सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः
santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥ mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ
contented
steadily
united in devotion
self-controlled
firm in conviction
to me
dedicated
mind
intellect
who
my devotees
they
to me
very dear
अर्थMeaning
सब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट,योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मेरेमें अर्पित मन-बुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
He who is content, who meditates ever, is self-restrained, and is firm in his convictions, and has his mind and reason dedicated to Me—he is dear to Me.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
प्रिय भक्त के लक्षणों का पहला भाग यहाँ पूरा होता है, और अन्त में भगवान का वह वचन आता है जो इन सब श्लोकों का स्वर बन जाता है। 'सन्तुष्टः सततं योगी', जो निरन्तर सन्तुष्ट है, योगी है, 'यतात्मा दृढनिश्चयः', संयत चित्तवाला और दृढ़ निश्चयवाला है, 'मय्यर्पितमनोबुद्धिः', जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, 'यो मद्भक्तः स मे प्रियः', ऐसा जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। 'स मे प्रियः', वह मुझे प्रिय है, ये तीन शब्द इस पूरे प्रकरण की आत्मा हैं। सोचिए, जिस भगवान का विराट रूप अभी अर्जुन ने देखा, जो सारे ब्रह्माण्ड को एक अंश में धारण करते हैं, वे कहते हैं कि अमुक व्यक्ति मुझे प्रिय है। यह कितना आत्मीय वचन है! भगवान केवल भक्त के प्रिय नहीं; भक्त भी भगवान का प्रिय है। प्रेम दोनों ओर से बहता है। इस श्लोक में 'सन्तुष्टः सततम्', निरन्तर सन्तुष्ट, एक बहुत सुन्दर लक्षण है। सन्तोष का अर्थ आलस्य या महत्त्वाकांक्षा का अभाव नहीं। इसका अर्थ है कि जो भी मिला, उसमें भगवान की कृपा देखना, और जो नहीं मिला, उसकी शिकायत न करना। जैसे एक बालक माता के हाथ से जो भी पाता है, उसी में प्रसन्न रहता है। और 'दृढनिश्चयः', दृढ़ निश्चयवाला, यह बताता है कि यह सन्तोष दुर्बलता नहीं, एक अटल आन्तरिक शक्ति है। यह श्लोक आपको भगवान का प्रिय बनने का मार्ग दिखाता है। उन लक्षणों में से कोई एक चुनिए और उसे आज के दिन जीने का प्रयत्न कीजिए।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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