कठोपनिषद्

Vallī 6श्लोक 3/1817%

Katha Upanishad 6.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उसके भय से अग्नि तपता है, उसके भय से सूर्य चमकता है; उसके भय से इन्द्र और वायु, और पाँचवाँ मृत्यु — दौड़ता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Out of fear of him, fire burns; out of fear, the sun shines; out of fear, Indra, Vāyu, and Death — the fifth — runs.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

परमात्मा का अमोघ अनुशासन: जिसके भय (अचूक नियम) से अग्नि तपती है, जिसके भय से सूर्य चमकता है; और जिसके भय से इंद्र, वायु और पांचवें यमराज (मृत्यु) निरंतर अपने-अपने कार्यों में दौड़ रहे हैं!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज उस परम शक्ति के अनुशासन का प्रत्यक्ष प्रमाण देते हैं: 'भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः॥' — उस परमात्मा के अमोघ नियम और मर्यादा के कारण ही अग्नि निरंतर उष्णता देती है, सूर्य निरंतर प्रकाश देता है, इंद्र (विद्युत) और वायु निरंतर बहते हैं, और यहाँ तक कि साक्षात् काल और मृत्यु भी एक क्षण का विश्राम लिए बिना अपने कर्तव्य में दौड़ रही है! यदि परमात्मा का यह अनुशासन न हो, तो पूरी सृष्टि एक क्षण में भस्म और नष्ट हो जाए। यहाँ 'भय' का अर्थ कोई कायरतापूर्ण डर नहीं है; इसका अर्थ है प्रकृति की अंतर्निहित 'मर्यादा' और 'सर्वोच्च आदर' (Reverence & Inviolable Law)। जब सूर्य, वायु, अग्नि और साक्षात् मृत्यु जैसी महाशक्तियाँ भी अपने नियमों से टस से मस नहीं हो सकतीं और बिना किसी आलस्य के अपना कर्तव्य निभा रही हैं, तो एक मनुष्य होकर हम अपने कर्तव्यों से कैसे भाग सकते हैं? हम आलस्य, प्रमाद और अनुशासनहीनता में अपने जीवन को कैसे नष्ट कर सकते हैं? यह मंत्र हमें अपने कर्तव्यों के प्रति पूर्ण निष्ठावान और समयबद्ध बनने की प्रेरणा देता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **कर्तव्य-निष्ठा का व्रत**: सूर्य और वायु की भाँति अपने दैनिक दायित्वों को बिना किसी बहाने या आलस्य के समय पर पूरा करें। - **मर्यादा में जीवन**: स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं है; नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान करें, क्योंकि मर्यादा ही ब्रह्मांड की रक्षा करती है। - **मृत्यु की अनिवार्यता का बोध**: जब मृत्यु भी समय पर अपना काम करने दौड़ रही है, तो अपने समय को व्यर्थ न गंवाएं; आत्म-कल्याण के कार्यों को कल पर न टालें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“जब सूर्य, अग्नि और स्वयं मृत्यु भी परमात्मा के नियम में बंधकर निरंतर कर्मरत हैं, तो क्या मैं अपने जीवन के अमूल्य समय को आलस्य और प्रमाद में तो नष्ट नहीं कर रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

अपरिवर्तनीय भौतिक नियम (Fundamental Laws of Physics): थर्मोडायनामिक्स, प्रकाश, विद्युत और मृत्यु (एंट्रॉपी) जिस अचूक नियम से बंधे हैं, वह ब्रह्मांड की सर्वोच्च अनुशासनकारी व्यवस्था है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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आगे क्या · What next