कठोपनिषद्

Vallī 3श्लोक 12/1771%

Katha Upanishad 3.12

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

यह आत्मा सब प्राणियों में गूढ़ है — प्रकट नहीं होता। परन्तु अग्र्या (तीक्ष्ण) सूक्ष्म बुद्धि वाले सूक्ष्म-दर्शी इसे देखते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This Self is hidden in all beings — it does not shine forth. But it is seen by the keen, subtle intellect of those who see the subtle.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

आत्मा की गूढ़ता और दर्शन की विधि: यह आत्मा समस्त प्राणियों में छिपा हुआ है, अतः साधारण चर्म-चक्षुओं से प्रकट नहीं दिखता। किन्तु सूक्ष्म तत्त्वों को देखने वाले मनीषी साधकों द्वारा अपनी अत्यंत तीक्ष्ण, एकाग्र और सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा इसका साक्षात् दर्शन किया जाता है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज बताते हैं कि यदि आत्मा सर्वव्यापी और सर्वोच्च है, तो वह सबको आसानी से दिखाई क्यों नहीं देता: 'एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥' — यह आत्मा संसार के समस्त प्राणियों, कण-कण और प्रत्येक हृदय में अत्यंत गूढ़ रूप से छिपा हुआ है, इसलिए वह स्थूल दृष्टि से चमकता हुआ नहीं दिखता। जैसे दूध में घी और तिल में तेल छिपा रहता है, वैसे ही यह आत्मा देह के भीतर अव्यक्त है। इसे कौन देख पाता है? 'दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या' — केवल वे सूक्ष्मदर्शी साधक इसे देख पाते हैं जिनकी बुद्धि कुशाग्र (सुई की नोक की भाँति तीक्ष्ण), एकाग्र, शांत और वासना-मुक्त होकर अत्यंत सूक्ष्म हो चुकी है! स्थूल बुद्धि केवल स्थूल वस्तुओं — धन, मकान, शरीर और चेहरों — को देख सकती है। यदि आप एक कुंद और जंग लगी कुल्हाड़ी से सूक्ष्म सर्जरी करना चाहें, तो यह असंभव है। उसी प्रकार, यदि बुद्धि दिनभर संसार के क्षुद्र प्रपंचों, ईर्ष्या, गपशप और सोशल मीडिया के कचरे में कुंद हो चुकी है, तो वह आत्मा के परम सूक्ष्म सत्य को कभी नहीं पकड़ सकती। बुद्धि को सूक्ष्म बनाने का अर्थ है उसे वासनाओं से मुक्त करके ध्यान और विवेक की सान पर इतना तीक्ष्ण करना कि वह जड़ और चेतन के अंतर को एक ही क्षण में चीर कर रख दे।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **बुद्धि को तीक्ष्ण बनाना (Agrya Buddhi)**: अपनी बुद्धि को व्यर्थ की सतही चर्चाओं और विवादों में कुंद न होने दें; गंभीर दर्शन, गणित और स्वाध्याय से अपनी बौद्धिक तीक्ष्णता बढ़ाएं। - **सूक्ष्म अवलोकन का अभ्यास**: केवल बाह्य आकृतियों को न देखें; घटनाओं और व्यक्तियों के पीछे छिपे गहरे मनोभावों और ऊर्जाओं को पढ़ने का सूक्ष्म दृष्टि-कोण विकसित करें। - **मौन और ध्यान द्वारा निर्मलता**: प्रतिदिन ध्यान के माध्यम से बुद्धि के सारे विक्षेपों को शांत करें ताकि वह आत्मा के सूक्ष्म प्रकाश को ग्रहण कर सके।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरी बुद्धि संसार के उथले मनोरंजन में कुंद हो चुकी है, अथवा मैंने उसे इतना सूक्ष्म और एकाग्र बनाया है कि वह अपने भीतर छिपी परमात्मा की सत्ता को पहचान सके?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

सूक्ष्म अवधान और न्यूरो-फोकस: जब मस्तिष्क का अवधान (attention) अत्यंत एकाग्र, सूक्ष्म और स्थिर होता है, तभी वह चेतना की अंतर्निहित पृष्ठभूमि को पकड़ने में सक्षम होता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 2.20

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

Translation / Meaning (भावार्थ)

The Self is never born and never dies. Unborn, eternal, ever-existing, it is not destroyed when the body is destroyed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next