको धारण करनेवाले वराहभगवानूने मुमोच पूर्व मनसा धारितां च वसुंधराम्॥ ७५ पहले मनसे धारण की हुई वसुंधराको अपने स्थानपर

English

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अध्याय 154

श्लोक 542

मार्गत्वगुत्तरासङ्गशुद्धाङ्गो मुञ्जमेखली मानशिलेन कल्केन चपलो रञ्जिताननः

mārgatvaguttarāsaṅgaśuddhāṅgo muñjamekhalī mānaśilena kalkena capalo rañjitānanaḥ

हिन्दी अर्थ

चकार च नमस्कारं तस्मै देवाय शम्भवे एवं यज्ञवराहेण भूत्वा भूतहितार्थिना। उद्धूता पृथिवी देवी सागराम्बुगता पुरा अथोद्धृत्य क्षितिं देवो जगतः स्थापनेच्छया। पृथिवीप्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः

English

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अध्याय 154

श्लोक 543

पिनद्धोत्पलस्रग्दामा सुकान्तो मधुराकृतिः पाषाणशकलोत्तानकांस्यतालप्रवर्तकः

pinaddhotpalasragdāmā sukānto madhurākṛtiḥ pāṣāṇaśakalottānakāṃsyatālapravartakaḥ

हिन्दी अर्थ

लाकर छोड़ दिया। उनके धारण करनेसे पृथ्वीने भी शान्ति-लाभ किया और उन कल्याणकारी भगवानको नमस्कार किया । इस प्रकार पूर्वकालमें भगवानूने प्राणियोंके हित करनेकी इच्छासे यज्ञवराहरूप धारणकर सागरके जलमें निमग्न हुई पृथ्वीदेवीका उद्धार किया था! इस प्रकार पृथ्वीका उद्धार कर कमलनयन भगवान् विष्णुने जगत्की स्थापनाके लिये पृथ्वीको विभक्त करनेका विचार किया। इस प्रकार अचिन्त्य पराक्रमी, अनृपम पुरुषार्थी,

English

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अध्याय 154

श्लोक 544

असौ गणेश्वरो देवः किंनामा किंनरानुगः य एष गणगीतेषु दत्तकर्णो मुहुर्मुहुः

asau gaṇeśvaro devaḥ kiṃnāmā kiṃnarānugaḥ ya eṣa gaṇagīteṣu dattakarṇo muhurmuhuḥ

हिन्दी अर्थ

सुरश्रेष्ठ, श्रेष्ठ वराहका रूप धारण करनेवाले भगवान् वृषाकपिने रसातलमें गयी हुई पृथ्वीका बलपूर्वक इति श्रीमत्स्ये महापुराणे वराहप्रादुर्भावो नामाष्टचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें वराहप्रादुर्भाव नामक दो सौ अड़तालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

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अध्याय 154

श्लोक 545

स एष वीरको देवि सदा मद्धृदयप्रियः नानाश्चर्यगुणाधारो गणेश्वरगणार्चितः

sa eṣa vīrako devi sadā maddhṛdayapriyaḥ nānāścaryaguṇādhāro gaṇeśvaragaṇārcitaḥ

हिन्दी अर्थ

अमृत-प्राप्तिके लिये समुद्र-मन्थनका उपक्रम और वारुणी (मदिरा )-का प्रादुर्भाव कथं देवा गताः पूर्वममरत्वं विचक्षणाः। तपसा कर्मणा वापि प्रसादात् कस्य तेजसा

English

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अध्याय 154

श्लोक 546

ईदृशस्य सुतस्यास्ति ममोत्कण्ठा पुरान्तक कदाहम् ईदृशं पुत्रं द्रक्ष्याम्यानन्ददायिनम्

īdṛśasya sutasyāsti mamotkaṇṭhā purāntaka kadāham īdṛśaṃ putraṃ drakṣyāmyānandadāyinam

हिन्दी अर्थ

यत्र नारायणो देवो महादेवश्च शूलधृक् । तत्रामरत्वे सर्वेषां सहायौ तत्र तौ स्मृतौ पुरा देवासुरे युद्धे हताश्च शतशः सुरैः। पुनः संजीवनीं विद्यां प्रयोज्य भृगुनन्दनः जीवापयति हैत्येन्द्रान् यथा सुप्तोत्थितानिव। तस्य तुष्टेन देवेन शंकरेण महात्मना

English

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अध्याय 154

श्लोक 547

एष एव सुतस्ते ऽस्तु नयनानन्दहेतुकः त्वया मात्रा कृतार्थो ऽस्तु वीरको ऽपि सुमध्यमे

eṣa eva sutaste 'stu nayanānandahetukaḥ tvayā mātrā kṛtārtho 'stu vīrako 'pi sumadhyame

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतजी! भगवान् नारायणके माहात्म्यको क्रमशः सुनकर हमलोगोंकी तृप्ति नहीं हो रही है, अतः उसे पुनः बतलाइये। प्राचीनकालमें चतुर कृपासे किस प्रकार अमरत्वको प्राप्त हुए थे ?

