श्रीमद्भगवद्गीता

Raja Vidya Yogaश्लोक 4/3412%

Bhagavad Gita 9.4

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

(श्लोक 4–5) यह सब संसार मेरे निराकार स्वरूपसे व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मेरेमें स्थित हैं; परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं -- मेरे इस ईश्वर-सम्बन्धी योग-(सामर्थ्य-) को देख ! सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाला और उनका धारण, भरण-पोषण करनेवाला मेरा स्वरूप उन प्राणियोंमें स्थित नहीं है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

This entire universe is pervaded by Me, in an unmanifest form. All beings abide in Me, but I do not abide in them.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

अब भगवान उस रहस्य को खोलना आरम्भ करते हैं, और पहला ही वचन बुद्धि को विस्मय में डाल देता है। 'मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना', यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है। 'मत्स्थानि सर्वभूतानि', सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, 'न चाहं तेष्ववस्थितः', परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। 'अव्यक्तमूर्ति', अव्यक्त मूर्ति, यह शब्द अपने-आप में एक विरोधाभास है। मूर्ति का अर्थ है रूप, और अव्यक्त का अर्थ है जो दिखाई न दे। भगवान का वह स्वरूप जो सब ओर फैला है, आँखों से नहीं दिखता, पर सब कुछ उसी से भरा है, जैसे दूध में मक्खन, जो दिखाई नहीं देता पर उसके हर कण में व्याप्त है। फिर वह वचन आता है जो सबसे गहरा है: सब प्राणी मुझमें हैं, पर मैं उनमें नहीं हूँ। इसका अर्थ है कि भगवान सबके आधार हैं, पर किसी पर आश्रित नहीं। जैसे सारे पात्र धरती पर टिके हैं, पर धरती किसी पात्र में नहीं समाती। प्राणी उन पर निर्भर हैं, वे प्राणियों पर नहीं। यह श्लोक आपके भीतर एक नई दृष्टि जगाता है। आज जब आप चलें, साँस लें, किसी से मिलें, तो यह अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए कि आप उस अव्यक्त सत्ता के भीतर ही चल रहे हैं, जैसे मछली जल के भीतर।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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