अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
always
think of
me
those who
persons
worship exclusively
of them
who are always absorbed
supply spiritual assets
protect spiritual assets
carry
I
अर्थMeaning
जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Those who, excluding all else, think of Me and worship Me, aspiring after eternal union with Me, I look after their prosperity and welfare (Yoga and Ksema).
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
स्वर्ग के आने-जाने वाले सुख के ठीक बाद भगवान वह वचन कहते हैं जो गीता के सबसे प्रिय और सबसे आश्वासनपूर्ण वचनों में गिना जाता है। 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते', जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी भली-भाँति उपासना करते हैं, 'तेषां नित्याभियुक्तानाम्', उन नित्य मुझसे जुड़े हुए भक्तों का, 'योगक्षेमं वहाम्यहम्', योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ। 'योगक्षेम' शब्द को समझना आवश्यक है। 'योग' का अर्थ है जो प्राप्त नहीं है, उसकी प्राप्ति; और 'क्षेम' का अर्थ है जो प्राप्त है, उसकी रक्षा। मनुष्य का पूरा जीवन इन्हीं दो चिन्ताओं में बीतता है: जो नहीं है, वह कैसे मिले, और जो है, वह कहीं खो न जाए। भगवान कहते हैं, ये दोनों चिन्ताएँ मुझ पर छोड़ दो। और 'वहामि', मैं वहन करता हूँ, यह शब्द सबसे कोमल है। भगवान यह नहीं कहते कि मैं दे दूँगा; वे कहते हैं, मैं ढोऊँगा, उठाकर लाऊँगा, जैसे कोई पिता अपने बालक का बोझ स्वयं अपने कन्धों पर उठा ले। परम्परा में एक कथा प्रसिद्ध है कि एक भक्त ने इस श्लोक पर संदेह किया, और भगवान स्वयं उसके घर अन्न का भार उठाकर पहुँचे। इस श्लोक को पढ़कर निश्चिन्त होइए, निष्क्रिय नहीं। अपना कर्तव्य पूरे मन से कीजिए, पर उसके परिणाम की चिन्ता उस पर छोड़ दीजिए जिसने उसे वहन करने का वचन दिया है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
विश्वास दैवी व्यवस्था (providence) को खोलता है। जब तुम्हारी ऊर्जा चिंता में खर्च होना बंद हो जाती है, तो वह बुद्धिमान कर्म के लिए उपलब्ध हो जाती है — और बुद्धिमान कर्म स्वाभाविक रूप से सही समय पर सही संसाधन आकर्षित करता है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
अनेक अध्ययनों में यह देखा गया है कि नियमित आस्था और आध्यात्मिक जीवन का सम्बन्ध प्रायः अच्छे मानसिक स्वास्थ्य, अधिक आशा और संकट में अधिक दृढ़ता से होता है। पर ये अध्ययन अधिकतर सहसम्बन्ध दिखाते हैं, कारण नहीं; और इनमें सामाजिक सहारे जैसे अन्य कारणों की भी भूमिका होती है। 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' का आश्वासन इससे गहरा है: वह भगवान पर विश्वास की बात करता है, स्वास्थ्य-लाभ की नहीं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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