English

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अध्याय 154

श्लोक 548

इत्युक्ता प्रेषयामास विजयां हर्षणोत्सुका वीरकानयनायाशु दुहिता हिमभूभृतः

ityuktā preṣayāmāsa vijayāṃ harṣaṇotsukā vīrakānayanāyāśu duhitā himabhūbhṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! जहाँ भगवान् विष्णु और शूलधारी शंकरजी वर्तमान हैं, वहाँ वे ही दोनों सभी देवताओंकी अमरत्व-प्राप्तिमें सहायक माने गये हैं। प्राचीनकालमें देवासुर-संग्राममें देवताओंद्वारा मारे गये सैकड़ों राक्षसोंको भृगुनन्दन शुक्राचार्य संजीवनी- विद्याका प्रयोग करके जीवित कर देते थे। तब वे हैत्येन्द्र फिर सोकर उठे हुएकी तरह उठकर लड़ने लगते थे। परम कान्तिमती मृत-संजीवनी विद्या शुक्राचार्यको उनपर प्रसन्न हुए भगवान् शंकरने दी थी।

English

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अध्याय 154

श्लोक 549

सावरुह्य त्वरायुक्ता प्रासादादम्बरस्पृशः विजयोवाच गणपं गणमध्ये प्रवर्तिता

sāvaruhya tvarāyuktā prāsādādambaraspṛśaḥ vijayovāca gaṇapaṃ gaṇamadhye pravartitā

हिन्दी अर्थ

निरुक्तादिके अनुसार वृषाकपिका अर्थ महादेव, वाराहावतार विष्णु तथा ( हनुमान्) आदि हैं। निरुक्त एवं अन्य वैदिक तथा व्याकरणादि ग्रन्थोंके अनुसार इनकी पत्री “वृषाकपायी ' कही गयी हैं। ततोऽमरत्वं हैत्यानां कृतां शुक्रेण धीमता

English

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अध्याय 154

श्लोक 550

एहि वीरक चापल्यात् त्वया देवः प्रकोपितः किमुत्तरं वदत्यर्थे नृत्यरङ्गे तु शैलजा

ehi vīraka cāpalyāt tvayā devaḥ prakopitaḥ kimuttaraṃ vadatyarthe nṛtyaraṅge tu śailajā

हिन्दी अर्थ

या नास्ति सर्वलोकानां देवानां यक्षरक्षसाम्। न नागानामृषीणां च न च ब्रहोन्द्रविष्णुषु तां लब्ध्वा शंकराच्छुक्रः परां निर्वृतिमागतः। ततो देवासुरो घोरः समरः सुमहानभूत् तत्र देवे्हतान् हैत्याञशुक्रो विद्याबलेन च। उत्थापयति हैत्येन्द्राल्लीलयै्र विचक्षणः

English

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अध्याय 154

श्लोक 551

इत्युक्तस्त्यक्तपाषाणशकलो मार्जिताननः आहूतस्तु तयोद्भूतमूलप्रस्तावशंसकः

ityuktastyaktapāṣāṇaśakalo mārjitānanaḥ āhūtastu tayodbhūtamūlaprastāvaśaṃsakaḥ

हिन्दी अर्थ

हन्यमानास्ततो देवाः शतशोऽथ सहस्त्रशः ततस्तेषु विषण्णेषु भगवान् कमलोद्भवः ।

English

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अध्याय 154

श्लोक 552

देव्याः समीपमागच्छद् विजयानुगुप्तः शनैः प्रासादशिखरात्फुल्लरक्ताम्बुजनिभद्युतिः

devyāḥ samīpamāgacchad vijayānuguptaḥ śanaiḥ prāsādaśikharātphullaraktāmbujanibhadyutiḥ

हिन्दी अर्थ

देवाः शृणुत मद्वाक्यं तत्तथैव निरूप्यताम्। क्रियतां दानवैः सार्ध सख्यमैत्राभिधीयताम् दानवेन्द्रो बलिः स्वामी स्तोककालं निवेश्यताम् प्रार्थ्यतां कूर्मरूपश्च पाताले विष्णुरव्ययः। प्रार्थ्यतां मन्दरः शैलो मन्थकार्य प्रवर्त्यताम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 553

तं दृष्ट्वा प्रस्रुतानल्पस्वादुक्षीरपयोधरा गिरिजोवाच सस्नेहं गिरा मधुरवर्णया

taṃ dṛṣṭvā prasrutānalpasvādukṣīrapayodharā girijovāca sasnehaṃ girā madhuravarṇayā

हिन्दी अर्थ

तच्छुत्वा वचनं देवा जग्मुर्दानवमन्दिरम्। अलं विरोधेन वयं भृत्यास्तव बलेऽधुना त्वया चोत्पादिते हैत्य अमृतेऽमृतमन्थने

English

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अध्याय 154

श्लोक 554

एह्येहि यातो ऽसि मे पुत्रतां देवदेवेन दत्तो ऽधुना वीरक

ehyehi yāto 'si me putratāṃ devadevena datto 'dhunā vīraka

हिन्दी अर्थ

एवमुक्तस्तदा देवैः परितुष्टः स दानवः यथा वदत है देवास्तथा कार्य मयाधुना। शक्तोऽहमेक एवात्र मथितुं क्षीरवारिधिम् महेश्वरके मुखसे निकली हुई माहेश्वरी विद्याको शुक्राचार्यमें संस्थित देखकर दानवगण अतिशय प्रमुदित थे। इस विद्याके प्रभावसे बुद्धिमान् शुक्राचार्यने राक्षसोंको अमर कर दिया था। जो विद्या न तो सम्पूर्ण लोकों, देवों, यक्षों

English

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अध्याय 154

श्लोक 555

इत्येवमङ्के निधायाथ तं पर्यचुम्बत्कपोले कलवादिनम्

ityevamaṅke nidhāyātha taṃ paryacumbatkapole kalavādinam

हिन्दी अर्थ

और राक्षसोंमें थी, न नागों और ऋषियोंमें तथा न ब्रह्मा, इन्द्र और विष्णुमें थी, उसे शंकरजीसे प्राप्तकर शुक्र परम संतुष्ट थे। इसके बाद देवताओं और राक्षसोंमें महान् भीषण युद्ध छिड़ गया। उसमें देवताओंद्वारा मारे गये हैत्येन्द्रोंको परम निपुण आचार्य शुक्र अपनी विद्याके बलसे देखते-ही-देखते तुरंत जीवित कर देते थे। इस प्रकार सैकड़ों-हजारों देवताओंको मारा जाता हुआ देखकर इन्द्र, उदारहृदय बृहस्पति तथा सभी देवताओंके

