पिताऽहमस्य जगतो माता धाता पितामहः।वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च
pitāham asya jagato mātā dhātā pitāmahaḥ vedyaṁ pavitram oṁkāra ṛik sāma yajur eva cha
Father
I
of this
universe
Mother
Sustainer
Grandsire
the goal of knowledge
the purifier
the sacred syllable Om
the Rig Veda
the Sama Veda
the Yajur Veda
also
and
अर्थMeaning
(श्लोक 16–18) क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जाननेयोग्य पवित्र, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत् का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्पत्ति, प्रलय, स्थान, निधान तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
I am the father, mother, creator, and grandfather of the universe; I am the purifier. I am the syllable Om, as well as Rk, Saman, and Yajus.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यज्ञ के अंगों से आगे बढ़कर अब भगवान उन सम्बन्धों की बात करते हैं जो मनुष्य के हृदय के सबसे निकट हैं। 'पिताऽहमस्य जगतः', इस जगत् का पिता मैं हूँ, 'माता', माता मैं हूँ, 'धाता', धारण करनेवाला मैं हूँ, 'पितामहः', पितामह मैं हूँ; 'वेद्यं पवित्रम्', जानने योग्य और पवित्र करनेवाला मैं हूँ, 'ओंकारः', ओंकार मैं हूँ, 'ऋक् साम यजुरेव च', और ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस श्लोक का पहला भाग किसी भी हृदय को द्रवित कर देता है। भगवान स्वयं को पिता भी कहते हैं और माता भी। पिता की रक्षा और माता की ममता, दोनों एक ही में। और फिर 'पितामह', दादा, जिनका स्नेह सबसे निःस्वार्थ और सबसे धैर्यवान होता है। जो सृष्टि का कारण हैं, वे स्वयं को परिवार के इन सबसे प्रिय सम्बन्धों में प्रकट करते हैं, ताकि मनुष्य उन्हें दूर का कोई शासक नहीं, अपना आत्मीय अनुभव करे। फिर श्लोक ज्ञान की ओर मुड़ता है: ओंकार और तीनों वेद भी वही हैं। अर्थात् जो प्रेम में मिलता है, वही ज्ञान में भी मिलता है। माता की गोद और वेद का मन्त्र, दोनों एक ही की ओर ले जाते हैं। यह श्लोक आपके लिए एक कोमल निमंत्रण है: जब आप अकेले अनुभव करें, किसी सम्बन्ध के अभाव से दुखी हों, तब स्मरण कीजिए कि जो जगत् की माता और पिता हैं, वे आपके भी हैं। आप कभी अनाथ नहीं हैं।
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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