संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः
sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ
all the senses
everywhere
equally disposed
achieve
unto Me
certainly
all living entities' welfare
engaged.
अर्थMeaning
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Having subdued all the senses, being even-minded, and engaged in the welfare of all beings, they too come to Me only.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
निराकार के उपासकों का वर्णन यहाँ पूरा होता है, और भगवान उन्हें एक बड़ा आश्वासन देते हैं। 'संनियम्येन्द्रियग्रामम्', जो इन्द्रियों के समूह को भली-भाँति वश में करके, 'सर्वत्र समबुद्धयः', सब जगह समान बुद्धि रखते हैं, 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव', वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं, 'सर्वभूतहिते रताः', जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं। 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव', वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं, यह वचन सारे विवाद को समाप्त कर देता है। साकार का भक्त और निराकार का उपासक, दोनों एक ही लक्ष्य तक पहुँचते हैं। मार्ग भिन्न हैं, गन्तव्य एक है। जैसे पर्वत के शिखर तक अनेक मार्ग जाते हैं: कोई सीढ़ियों से चढ़ता है, कोई कठिन चट्टानों से, पर सब एक ही शिखर पर पहुँचते हैं। पर इस श्लोक में भगवान निराकार के उपासक के दो लक्षण भी बताते हैं, और वे बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। पहला, 'समबुद्धयः', सब जगह समान दृष्टि। दूसरा, 'सर्वभूतहिते रताः', सब प्राणियों के हित में लगे रहना। ध्यान दीजिए, जो निराकार का ध्यान करता है, वह संसार से भागता नहीं; वह सबके कल्याण में लगा रहता है। सच्चा ज्ञान करुणा से रहित नहीं होता। जो सबमें एक ही ब्रह्म देखता है, वह किसी का अहित कैसे कर सकता है? यह श्लोक आपको सच्ची साधना की कसौटी देता है: आपकी साधना, चाहे जो भी हो, आपको दूसरों के प्रति अधिक करुणामय बनाती है या नहीं? यही उसकी सच्चाई का प्रमाण है।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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