कठोपनिषद्

Vallī 2श्लोक 7/2528%

Katha Upanishad 2.7

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जिसके विषय में बहुत-से सुन भी नहीं पाते; जिसे सुनकर भी बहुत-से नहीं समझ पाते — उसका वक्ता आश्चर्यकर है, और कुशल है उसका प्राप्तकर्ता; आश्चर्य ही है उसका ज्ञाता, जिसे कुशल गुरु ने सिखाया।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He whom many cannot even hear of; whom, hearing, many do not understand — wonderful is the teacher of him; skillful the receiver; wonderful is the knower, taught by the skillful.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

आत्मा का आश्चर्य: जिसके विषय में बहुत-से लोग सुन भी नहीं पाते, और जिसे सुनकर भी बहुत-से लोग समझ नहीं पाते — उसका उपदेश देने वाला वक्ता आश्चर्यजनक है, और उस ज्ञान को प्राप्त करने वाला कुशल साधक भी अत्यंत दुर्लभ और आश्चर्यजनक है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
कठोपनिषद् का यह प्रसिद्ध श्लोक आत्म-विद्या की अत्यंत दुर्लभता और गरिमा को रेखांकित करता है: "श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः॥" — संसार में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें जीवनभर यह सुनने का अवसर भी नहीं मिलता कि वे केवल देह नहीं, साक्षात् अविनाशी ब्रह्म हैं। और जो सुन भी लेते हैं, उनमें से अधिकांश अपनी वासनाओं और चंचल मन के कारण इसे समझ नहीं पाते। अतः ऐसा ब्रह्मज्ञानी वक्ता जो इस सत्य को साक्षात् करा सके, वह भी एक आश्चर्य है; और ऐसा कुशल, एकाग्र शिष्य जो इसे हृदय में धारण कर सके, वह भी इस पृथ्वी पर परम आश्चर्य है! यह श्लोक हमें अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा के मूल्य का अहसास कराता है। यदि आपके मन में कभी यह प्रश्न उठता है कि "मैं कौन हूँ?", तो समझें कि आप पृथ्वी के सबसे भाग्यशाली और दुर्लभ व्यक्तियों में से हैं। अधिकांश मानवता केवल जैविक आवश्यकताओं और सामाजिक होड़ में ही जन्म से मृत्यु तक खप जाती है। आत्म-ज्ञान कोई साधारण विषय नहीं है; यह चेतना का वह शिखर है जहाँ वक्ता और श्रोता दोनों का असाधारण रूप से 'कुशल' (परिपक्व और एकाग्र) होना अनिवार्य है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **जिज्ञासा के मूल्य को पहचानें**: अपने भीतर उठने वाली आध्यात्मिक और दार्शनिक जिज्ञासा को क्षुद्र न समझें; इसे जीवन का सर्वोच्च वरदान मानकर इसका संवर्धन करें। - **कुशल श्रोता बनें (Deep Receptivity)**: जब भी किसी आत्मज्ञानी या उच्च कोटि के ग्रंथ का सान्निध्य मिले, तो अपने सारे पूर्वग्रहों, तर्कों और अहंकार को शांत करके पूर्ण एकाग्रता से सुनें। - **सतही प्रचारकों से सावधान**: आत्म-ज्ञान सस्ता मनोरंजन नहीं है; ऐसे सच्चे और 'आश्चर्यजनक' मार्गदर्शकों की खोज करें जो स्वयं इस सत्य को जी रहे हों।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“जब आत्म-ज्ञान का वक्ता और श्रोता दोनों इतने दुर्लभ हैं, तो क्या मैं इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए नचिकेता जैसी पात्रता और कुशलता विकसित कर रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

दुर्लभ अंतर्दृष्टि और संज्ञानात्मक जटिलता: आत्म-चेतना का साक्षात्कार मानवीय चेतना का उच्चतम और दुर्लभतम शिखर है, जहाँ वक्ता और श्रोता दोनों की अद्वितीय परिपक्वता आवश्यक होती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟡Philosophical Conceptदार्शनिक सूत्र

Concept: Samsara (संसार)

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Translation / Meaning (भावार्थ)

जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का अंतहीन चक्र, कर्म द्वारा चालित।

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