कठोपनिषद्

Vallī 3श्लोक 15/1788%

Katha Upanishad 3.15

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय, अरस, नित्य, अगन्ध है; अनादि, अनन्त, महान् से परे, ध्रुव — उसको जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Soundless, touchless, formless, undecaying, tasteless, eternal, scentless; without beginning or end, higher than the Great, fixed — knowing this, one is released from the mouth of Death.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

मृत्यु के मुख से मुक्ति: जो अशब्द (शब्द-रहित), अस्पर्श, अरूप, अव्यय (अविनाशी), अरस (स्वाद-रहित), नित्य, अगंध (गंध-रहित), अनादि (आरंभ-रहित), अनंत, महत्तत्त्व से भी परे और सदा अचल-ध्रुव है — उस आत्म-तत्त्व को भली-भाँति जानकर मनुष्य मृत्यु के भयानक मुख (जबड़ों) से सदा के लिए छूट जाता है!

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज उस परम तत्त्व का निषेधात्मक (via negativa / नेति-नेति) परिभाषा के माध्यम से साक्षात् कराते हैं: 'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते॥' — जो कानों से नहीं सुना जा सकता (अशब्द), जो त्वचा से नहीं छुआ जा सकता (अस्पर्श), जो आँखों से नहीं देखा जा सकता (अरूप), जो जीभ से नहीं चखा जा सकता (अरस), जो नासिका से नहीं सूंघा जा सकता (अगन्ध); जो कभी क्षीण नहीं होता (अव्यय), जो अनादि और अनंत है, और जो समष्टि बुद्धि से भी परे सदा अचल है — उस तत्त्व को जब मनुष्य अपनी आत्मा जान लेता है, तो वह काल और मृत्यु के भयानक जबड़ों से सदा के लिए मुक्त हो जाता है! मृत्यु केवल उन्हीं चीजों को खा सकती है जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध से बनी हैं — अर्थात् यह भौतिक देह और मन। जो वस्तु पाँच तत्वों से बनी है, वह पाँच तत्वों में बिखर जाएगी। किन्तु उपनिषद् कहता है कि तुम वह पंचमहाभूत नहीं हो; तुम वह अशरीरी, अगोचर चेतना हो जिसे अग्नि जला नहीं सकती, जल सुखा नहीं सकता और मृत्यु छू भी नहीं सकती। जब आप अपने इस निर्लेप स्वरूप को पहचान लेते हैं, तो मृत्यु आपके लिए एक डरावना अंत नहीं रहती, बल्कि वह केवल एक पुराने वस्त्र का उतर जाना बन जाती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संवेदी सीमाओं का अतिक्रमण**: जब आँख, कान और त्वचा की संवेदनाएं शांत हों, तो उस गहरे मौन में उतरें जो इन सभी संवेदनाओं को प्रकाशित कर रहा है। - **अविनाशी केंद्र का स्मरण**: शारीरिक बीमारियों, दुर्बलता या उम्र बढ़ने के समय स्वयं को याद दिलाएं — "मेरा शरीर बदल रहा है किन्तु मेरा अशब्द, अरूप आत्म-तत्त्व सदा नित्य और ध्रुव है।" - **मृत्यु-भय से मुक्ति**: मृत्यु के विचार को एक प्राकृतिक रूपांतरण की तरह देखें; अपनी चेतना को अविनाशी परमात्मा के साथ जोड़कर अभय बनें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं केवल उन्हीं पाँच संवेदी विषयों (रूप, रस, गंध आदि) में अपनी पहचान खोज रहा हूँ जिन्हें मृत्यु एक दिन निगल जाएगी, अथवा मैंने अपने अशब्द और अनादि आत्म-तत्त्व को पहचाना है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

इन्द्रिय-संवेदनाओं से परे का आधार: सभी पांचों ज्ञानेन्द्रियों के विषयों (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) से सर्वथा परे जो अपरिवर्तनीय साक्षी चेतना है, उसका साक्षात्कार मृत्यु-भय को समाप्त करता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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🟣Cross-Scriptural Linkपार-ग्रंथ सम्बन्ध (गीता ↔ उपनिषद् ↔ रामायण)

Bhagavad Gita 2.51

Bhagavad Gita (श्रीमद्भगवद्गीता)

Sanskrit Text (मूल श्लोक / मंत्र)

कर्मजं बन्धनमहेतुकं देहं विन्दति यः

Translation / Meaning (भावार्थ)

By being free from attachment, the wise attain the supreme state, free from bondage.

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next