English

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अध्याय 154

श्लोक 556

मूर्ध्न्युपाघ्राय संमार्ज्य गात्राणि भूषयामास दिव्यैः स्वयं भूषणैः किङ्किणीमेखलानूपुरैर् माणिक्यकेयूरहारोरुमूलगुणैः

mūrdhnyupāghrāya saṃmārjya gātrāṇi bhūṣayāmāsa divyaiḥ svayaṃ bhūṣaṇaiḥ kiṅkiṇīmekhalānūpurair māṇikyakeyūrahārorumūlaguṇaiḥ

हिन्दी अर्थ

मुख सूख गये और उनकी इन्द्रियाँ विकल हो गयीं। इस प्रकार उनके चिन्तित होनेपर कमलोद्भव जगत्पति भगवान् ब्रह्माने सुमेरु पर्वतपर अवस्थित देवताओंसे इस प्रकार कहा॥ ३--१२॥ ब्रह्माजी बोले--देवगण! आपलोग मेरी बात सुनिये और उसके अनुसार काम कीजिये। इस कार्यमें आप लोग दानवोंके साथ मित्रता कर लें और अमृत-प्राप्तिके लिये उपाय करें। इसके लिये चक्रपाणि भगवान् विष्णुको उद्बोधित कोजिये और वरुणको सहायक तथा शेषनागरूपी रस्सीसे परिवेष्टित मन्दराचलको मथानी बनाकर क्षीरसमुद्रका मन्थन कोजिये। थोड़े समयके लिये दानवेन्द्र बलिको अध्यक्षरूपमें नियुक्त कर दीजिये । पातालमें स्थित कूर्मरूप

English

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अध्याय 154

श्लोक 557

कोमलैः पल्लवैश्चित्रितैश्चारुभिर् दिव्यमन्त्रोद्भवैस् तस्य शुभैस्ततो भूरिभिश्चाकरोन्मिश्रसिद्धार्थकैर् अङ्गरक्षाविधिम्

komalaiḥ pallavaiścitritaiścārubhir divyamantrodbhavais tasya śubhaistato bhūribhiścākaronmiśrasiddhārthakair aṅgarakṣāvidhim

हिन्दी अर्थ

अव्यय भगवान् विष्णुकी और मन्दराचलकी प्रार्थना कोजिये। तत्पश्चात् समुद्र-मन्थनका कार्य प्रारम्भ कीजिये। उस कथनको सुनकर देवगण दानवराजके महलमें पहुँचे और कहने लगे-'बले! अब विरोध बंद कीजिये, हमलोग तो आपके भृत्य हैं। आप अमृत-प्राप्तिके लिये उद्योग करें और शेषनागको रस्सीके रूपमें वरण करें। हैत्य! अमृतमन्थनरूप कार्यमें आपके द्वारा अमृतके उत्पन्न हो जानेपर आपकी कृपासे हम सभी लोग निःसंदेह अमर

English

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अध्याय 154

श्लोक 558

एवमादाय चोवाच कृत्वा स्रजं मूर्ध्नि गोरोचनापत्रभङ्गोज्ज्वलम्

evamādāya covāca kṛtvā srajaṃ mūrdhni gorocanāpatrabhaṅgojjvalam

हिन्दी अर्थ

हो जायँगे।' देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दानवराज “देवगण! जैसा आपलोग कह रहे हैं, मुझे इस समय वैसा ही करना चाहिए। मैं तो अकेला ही क्षीरसागरका एवमुक्त्वा स हैत्येन्द्रो देवैः सह ययौ तदा। मन्दरं प्रार्थयामास सहायत्वे धराधरम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 559

गच्छ गच्छाधुना क्रीड सार्धं गणैरप्रमत्तो नगे श्वभ्रवर्ज शनैर्व्यालमालाकुलाः शैलसानुद्रुमदन्तिभिर् भिन्नसाराः परे सङ्गिनः

gaccha gacchādhunā krīḍa sārdhaṃ gaṇairapramatto nage śvabhravarja śanairvyālamālākulāḥ śailasānudrumadantibhir bhinnasārāḥ pare saṅginaḥ

हिन्दी अर्थ

सुरासुराणां सर्वेषां महत्कार्यमिदं यतः कल्प्यतां नेत्रकार्ये यः शक्तः स्याद् भ्रमणे मम। ततस्तु निर्गतौ देवौ कूर्मशेषौ महाबलौ

English

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अध्याय 154

श्लोक 560

जाह्नवीयं जलं क्षुब्धतोयाकुलं कूलं मा विशेथा बहुव्याघ्रदुष्टे वने

jāhnavīyaṃ jalaṃ kṣubdhatoyākulaṃ kūlaṃ mā viśethā bahuvyāghraduṣṭe vane

हिन्दी अर्थ

त्रैलोक्यधारणेनापि न ग्लानिर्मम जायते। किमु मन्दरकात् क्षुद्राद् गुटिकासंनिभादिह ब्रह्माण्डवेष्टनेनापि ब्रह्माण्डमथनेन वा। न मे ग्लानिर्भवेद् देहे किमु मन्दरवर्तने निराधारं यदा शैलं न शेकुर्देवदानवाः। मन्दरश्रामणं कर्तु क्षीरोदमथने तथा

