श्री भगवानुवाचऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्
śhrī-bhagavān uvācha ūrdhva-mūlam adhaḥ-śhākham aśhvatthaṁ prāhur avyayam chhandānsi yasya parṇāni yas taṁ veda sa veda-vit
the Supreme Divine Personality said
with roots above
downward
branches
the sacred fig tree
they speak
eternal
Vedic mantras
of which
leaves
who
that
knows
he
the knower of the Vedas
अर्थMeaning
श्रीभगवान् बोले -- ऊपरकी ओर मूलवाले तथा नीचेकी ओर शाखावाले जिस संसाररूप अश्वत्थवृक्षको अव्यय कहते हैं और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसारवृक्षको जो जानता है, वह सम्पूर्ण वेदोंको जाननेवाला है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
The Lord said, "They speak of an immutable Asvattha tree with its roots above and branches below; its leaves are the Vedas. He who knows it knows the Vedas."
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पन्द्रहवाँ अध्याय, 'पुरुषोत्तमयोग', गीता के सबसे छोटे पर सबसे सारगर्भित अध्यायों में है। परम्परा में इसे भोजन से पहले पाठ करने की भी रीति है। यह एक अद्भुत चित्र से आरम्भ होता है: एक उलटा वृक्ष। 'ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्', ऊपर की ओर मूल और नीचे की ओर शाखाओंवाले जिस अश्वत्थ वृक्ष को अव्यय कहते हैं, 'छन्दांसि यस्य पर्णानि', वेद जिसके पत्ते हैं, 'यस्तं वेद स वेदवित्', उसे जो जानता है, वही वेदों को जाननेवाला है। कल्पना कीजिए एक ऐसे वृक्ष की जिसकी जड़ें आकाश में हैं और शाखाएँ धरती की ओर फैली हैं। यह संसार का चित्र है। इसका मूल ऊपर है, परमात्मा में; और इसकी शाखाएँ नीचे, संसार के अनगिनत रूपों में फैली हैं। हम शाखाओं पर रहते हैं, पत्तों और फलों में उलझे रहते हैं, और यह भूल जाते हैं कि इस वृक्ष की जड़ कहाँ है। 'अश्वत्थ', पीपल, इस नाम में एक सुन्दर अर्थ छिपा है। परम्परागत व्युत्पत्ति के अनुसार 'अश्वत्थ' का अर्थ है 'जो कल तक नहीं टिकेगा'। संसार प्रवाह रूप से अनादि है, इसलिए 'अव्यय' कहा गया; पर उसका हर रूप क्षण-क्षण बदलता है। और 'छन्दांसि पर्णानि', वेद इसके पत्ते हैं: जैसे पत्ते वृक्ष की रक्षा और शोभा करते हैं, वैसे ही वेद संसार की व्यवस्था बताते हैं। यह श्लोक आपको एक नई दृष्टि देता है। जब संसार की शाखाओं में उलझन हो, तो अपनी दृष्टि ऊपर, उसकी जड़ की ओर उठाइए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
जो कुछ दृश्य है — तुम्हारा करियर, संबंध, स्वास्थ्य, उपलब्धियाँ — ये शाखाएँ और पत्ते हैं। ये अदृश्य मूल से उगते हैं। मूल के साथ समय बिताओ: अपने मूल्य, अपना आंतरिक जीवन, स्रोत से अपना संबंध। गहरी जड़ों वाला वृक्ष किसी भी आँधी में टिक जाता है।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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