कठोपनिषद्

Vallī 3श्लोक 14/1782%

Katha Upanishad 3.14

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

उठो! जागो! श्रेष्ठ गुरुओं को प्राप्त करके सीखो! "तीक्ष्ण किये गये उस्तरे की धार के समान दुरत्यय" — दुर्गम है मार्ग — ऐसा ज्ञानी कहते हैं।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Arise! Awake! Having reached the wise ones, learn! The sharpened edge of a razor — hard to cross — difficult is the path, say the wise.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

अमर शंखनाद: उठो! जागो! और श्रेष्ठ महापुरुषों के सान्निध्य में जाकर उस सत्य को भली-भाँति सीखो! तत्त्ववेत्ता ज्ञानी कहते हैं कि वह आत्म-ज्ञान का मार्ग तीक्ष्ण किए हुए उस्तरे की धार के समान अत्यंत दुर्गम और कठिन है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य जाग्रत अवस्था में भी एक प्रकार की संज्ञानात्मक निद्रा (Cognitive Somnambulism) में जीवन काट रहा है। लोग अनजाने में आदतों, स्वचालित प्रतिक्रियाओं, सामाजिक दबावों और डिजिटल स्क्रीनों के सम्मोहन में एक रोबोट की भाँति दिन-प्रतिदिन व्यतीत कर देते हैं। वे जीवन के गंभीरतम प्रश्नों — "मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है? मेरे कर्मों का अंतिम प्रयोजन क्या है?" — को सतत टालते रहते हैं और जब तक विवेक जागता है, तब तक बहुमूल्य समय हाथ से निकल चुका होता है। यमराज का यह अमर उद्घोष — "उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत" — मनुष्य की चेतना को झकझोरने वाला शाश्वत शंखनाद है: "उठो! अपनी इस आलसी मोह-निद्रा से जागो, और श्रेष्ठ तत्त्ववेत्ता पुरुषों के सान्निध्य में जाकर उस परम सत्य का साक्षात्कार करो!" साथ ही वे यह गंभीर चेतावनी भी देते हैं कि आत्म-ज्ञान का यह मार्ग "क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया" — उस्तरे की तीक्ष्ण धार पर चलने के समान अत्यंत सूक्ष्म और दुर्गम है। यहाँ न तो असावधानी की छूट है और न ही उथले मनोरंजन की; इस मार्ग पर पग-पग पर सूक्ष्म आत्म-निरीक्षण और अविचल सजगता की आवश्यकता होती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संज्ञानात्मक तंद्रा का भंजन**: अपनी दैनिक दिनचर्या में से "ऑटोपायलट" मोड को तोड़ें; दिन में 3-4 बार कुछ क्षणों के लिए रुककर अपनी वर्तमान श्वास, शारीरिक संवेदनाओं और विचारों के प्रति पूर्ण रूप से सचेत हों। - **श्रेष्ठ संगति एवं गंभीर स्वाध्याय (वरान्निबोधत)**: सतही इंटरनेट चर्चाओं, विवादों और रील-संस्कृति के स्थान पर ऐसे प्रबुद्ध विचारकों, शिक्षकों और कालजयी ग्रंथों का नियमित सान्निध्य लें जो आपकी बुद्धि को तीक्ष्ण और परिष्कृत कर सकें। - **उस्तरे की धार जैसा सूक्ष्म विवेक**: सुविधा (Convenience) और सत्य (Truth) के द्वंद्व में जब भी चुनाव करना पड़े, तो उस्तरे की धार पर चलने का साहस दिखाते हुए तात्कालिक आराम के स्थान पर धर्म और सत्य का ही वरण करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपने जीवन के अमूल्य क्षणों को आदतों, सामाजिक अपेक्षाओं और डिजिटल सम्मोहन की गहरी तंद्रा में गँवा रहा हूँ, अथवा मैं अपने अंतर्मन को जाग्रत करके सत्य के इस तीक्ष्ण और दुर्गम मार्ग पर सचेत कदम बढ़ा रहा हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

संज्ञानात्मक तंद्रा का भंजन और चरम एकाग्रता: स्वामी विवेकानंद द्वारा विश्वभर में गूंजाया गया यह उद्घोष मानवीय चेतना को उसकी सुप्त अवस्था से जाग्रत कर उस्तरे की धार जैसी सूक्ष्म सतर्कता की मांग करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 3.35

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्

Translation / Meaning (भावार्थ)

Better is one's own dharma though imperfectly performed than the dharma of another well performed.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next