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 561

वत्सासंख्येषु दुर्गा गणेशेष्वेतस्मिन्वीरके पुत्रभावोपतुष्टान्तःकरणा तिष्ठतु

vatsāsaṃkhyeṣu durgā gaṇeśeṣvetasminvīrake putrabhāvopatuṣṭāntaḥkaraṇā tiṣṭhatu

हिन्दी अर्थ

यत्रास्ते देवदेवेशः स्वयमेव जनार्दनः तत्रापश्यन्त तं देवं सितपदाप्रभं शुभम्। योगनिद्रासुनिरतं पीतवाससमच्युतम्

English

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अध्याय 154

श्लोक 562

स्वस्य पितृजनप्रार्थितं भव्यमायातिभाविन्यसौ भव्यता

svasya pitṛjanaprārthitaṃ bhavyamāyātibhāvinyasau bhavyatā

हिन्दी अर्थ

हारकेयूरनद्धाङ्गमहिपर्यङ्कसंस्थितम् मन्थन करनेमें समर्थ हूँ। इस समय मैं आपलोगोंकी अमरताके निमित्त दिव्य अमृत ले आऊँगा। जो सुदूरसे आश्रयके लिये आये हुए शरणागत वैरियोंको भक्तिपूर्वक सम्मानित नहीं करता, उसका यह लोक और परलोक दोनों नष्ट हो जाते हैं। इस समय मैं आप सभी लोगोंकी स्नेहपूर्वक रक्षा करूँगा।' ऐसा कहकर हैत्येन्द्र बलि

English

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अध्याय 154

श्लोक 563

सो ऽपि निर्वर्त्य सर्वान् गणान् सस्मयमाह बालत्वलीलारसाविष्टधीः

so 'pi nirvartya sarvān gaṇān sasmayamāha bālatvalīlārasāviṣṭadhīḥ

हिन्दी अर्थ

मन्दराचलसे प्रार्थना करते हुए बोला-' मन्दर! चूँकि इस समय हम सभी देवताओं और असुरोंका यह महान् कार्य उपस्थित हो गया है, अतः इस अमृत-मन्थनके कार्यमें तुम मथानी बन जाओ।' मन्दराचलने कहा--'यदि मुझे कोई आधार मिले तो मुझे स्वीकार है जिसपर स्थित होकर मैं भ्रमण करूँगा और वरुणालयको मथ डालूँगा। साथ ही मेरे भ्रमण करते समय जो समर्थ हो सके, ऐसा किसीको नेतीके कार्यके लिये चुनिये।' तदनन्तर महाबली

English

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अध्याय 154

श्लोक 564

एष मात्रा स्वयं मे कृतभूषणो ऽत्र एष पटः पाटलैर्बिन्दुभिः सिन्दुवारस्य पुष्पैरियं मालतीमिश्रिता मालिका मे शिरस्याहिता

eṣa mātrā svayaṃ me kṛtabhūṣaṇo 'tra eṣa paṭaḥ pāṭalairbindubhiḥ sinduvārasya puṣpairiyaṃ mālatīmiśritā mālikā me śirasyāhitā

हिन्दी अर्थ

कूर्म और शेषनाग-दोनों देवता पातालसे ऊपर आये। ये दोनों भगवान् विष्णुके चतुर्थांश भाग हैं और पृथ्वीको धारण करनेके लिये नियुक्त हैं। तब शेष और कच्छप गर्वपूर्ण वचन बोले कूर्मने कहा--मुझे तो इस त्रिलोकीको धारण करनेपर भी थकावट नहीं होती तो भला इस कार्यमें गुटिकाके समान क्षुद्र मन्दरको धारण करनेकी क्या बात है ? शेषनागने कहा--जब समस्त ब्रह्माण्डका वेष्टन

English

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अध्याय 154

श्लोक 565

को ऽयमातोद्यधारी गणस्तस्य दास्यामि हस्तादिदं क्रीडनम्

ko 'yamātodyadhārī gaṇastasya dāsyāmi hastādidaṃ krīḍanam

हिन्दी अर्थ

बनने तथा उसका मन्थन करनेसे मेरे शरीरमें शिथिलता नहीं आती तो मन्दरके घुमानेसे कौन-सा कष्ट होगा? ऐसा कहकर नागने लीलापूर्वक उसी क्षण उस मन्दराचलको उखाड़्कर क्षीरसागरमें डाल दिया। उस समय कूर्म उसके नीचे स्थित हुए। किंतु क्षीरसमुद्रका मन्थन आरम्भ होनेपर जब देवता और दानव उस आधारशून्य मन्दराचलको घुमानेमें समर्थ न हो सके, तब वे बलिको साथ लेकर भगवान् नारायणके निवासस्थानपर गये, जहाँ

English

Here ends the one hundred and fifty-fourth chapter on the birth of Kumdra Kdrtikeya.

अध्याय 154

श्लोक 566

दक्षिणात्पश्चिमं पश्चिमादुत्तरमुत्तरात्पूर्वमभ्येत्य सख्या युता प्रेक्षती तं गवाक्षान्तराद्वीरकं शैलपुत्री बहिः क्रीडनं यज्जगन्मातुरप्येष चित्तभ्रमः

dakṣiṇātpaścimaṃ paścimāduttaramuttarātpūrvamabhyetya sakhyā yutā prekṣatī taṃ gavākṣāntarādvīrakaṃ śailaputrī bahiḥ krīḍanaṃ yajjaganmāturapyeṣa cittabhramaḥ

