यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः
yasmān nodvijate loko lokān nodvijate cha yaḥ harṣhāmarṣha-bhayodvegair mukto yaḥ sa cha me priyaḥ
by whom
not
are agitated
people
from people
not
are disturbed
and
who
pleasure
pain
fear
anxiety
freed
who
they
and
to me
very dear
अर्थMeaning
जिससे किसी प्राणीको उद्वेग नहीं होता और जिसको खुद भी किसी प्राणीसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेगसे रहित है, वह मुझे प्रिय है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
He from whom the world has no cause to be frightened, who is not frightened by the world, who is free from joy and impatience, fear, and aversion - he is dear to me.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
प्रिय भक्त का अगला लक्षण इतना सुन्दर है कि वह एक पूरे जीवन का आदर्श बन सकता है। 'यस्मान्नोद्विजते लोकः', जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता, 'लोकान्नोद्विजते च यः', और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता, 'हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः', जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेग से मुक्त है, 'स च मे प्रियः', वह मुझे प्रिय है। इस श्लोक की पहली पंक्ति में एक अद्भुत संतुलन है, जो दो दिशाओं में काम करता है। 'यस्मान्नोद्विजते लोकः', उससे किसी को कष्ट नहीं होता। उसकी वाणी किसी को चुभती नहीं, उसका व्यवहार किसी को भयभीत नहीं करता, उसकी उपस्थिति किसी को अशान्त नहीं करती। जैसे एक शीतल वृक्ष, जिसकी छाया में कोई भी आकर विश्राम कर सकता है। और 'लोकान्नोद्विजते च यः', वह स्वयं भी संसार से अशान्त नहीं होता। कोई उसे कटु वचन कहे, कोई उसके साथ अन्याय करे, कोई उसकी निन्दा करे, तब भी वह भीतर से शान्त रहता है। यह दोनों दिशाओं की शान्ति है: न किसी को अशान्त करना, न किसी से अशान्त होना। 'अमर्ष', दूसरों की उन्नति देखकर होनेवाली जलन, यह एक सूक्ष्म विकार है जिसका भगवान विशेष उल्लेख करते हैं। सच्चा भक्त दूसरों के सुख में प्रसन्न होता है, जलता नहीं। यह श्लोक आपको एक सरल पर गहरा अभ्यास देता है: आज दिन के अन्त में स्वयं से पूछिए, क्या मेरे कारण किसी को कष्ट हुआ? और क्या मैंने किसी के कारण अपनी शान्ति खोई?
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
तुम्हारी आंतरिक शांति एक सार्वजनिक सेवा है। जब तुम भय और उद्वेग से मुक्त होते हो, तुम हर उस व्यक्ति के लिए एक anchor (आधार) बन जाते हो जो तुम्हारे जीवन में आता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
भावनात्मक दशाएँ कभी-कभी सामाजिक संपर्क में एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुँच सकती हैं; पर प्रभाव व्यक्ति, सम्बन्ध और परिस्थिति के अनुसार बदलता है। 'यस्मान्नोद्विजते लोकः' का भाव इस बात से सीमित साम्य रखता है कि हमारा व्यवहार दूसरों के अनुभव को प्रभावित कर सकता है। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि एक शान्त व्यक्ति हर समूह को शान्त कर देगा, या श्लोक वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है। गीता यहाँ आचरण के नैतिक और भक्तिपरक आदर्श की बात करती है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.
- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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