कठोपनिषद्

Vallī 6श्लोक 18/18100%

Katha Upanishad 6.18

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् ।ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

मृत्यु-कथित इस विद्या और सम्पूर्ण योग-विधि को प्राप्त करके — नचिकेता ब्रह्म-प्राप्त हुआ, निर्मल हुआ, मृत्यु-रहित हुआ। ऐसे ही जो कोई अन्य भी आत्मा को इस प्रकार जाने — वह भी ऐसा ही होगा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Having received this knowledge spoken by Death — and the whole discipline of yoga — Naciketas became free of dust, free of death, attained to Brahman. So shall any other who knows the Self thus.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

उपाख्यान की पूर्णता और नचिकेता की मुक्ति: इस प्रकार नचिकेता ने मृत्यु (यमराज) के द्वारा कही गई इस संपूर्ण आत्म-विद्या को और योग की समस्त विधि को पूर्ण रूप से प्राप्त करके — ब्रह्म को प्राप्त कर लिया, और वह समस्त पाप-पुण्यों से रहित तथा मृत्यु-भय से मुक्त होकर अमर हो गया। और कोई भी अन्य साधक जो इस प्रकार अपने अंतरात्मा को तत्त्वतः जान लेगा — वह भी इसी प्रकार विरज और अमर होकर परब्रह्म को प्राप्त हो जाएगा!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
कठोपनिषद् का यह अंतिम उपसंहार संपूर्ण मानव जाति के लिए आशा, संप्रभुता और विजय का अमर घोषणा-पत्र है: 'मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्। ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव॥' — साक्षात् मृत्यु के मुख में जाकर, उस बालक नचिकेता ने यमराज से इस परम आत्म-विद्या को और योग की संपूर्ण कार्यप्रणाली को प्राप्त किया; और उसे अपने जीवन में उतारकर वह जीते-जी ब्रह्म को प्राप्त हो गया! वह 'विरजः' (समस्त मानसिक मैल, वासनाओं और पापों से रहित) हो गया, और 'विमृत्युः' (मृत्यु और काल के भय से सदा के लिए मुक्त) होकर अमर हो गया! और उपनिषद् अंत में यह सार्वभौमिक गारंटी देता है: 'अन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव' — संसार का कोई भी अन्य मनुष्य, जो इस प्रकार अपनी अंतरात्मा को जान लेगा, वह भी नचिकेता की भाँति विरज, विमृत्यु और ब्रह्म-स्वरूप हो जाएगा! यह उपनिषद् किसी एक धर्म, जाति, देश या काल के लिए नहीं है; यह संपूर्ण मानवता की अंतरात्मा का मुक्ति-गीत है। एक छोटा सा बालक यदि अपनी अदम्य श्रद्धा, निष्कपट जिज्ञासा और अडिग वैराग्य के बल पर साक्षात् मृत्यु को परास्त करके अमरता का अमृत पी सकता है, तो हम सब भी अपने भीतर के नचिकेता को जगा सकते हैं। हमारे भीतर भी वही यमराज (मृत्यु का सत्य) प्रतीक्षा कर रहा है, और हमारे भीतर भी वही अमर आत्मा विराजमान है। जब तक हम क्षुद्र सांसारिक प्रलोभनों को ठुकराकर उस परम सत्य की खोज नहीं करते, तब तक हमारी यात्रा अधूरी है। नचिकेता का यह मार्ग प्रत्येक मुमुक्षु के लिए सदा खुला हुआ है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **भीतर के नचिकेता को जगाएं**: सांसारिक प्रलोभनों, क्षणिक सुखों और भय के सम्मुख कभी समर्पण न करें; सत्य के प्रति नचिकेता जैसी समझौताहीन निष्ठा धारण करें। - **विद्या और योगविधि का समन्वय**: केवल दार्शनिक ज्ञान (विद्या) तक सीमित न रहें; उसके साथ इन्द्रिय-संयम और ध्यान की व्यावहारिक विधि (योगविधि) का भी पूर्ण अनुष्ठान करें। - **विरज और विमृत्यु बनने का संकल्प**: अपने जीवन से राग-द्वेष और अशुद्धियों को मिटाकर विरज बनें, और अपनी अमर आत्मा को पहचानकर मृत्यु के भय से सर्वथा मुक्त हो जाएं।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं आज नचिकेता के पदचिन्हों पर चलकर अपनी समस्त वासनाओं और भयों को त्यागने और उस परम ब्रह्म-पद को साक्षात् अनुभव करने के लिए संकल्पबद्ध हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

साक्षात्कार की सार्वभौमिकता (Universal Replicability of Spiritual Awakening): यह ज्ञान केवल नचिकेता के लिए नहीं है; जो भी साधक इस वैज्ञानिक योग-विधि और आत्म-विद्या का निष्ठापूर्वक पालन करेगा, वह भी निश्चित रूप से उसी परम मुक्ति को प्राप्त होगा।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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