हिन्दी अर्थ

देवाधिदेव भगवान् जनार्दन विराजमान थे। वहाँ उन्होंने श्वेत कमलके समान कान्तियुक्त एवं कल्याणकारी भगवान् अच्युतको देखा, जिनके शरीरपर पीताम्बर झलक रहा था, जो योगनिद्रामें निमग्न थे, जिनका शरीर हार और केयूरसे विभूषित था, जो शेषनागकी शय्यापर शयन कर रहे पादपदोन पद्मायाः स्पृशन्तं नाभिमण्डलम्॥ ३४ थे और अपने चरणकमलसे लक्ष्मीके नाभिमण्डलका स्पर्श

English

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अध्याय 154

श्लोक 567

पुत्रलुब्धो जनस्तत्र को मोहमायाति न स्वल्पचेता जडो मांसविण्मूत्रसंघातदेहः

putralubdho janastatra ko mohamāyāti na svalpacetā jaḍo māṃsaviṇmūtrasaṃghātadehaḥ

हिन्दी अर्थ

सव्यबाहूपधानं तं तुष्टुवुर्देवदानवाः। नमो लोकत्रयाध्यक्ष तेजसा जितभास्कर।

English

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अध्याय 154

श्लोक 568

द्रष्टुमभ्यन्तरे नाकवासेश्वरैर् इन्दुमौलिं प्रविष्टेषु कक्षान्तरम्

draṣṭumabhyantare nākavāseśvarair indumauliṃ praviṣṭeṣu kakṣāntaram

हिन्दी अर्थ

रुद्ररूपाय शर्वाय नमः संहारकारिणे नमः क्रमत्रयाक्रान्त त्रैलोक्यायाभवाय च नमः प्रचण्डहैत्येन्द्रकुलकालमहानल। नमो नाभिहदोद्भूतपदागर्भ महाबल

English

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अध्याय 154

श्लोक 569

वाहनात्यावरोहा गणास्तैर्युतो लोकपालास्त्रमूर्तो ह्ययं खड्गो विखड्गकरो निर्ममः कृतान्तः कस्य केनाहतो ब्रूत मौने भवन्तो ऽस्त्रदण्डेन किं दुःस्पृहाः

vāhanātyāvarohā gaṇāstairyuto lokapālāstramūrto hyayaṃ khaḍgo vikhaḍgakaro nirmamaḥ kṛtāntaḥ kasya kenāhato brūta maune bhavanto 'stradaṇḍena kiṃ duḥspṛhāḥ

हिन्दी अर्थ

पद्मभूत महाभूत कर्त्रे हर्त्रे जगत्प्रिय। जनिता सर्वलोकेश क्रियाकारणकारिणे लक्ष्मीमुखाब्जमधुप नमः कीर्तिनिवासिने

English

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अध्याय 154

श्लोक 570

भीममूर्त्याननेनास्ति कृत्यं गिरौ य एषो ऽस्त्रज्ञेन किं वध्यते

bhīmamūrtyānanenāsti kṛtyaṃ girau ya eṣo 'strajñena kiṃ vadhyate

हिन्दी अर्थ

मथ्यताममृतं देव स्वधास्वाहार्थकामिनाम् ततः श्रुत्वा स भगवान् स्तोत्रपूर्व वचस्तदा। स्वागतं विबुधा: सर्वे किमागमनकारणम्।

English

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अध्याय 154

श्लोक 571

मा वृथा लोकपालानुगचित्तता एवम् एवैतद् इत्यूचुरस्मै तदा देवताः

mā vṛthā lokapālānugacittatā evam evaitad ityūcurasmai tadā devatāḥ

हिन्दी अर्थ

यस्मात् कार्यादिह ग्राप्तास्तद् ब्रूत विगतज्वराः अमरत्वाय देवेश मथ्यमाने महोदधौ

English

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अध्याय 154

श्लोक 572

देवदेवानुगं वीरकं लक्षणा प्राह देवी वनं पर्वता निर्झराण्यग्निदेव्यान्यथो भूतपा निर्झराम्भोनिपातेषु निमज्जत

devadevānugaṃ vīrakaṃ lakṣaṇā prāha devī vanaṃ parvatā nirjharāṇyagnidevyānyatho bhūtapā nirjharāmbhonipāteṣu nimajjata

हिन्दी अर्थ

कर रहे थे, गरुड़ अपने डैनेरूपी पंखसे जिनपर हवा कर रहे थे, चारों ओरसे सिद्ध, चारण और किन्नर जिनकी स्तुतिमें तन्मय थे, मूर्तिमान् वेद चारों ओरसे जिनकी स्तुति कर रहे थे तथा जो अपनी बायीं भुजाको तकिया बनाये हुए थे। तब वे सभी देव-दानव सब ओरसे हाथ जोड़कर प्रणाम करके उन भगवानूकी स्तुति करने लगे अपने तेजसे सूर्यको पराजित करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। विष्णुको प्रणाम है। जिष्णुको अभिवादन है। आप कैटभका वध करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। सृष्टि-कर्म करनेवालेको प्रणाम है। आप जगत्के

English

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अध्याय 154

श्लोक 573

पुष्पजालावनद्धेषु धामस्वपि प्रोत्तुङ्गनानाद्रिकुञ्जेष्वनुगर्जन्तु हेमारुतास्फोटसंक्षेपणात् कामतः

puṣpajālāvanaddheṣu dhāmasvapi prottuṅganānādrikuñjeṣvanugarjantu hemārutāsphoṭasaṃkṣepaṇāt kāmataḥ

