श्रीमद्भगवद्गीता

Akshara Brahma Yogaश्लोक 7/2825%

Bhagavad Gita 8.7

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

इसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

Therefore, think of Me at all times and fight; there is no doubt that by dedicating your mind and intellect to Me, you will attain only Me.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

जब अन्तिम क्षण का भाव जीवन भर के भाव से बनता है, तो उपाय भी स्पष्ट है। 'तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च', इसलिए सब समय में मेरा स्मरण करो और युद्ध भी करो। 'मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्', मुझमें मन और बुद्धि अर्पित करके तुम निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगे। इस श्लोक के दो छोटे शब्द, 'युध्य च', गीता के सम्पूर्ण संदेश को समेट लेते हैं। भगवान यह नहीं कहते कि सब छोड़कर वन में जाओ और केवल स्मरण करो। वे कहते हैं, स्मरण भी करो और अपना कर्तव्य भी निभाओ। अर्जुन के लिए कर्तव्य युद्ध था; आपके लिए वह परिवार का पालन, कार्यालय का काम, या किसी की सेवा हो सकता है। स्मरण और कर्म दो अलग-अलग कार्य नहीं, एक ही जीवन की दो धाराएँ हैं। 'सर्वेषु कालेषु', सब समय में, यह कठिन लगता है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हर क्षण जप चलता रहे। जैसे माता काम करते हुए भी अपने सोते शिशु का ध्यान रखती है, वैसे ही मन की गहराई में एक धागा भगवान से जुड़ा रहे। 'अर्पित' शब्द बताता है कि यह बलपूर्वक नहीं, समर्पण से होता है: मन और बुद्धि उन्हें सौंप दीजिए, फिर काम अपने-आप पूजा बन जाता है। आज अपने किसी एक साधारण कार्य को इस भाव से करके देखिए।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
भगवद्गीता के समग्र दर्शन का यह व्यावहारिक सूत्र है जहाँ कर्म और ध्यान का पूर्ण समन्वय होता है: "तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥" इसलिए तुम सब समय में मेरा निरंतर स्मरण करो और युद्ध भी करो! मुझमें अर्पित मन और बुद्धि वाला होकर तुम निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होओगे। आधुनिक मल्टीटास्किंग और बर्नआउट के दौर में लोग सोचते हैं कि कार्य और आध्यात्मिकता दो परस्पर विरोधी दिशाएं हैं—या तो व्यक्ति ऑफिस में काम कर सकता है या बैठकर ध्यान कर सकता है। श्रीकृष्ण इस विभाजन को पूरी तरह तोड़ देते हैं। 'मामनुस्मर युध्य च' का अर्थ है: आंतरिक रूप से परमात्मा से जुड़े रहो और बाह्य रूप से अपने जीवन का युद्ध पूरी कुशलता से लड़ो। एक कुशल सर्जन सर्जरी करते समय अपनी एकाग्रता के केंद्र में स्थिर रहता है और हाथों से जटिल ऑपरेशन करता है। एक पायलट प्लेन उड़ाते समय आकाश में रहता है किंतु अपने रडार और नियंत्रणों से बंधा रहता है। इसी प्रकार, जब आपका मन उच्चतर सत्य में स्थिर होता है, तो आपके सांसारिक कर्मों में कोई तनाव या भय नहीं रहता; आपके कर्म स्वाभाविक रूप से निर्दोष और उत्कृष्ट बन जाते हैं।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **कर्म के मध्य आंतरिक मौन (Integrated Contemplative Action)**: किसी भी कठिन प्रोजेक्ट, कोडिंग या मीटिंग के दौरान अपने भीतर एक शांत साक्षी केंद्र बनाए रखें; काम पूरे वेग से करें किंतु भीतर से अछूते रहें। - **मन और बुद्धि का समर्पण (Intellectual Consecration)**: अपने निर्णयों को केवल व्यक्तिगत लाभ के आधार पर न लें; अपनी बुद्धि को यह निर्देश दें कि मेरा प्रत्येक निर्णय सत्य, धर्म और लोक-कल्याण के अनुकूल होगा। - **संघर्ष से पलायन न करना (Embracing the Necessary Battle)**: जीवन की चुनौतियों और प्रतिस्पर्धाओं से डरकर पीछे न हटें; जब युद्ध अपरिहार्य हो, तो पूरे पराक्रम से लड़ें किंतु हृदय में द्वेष या अहंकार न रखें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप कर्म करते समय अपनी आंतरिक शांति खो देते हैं, अथवा संसार के भीषण संग्राम के मध्य भी अपने अंतरतम में परमात्मा का निरंतर स्मरण बनाए रखने में समर्थ हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

Dual-task automaticity research (Shiffrin & Schneider, 1977): गहन अभ्यास से दो कार्य एक साथ automatic हो जाते हैं। प्रशिक्षित शल्य-चिकित्सक, खिलाड़ी और संगीतकार संकट में भी शांति से perform करते हैं क्योंकि उनकी skill और awareness साथ-साथ सक्रिय रहती है — यही "युद्ध करते हुए स्मरण" है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next