कठोपनिषद्

Vallī 2श्लोक 8/2532%

Katha Upanishad 2.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अवर (साधारण) पुरुष द्वारा कहा गया — चाहे अनेक प्रकार से चिन्तन किया जाये — यह सुगमता से ज्ञात नहीं होता। अनन्य (ब्रह्म से अभिन्न) के बिना कहा गया — कोई मार्ग नहीं — क्योंकि यह अणु से भी सूक्ष्म, तर्क से परे है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Taught by a lesser man, this is not well known, though pondered in many ways. Without one who is non-different (from Brahman) teaching, there is no way — for it is finer than the atom, beyond reasoning.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

साधारण पुरुष द्वारा उपदिष्ट होने पर यह आत्म-तत्त्व भली-भाँति नहीं समझा जा सकता, क्योंकि इसके विषय में अनेक प्रकार के परस्पर विरोधी तर्क किए जाते हैं। जब कोई अभिन्नदर्शी (जो आत्मा से अभिन्न है) गुरु इसका उपदेश देता है, तभी कोई संशय नहीं रहता; क्योंकि यह आत्मा सूक्ष्म से भी अत्यंत सूक्ष्म और तर्क से परे है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज ज्ञान के संचरण का एक अत्यंत मौलिक नियम बताते हैं: 'न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः' — किसी सामान्य या संसारी व्यक्ति द्वारा सिखाए जाने पर यह आत्म-तत्त्व कभी भी यथार्थ रूप में नहीं जाना जा सकता, क्योंकि लोग अपनी-अपनी सीमित बुद्धि से इसके बारे में नाना प्रकार की उलझी हुई कल्पनाएं करते रहते हैं। 'अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति' — किन्तु जब कोई ऐसा सिद्ध महापुरुष उपदेश देता है जो स्वयं उस अद्वैत सत्य से एकीकार हो चुका हो, तब साधक के मन में कोई संशय, कोई भटकाव शेष नहीं रहता; क्योंकि यह आत्मा परमाणुओं से भी अधिक सूक्ष्म है और तर्क की पकड़ में नहीं आती। आज इंटरनेट और पुस्तकों से पढ़कर लाखों लोग 'आध्यात्मिक गुरु' बन बैठे हैं। वे शब्दों की बाजीगरी तो दिखाते हैं किन्तु स्वयं उनके भीतर काम, क्रोध और अहंकार धधक रहा होता है। ऐसे लोगों का उपदेश साधक को और अधिक भ्रमित कर देता है। जिस प्रकार तैरना सीखने के लिए केवल किताब पढ़ना काफी नहीं है, तैराक का सान्निध्य चाहिए; उसी प्रकार आत्म-ज्ञान के लिए ऐसे गुरु की आवश्यकता होती है जिसके जीवन में आत्मा की शांति और स्वतंत्रता प्रत्यक्ष झलकती हो।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **मार्गदर्शक की प्रामाणिकता की परख**: किसी भी आध्यात्मिक शिक्षक के केवल वचनों या अनुयायियों की संख्या से प्रभावित न हों; देखें कि क्या उनके व्यक्तिगत आचरण में अनासक्ति, शांति और करुणा है। - **शुष्क तार्किकता से मुक्ति**: यह समझें कि केवल तर्कों और बहसों से आत्मा को नहीं जाना जा सकता; ध्यान और मौन के माध्यम से सूक्ष्मतर चेतना में उतरने का अभ्यास करें। - **अद्वैत दृष्टि का पोषण**: संसार में भेद और संघर्ष देखने के बजाय सभी प्राणियों में एक ही चेतना के विस्तार को देखने का अभ्यास करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं केवल किताबी और सैद्धांतिक वक्ताओं के शब्दों में उलझकर आध्यात्मिक भ्रम पाल रहा हूँ, अथवा मैं किसी प्रामाणिक, आत्मस्थ दृष्टिकोण की खोज में हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

प्रत्यक्ष अनुभव बनाम द्वितीयक व्याख्या: जब तक कोई शिक्षक स्वयं उस चेतना की अवस्था में स्थित न हो, तब तक उसका ज्ञान केवल सैद्धांतिक भ्रम और संशय ही उत्पन्न करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 10.12

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

परमं ब्रह्म परमं धाम पवित्रं परमं भवान्

Translation / Meaning (भावार्थ)

You are the Supreme Brahman, the supreme abode, the supreme purifier.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next