हिन्दी अर्थ

पालनकर्ता हैं, आपको अभिवादन है। आप रुद्ररूपसे संहार करनेवाले हैं, आप शर्वको नमस्कार है । त्रिशूलरूप आयुधसे धर्षित न होनेवाले आपको प्रणाम है। दानवोंका वध करनेवाले आपको अभिवादन है। आप तीन पगसे त्रिलोकीको आक्रान्त कर लेनेवाले और अजन्मा हैं, आपको नमस्कार है। आप प्रचण्ड हैत्येन्द्रोंके कुलके लिये कालरूप महान् अग्नि हैं, आपको प्रणाम है। महाबल! आपके नाभि-कुण्डसे पद्मकी उत्पत्ति हुई है,

English

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अध्याय 154

श्लोक 574

काञ्चनोत्तुङ्गशृङ्गावरोहक्षितौ हेमरेणूत्करासङ्गद्युतिं खेचराणां वनाधायिनि रम्ये बहुरूपसंपत्प्रकरे गणान्वासितं मन्दरकन्दरे सुन्दरमन्दारपुष्पप्रवालाम्बुजे सिद्धनारीभिर् आपीतरूपामृतं विस्तृतैर् नेत्रपात्रैर् अनुन्मेषिभिर् वीरके शैलपुत्री निमेषान्तराद् अस्मरत्पुत्रगृध्री विनोदार्थिनी

kāñcanottuṅgaśṛṅgāvarohakṣitau hemareṇūtkarāsaṅgadyutiṃ khecarāṇāṃ vanādhāyini ramye bahurūpasaṃpatprakare gaṇānvāsitaṃ mandarakandare sundaramandārapuṣpapravālāmbuje siddhanārībhir āpītarūpāmṛtaṃ vistṛtair netrapātrair anunmeṣibhir vīrake śailaputrī nimeṣāntarād asmaratputragṛdhrī vinodārthinī

हिन्दी अर्थ

आपको अभिवादन है। आप पद्मको उत्पन्न करनेवाले, महाभूत, जगतूके कर्ता, हर्ता और प्रिय, सभीके जनक, सभी लोकोंके स्वामी, कार्य और कारण--दोनोंका निर्माण करनेवाले, अमरोंके शत्रुओंका विनाश करनेके लिये महान् समर करनेवाले, लक्ष्मीके मुखकमलके मधुप और यशमें निवास करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी अमरत्व-प्राप्तिके लिये सभी पर्वतोंमें विशाल मन्दराचलको, जो अयुतायुत योजन विस्तृत है, अवश्य धारण कोजिये। देव! आप अपनी अनन्त बलशालिनी भुजाओंद्वारा पर्वतको रोककर एक हाथसे स्वाहा-स्वधाके अभिलाषी

English

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अध्याय 154

श्लोक 575

सो ऽपि तादृक्क्षणावाप्तपुण्योदयो यो ऽपि जन्मान्तरस्यात्मजत्वं गतः क्रीडतस्तस्य तृप्तिः कथं जायते यो ऽपि भाविजगद्वेधसा तेजसः कल्पितः प्रतिक्षणं दिव्यगीतक्षणो नृत्यलोलो गणेशैः प्रणतः

so 'pi tādṛkkṣaṇāvāptapuṇyodayo yo 'pi janmāntarasyātmajatvaṃ gataḥ krīḍatastasya tṛptiḥ kathaṃ jāyate yo 'pi bhāvijagadvedhasā tejasaḥ kalpitaḥ pratikṣaṇaṃ divyagītakṣaṇo nṛtyalolo gaṇeśaiḥ praṇataḥ

हिन्दी अर्थ

भगवान् मधुसूदन उस स्तुतिपूर्ण वचनको सुनकर उस योगनिद्राका परित्याग कर इस प्रकार बोले श्रीभगवानूने कहा--देवगण! आप सब लोगोंका स्वागत है। आपलोगोंके यहाँ आगमनका क्या उद्देश्य है? आपलोग जिस कार्यके लिये यहाँ आये हैं। उसे निश्चिन्त होकर बतलाइये। नारायणके ऐसा कहनेपर

English

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अध्याय 154

श्लोक 576

क्षणं सिंहनादाकुले गण्डशैले सृजद्रत्नजाले बृहत्सालताले क्षणं फुल्लनानातमालालिकाले क्षणं वृक्षमूले विलोलो मराले

kṣaṇaṃ siṃhanādākule gaṇḍaśaile sṛjadratnajāle bṛhatsālatāle kṣaṇaṃ phullanānātamālālikāle kṣaṇaṃ vṛkṣamūle vilolo marāle

हिन्दी अर्थ

यथामृतत्वं देवेश तथा नः कुरु माधव। त्वया विना न तच्छक्यमस्माभिः कैटभार्दन इत्युक्तश्च ततो विष्णुरप्रधृष्योऽरिमर्दनः जगाम देवैः सहितो यत्रासौ मन्दराचलः। वेष्टितो भोगिभोगेन धृतश्चामरदानवैः

English

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अध्याय 154

श्लोक 577

क्षणे स्वल्पपङ्के जले पङ्कजाढ्ये क्षणं मातुरङ्के शुभे निष्कलङ्के परिक्रीडते बाललीलाविहारी गणेशाधिपो देवतानन्दकारी निकुञ्जेषु विद्याधरैर्गीतशीलः पिनाकीव लीलाविलासैः सलीलः

kṣaṇe svalpapaṅke jale paṅkajāḍhye kṣaṇaṃ māturaṅke śubhe niṣkalaṅke parikrīḍate bālalīlāvihārī gaṇeśādhipo devatānandakārī nikuñjeṣu vidyādharairgītaśīlaḥ pinākīva līlāvilāsaiḥ salīlaḥ

हिन्दी अर्थ

विषभीतास्ततो देवा यतः पुच्छं ततः स्थिताः। मुखतो हैत्यसंघास्तु सैंहिकेयपुरःसराः नारायणः स भगवान् भुजयुग्मद्दयेन तु

