श्रीमद्भगवद्गीता

Bhakti Yogaश्लोक 10/2050%

Bhagavad Gita 12.10

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

अगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

If you are incapable of even this practice of repetition, then devote yourself to My deeds. For even by working for My sake, you will attain perfection.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

सीढ़ी का तीसरा डण्डा और भी सुगम है, और भगवान की करुणा यहाँ और भी कोमल हो जाती है। 'अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि', यदि तुम अभ्यास में भी असमर्थ हो, 'मत्कर्मपरमो भव', तो मेरे लिए कर्म करने के परायण हो जाओ; 'मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्', मेरे लिए कर्मों को करते हुए भी, 'सिद्धिमवाप्स्यसि', तुम सिद्धि को प्राप्त कर लोगे। कुछ लोगों के लिए नियमित ध्यान या जप का अभ्यास भी कठिन होता है। उनका जीवन कार्यों से भरा है, परिवार के दायित्व हैं, जीविका की चिन्ता है। उनके पास बैठकर ध्यान करने का समय या मन नहीं। भगवान उनके लिए भी द्वार बन्द नहीं करते। वे कहते हैं, जो कर रहे हो, वही मेरे लिए करो। 'मदर्थम्', मेरे लिए, यह एक शब्द साधारण कर्म को साधना बना देता है। भोजन बनाना, परिवार की सेवा करना, अपना कार्य निष्ठा से करना, किसी की सहायता करना, ये सब यदि भगवान के लिए किए जाएँ, तो पूजा बन जाते हैं। जैसे एक माला के मनके साधारण होते हैं, पर जब उन्हें भगवान के नाम से फेरा जाए, तो वे जप बन जाते हैं। 'अपि', भी, यह शब्द आश्वासन देता है: केवल इससे भी, किसी और साधन के बिना भी, सिद्धि मिल जाएगी। यह श्लोक आपके व्यस्त जीवन के लिए एक सुन्दर मार्ग है। आप जो भी कार्य करें, उसे आरम्भ करने से पहले मन में कहिए: 'यह आपके लिए है।' उसी क्षण वह कर्म भक्ति बन जाएगा।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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