किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्
kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām
what
then
sages
meritorius
devotees
saintly kings
and
transient
joyless
world
this
having achieved
engage in devotion
unto me
अर्थMeaning
जो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान् के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
How much more then, for the pure Brahmanas and royal sages who are My devotees! Having obtained this transient and joyless world, they should worship Me.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पिछले श्लोक की उदारता के बाद भगवान एक तर्क से बात को पूरा करते हैं, और फिर अर्जुन को सीधा आदेश देते हैं। 'किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा', फिर पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और भक्त राजर्षियों का तो कहना ही क्या! 'अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य', इस अनित्य और सुखरहित लोक को प्राप्त करके, 'भजस्व माम्', तुम मेरा भजन करो। पहली पंक्ति का भाव यह है: जब शरण लेनेवाले सब परमगति पाते हैं, तो जिनका आचरण पहले से पवित्र है, उनके लिए तो मार्ग और भी सहज है। और अर्जुन स्वयं राजर्षियों के वंश में है। भगवान मानो कह रहे हैं, तुम्हारे पास तो सब कुछ है, फिर विलम्ब क्यों? दूसरी पंक्ति इस श्लोक का हृदय है, और उसमें दो शब्द बहुत गम्भीर हैं: 'अनित्यम्' और 'असुखम्'। यह संसार टिकता नहीं, और इसमें स्थायी सुख नहीं। यह निराशा का वचन नहीं, जागरण का वचन है। जिस लोक में कुछ भी स्थायी नहीं, उसमें समय भी सीमित है। यह मनुष्य जीवन एक अवसर है, और अवसर सदा प्रतीक्षा नहीं करता। 'प्राप्य', प्राप्त करके, यह शब्द बताता है कि यह जन्म एक उपलब्धि है, जिसे व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। यह श्लोक आपसे कहता है: भजन को किसी आनेवाले कल के लिए मत टालिए। आज, इसी क्षण, जो जीवन मिला है, उसी में भगवान की ओर मुड़िए।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-23
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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