English

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अध्याय 154

श्लोक 578

प्रकाश्य भुवनाभोगी ततो दिनकरे गते देशान्तरं तदा पश्चाद् दूरमस्तावनीधरम्

prakāśya bhuvanābhogī tato dinakare gate deśāntaraṃ tadā paścād dūramastāvanīdharam

हिन्दी अर्थ

ततो देवासुरैः सर्वैर्जयशब्दपुरःसरम्। दिव्यं वर्षशतं साग्रं मथितः क्षीरसागरः ततः श्रान्तास्तु ते सर्वे देवा हैत्यपुरःसराः। श्रान्तेषु तेषु देवेन्द्रो मेघो भूत्वाम्बुशीकरान् भग्नप्रायेषु देवेषु शान्तेषु कमलासनः

English

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अध्याय 154

श्लोक 579

उदयास्ते पुरोभावी यो हि चास्ते ऽवनीधरः मित्रत्वमस्य सुदृढं हृदये परिचिन्त्यताम्

udayāste purobhāvī yo hi cāste 'vanīdharaḥ mitratvamasya sudṛḍhaṃ hṛdaye paricintyatām

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मप्रोत्साहिता देवा ममन्थुः पुनरम्बुधिम्। भ्राम्यमाणे ततः शैले योजनायुतशेखरे ततः फलानां वीर्येण पुष्पौषधिरसेन च। क्षीरमम्बुधिजं सर्वं दधिरूपमजायत

English

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अध्याय 154

श्लोक 580

नित्यमाराधितः श्रीमान् पृथुमूलः समुन्नतः नाकरोत्सेवितुं मेरुर् उपहारं पतिष्यतः

nityamārādhitaḥ śrīmān pṛthumūlaḥ samunnataḥ nākarotsevituṃ merur upahāraṃ patiṣyataḥ

हिन्दी अर्थ

वारुणीगन्धमाघ्राय मुमुदुर्देवदानवाः। तदास्वादेन बलिनो देवहैत्यादयोऽभवन् समुद्रका मन्थन करना चाहते हैं। भगवान् माधव! हमें जिस उपायसे अमरत्वकी प्राप्ति हो सके, आप वैसा करें। कैटभशत्रो! आपके बिना हमलोग उस अमृतको प्राप्त नहीं कर सकते, अतः सर्वव्यापी नाथ! आप हमलोगोंके अग्रणी बनें।' उनके ऐसा कहनेपर शत्रुनाशक अजेय भगवान् विष्णु देवताओंके साथ उस स्थानपर गये, जहाँ मन्दराचल था। उस समय वह मन्दराचल शेषनागके फणोंसे लिपटा हुआ था तथा देवता और

English

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अध्याय 154

श्लोक 581

जले ऽप्येषा व्यवस्थेति संशयेताखिलं बुधः दिनान्तानुगतो भानुः स्वजनत्वमपूरयत्

jale 'pyeṣā vyavastheti saṃśayetākhilaṃ budhaḥ dināntānugato bhānuḥ svajanatvamapūrayat

हिन्दी अर्थ

दानवगण उसे पकड़े हुए थे। उस समय विषके भयसे डरकर देवगण तो नागकी पूँछकी ओर और राहुको अगुआ बनाकर हैत्यगण मुखकी ओर स्थित थे। बलि शेषनागके हजार मुखवाले सिरको बायें हाथसे तथा देहको दाहिने हाथसे पकड़कर खींच रहा था। भगवान् नारायणने सुन्दर कन्दराओंसे सुशोभित अमृतके मन्थन- दण्डस्वरूप मन्दराचलको अपनी दोनों भुजाओंसे पकड़ा। इस प्रकार सभी देवताओं तथा हैत्योंने मिलकर जय-

English

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अध्याय 154

श्लोक 582

संध्याबद्धाञ्जलिपुटा मुनयो ऽभिमुखा रविम् याचन्त्यागमनं शीघ्रं निवार्यात्मनि भाविताम्

saṃdhyābaddhāñjalipuṭā munayo 'bhimukhā ravim yācantyāgamanaṃ śīghraṃ nivāryātmani bhāvitām

हिन्दी अर्थ

जयकार करते हुए सौ दिव्य वर्षांसे भी अधिक कालतक क्षीरसागरका मन्थन करते रहे, तब हैत्योंसहित वे सभी मेघरूप धारणकर उनके ऊपर अमृतके समान जलकणोंकी वृष्टि करने लगे और शीतल वायु बहने लगी॥ ४६-५५ ३॥ उस समय प्रायः सभी देवताओंके शिथिल एवं शान्त हो जानेपर ब्रह्मा पुनः-पुनः इस प्रकार कहने लगे-- अरे! समुद्रका मन्थन करते चलो। उद्योगी पुरुषोंको सदा अपार लक्ष्मी अवश्य प्राप्त होती है।' ब्रह्माद्वारा इस प्रकार उत्साहित किये जानेपर देवासुरगण पुनः समुद्रका मन्थन करने लगे। इसके बाद दस हजार योजन विस्तृत शिखरवाले

English

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अध्याय 154

श्लोक 583

व्यजृम्भत तथा लोके क्रमाद्वैभावरं तमः कुटिलस्येव हृदये कालुष्यं दूषयन्मनः

vyajṛmbhata tathā loke kramādvaibhāvaraṃ tamaḥ kuṭilasyeva hṛdaye kāluṣyaṃ dūṣayanmanaḥ

हिन्दी अर्थ

मन्दराचलके घुमाये जानेपर (उसके शिखरोंपरसे) हाथियोंके समूह, शूकर, अष्टापद शरभ करोड़ों हिंसक पशु आदि तथा पुष्पों और फलोंसे लदे हुए वृक्ष समुद्रमें गिरने लगे। उन गिरे हुए फलोंके सारभाग तथा पुष्पों और ओषधियोंके रससे क्षीरसागरका जल दहीके रूपमें परिवर्तित हो गया। तदनन्तर उन सभी जीवोंके हजारों प्रकारसे चूर्ण हो जानेपर उनको मज्जा और जलके संयोगसे वारुणी उत्पन्न हुई। उस वारुणीकी गन्धको सूँघकर देवता और दानव परम

English

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अध्याय 154

श्लोक 584

ज्वलत्फणिफणारत्नदीपोद्द्योतितभित्तिके शयनं शशिसंघातशुभ्रवस्त्रोत्तरच्छदम्

jvalatphaṇiphaṇāratnadīpoddyotitabhittike śayanaṃ śaśisaṃghātaśubhravastrottaracchadam

हिन्दी अर्थ

प्रसन्न हुए और उसके आस्वादनसे वे बलवान् हो गये। अभवच्चाग्रतो विष्णुर्भुजमन्दरबन्धनः । सवासुकिफणालग्नपाणिः कृष्णो व्यराजत यथा नीलोत्पलैर्युक्तो ब्रह्मदण्डोऽतिविस्तरः। ध्वनिर्मेघसहस्त्रस्य जलधेरुत्थितस्तदा

English

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अध्याय 154

श्लोक 585

नानारत्नद्युतिलसच्छक्रचापविडम्बकम् रत्नकिङ्किणिकाजालं लम्बमुक्ताकलापकम्

nānāratnadyutilasacchakracāpaviḍambakam ratnakiṅkiṇikājālaṃ lambamuktākalāpakam

हिन्दी अर्थ

ततो रूद्रा महोत्साहा वसवो गुह्यकादयः द्विमूर्धा वज्रदंष्ट्रश्च सैंहिकेयो बलिस्तथा

English

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अध्याय 154

श्लोक 586

कमनीयचलल्लोलवितानाच्छादिताम्बरम् मन्दिरे मन्दसंचारः शनैर्गिरिसुतायुतः

kamanīyacalallolavitānācchāditāmbaram mandire mandasaṃcāraḥ śanairgirisutāyutaḥ

हिन्दी अर्थ

अमरत्वं सुरा जग्मुः काञ्जनच्छविसंनिभाः तब असुरोंने अत्यन्त वेगपूर्वक मथानी और शेषनागको चारों ओरसे पुनः पकड़ा। उस समय सुमेरु पर्वत मथानीका डंडा बना। भगवान् विष्णुने अग्रसर होकर अपनी भुजासे मन्दराचलको बाँध लिया। उस समय वासुकिके फणोंपर रखा हुआ उनका साँबला हाथ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो नीले कमलोंसे युक्त अत्यन्त विशाल ब्रह्मदण्ड हो। तत्पश्चात् समुद्रसे हजारों मेघको-

English

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अध्याय 154

श्लोक 587

तस्थौ गिरिसुताबाहुलतामीलितकंधरः शशिमौलिसितज्योत्स्ना शुचिपूरितगोचरः

tasthau girisutābāhulatāmīlitakaṃdharaḥ śaśimaulisitajyotsnā śucipūritagocaraḥ

हिन्दी अर्थ

शेषनागके दूसरे भागमें इन्द्र, उसके बाद आदित्य, उसके बाद महान् उत्साही रुद्रगण, वसुगण तथा गुह्यक आदि थे। आगेकी ओर विप्रचित्ति, नमुचि, वृत्र, शम्बर, द्विमूर्धा, वज्रदंष्ट्र, राहु तथा बलि थे। ये तथा इनके सिवा अन्य बहुत-से राक्षस मुखभागमें उपस्थित थे। बल और तेजसे विभूषित एवं गर्वसे भरे हुए वे सभी समुद्रका मन्थन कर रहे थे। देवताओं और दानवोंद्वारा मन्दराचलको मथानीसे मन्थन किये जाते हुए समुद्रसे मेघगर्जनके समान

English

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अध्याय 154

श्लोक 588

गिरिजाप्यसितापङ्गी नीलोत्पलदलच्छविः विभावर्या च संपृक्ता बभूवातितमोमयी तमुवाच ततो देवः क्रीडाकेलिकलायुतम्

girijāpyasitāpaṅgī nīlotpaladalacchaviḥ vibhāvaryā ca saṃpṛktā babhūvātitamomayī tamuvāca tato devaḥ krīḍākelikalāyutam

हिन्दी अर्थ

भीषण ध्वनि निकलने लगी। वहाँ उस महान् मन्दराचलसे पिसे हुए नाना प्रकारके सैकड़ों-हजारों जलचर नष्ट हो गये। उस पर्वतने वरुणलोकके पाताललोकवासी अनेकों प्रकारके प्राणियोंको विनाशके पथपर पहुँचा दिया। उस पर्वतके घुमाये जाते समय उस मन्दराचलके ऊपर उगे हुए विशाल वृक्ष पक्षियोंसहित परस्परके संघर्षणसे टूट- टूटकर गिर रहे थे। उनके संघर्षणसे उत्पन्न हुई अग्निने बारंबार प्रज्जलित होकर अपनी लपटोंसे मन्दराचलको उसी प्रकार आच्छादित कर लिया, जैसे बिजलियाँ नीले मेघको ढक लेती हैं। उस अग्निने पर्वतसे निकले हुए सिंहों और हाथियोंको तथा अनेकों प्रकारके प्राणरहित सभी जीवोंको भस्म कर दिया

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

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शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

6 स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।