श्रीमद्भगवद्गीता

Jnana Karma Sanyasa Yogaश्लोक 8/4219%

Bhagavad Gita 4.8

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

For the protection of the good and the destruction of the wicked, for the establishment of Dharma, I am born from age to age.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

पिछले श्लोक में भगवान ने बताया कि वे कब आते हैं; यहाँ वे बताते हैं कि वे क्यों आते हैं, और उनके तीन उद्देश्य संसार के प्रति उनकी पूरी करुणा को प्रकट करते हैं। 'परित्राणाय साधूनाम्', सज्जनों की रक्षा के लिए; 'विनाशाय च दुष्कृताम्', दुष्कर्मियों के विनाश के लिए; 'धर्मसंस्थापनार्थाय', और धर्म की भलीभाँति स्थापना के लिए; 'संभवामि युगे युगे', मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। इस क्रम पर ध्यान दीजिए: पहला उद्देश्य रक्षा है, विनाश दूसरा। भगवान का हृदय पहले उन लोगों की ओर जाता है जो धर्म के मार्ग पर चलते हुए पीड़ा सह रहे हैं। 'दुष्कृताम्' का विनाश भी, परम्परा के अनुसार, केवल व्यक्तियों का संहार नहीं, उस दुष्टता का अंत है जो संसार को कष्ट दे रही है। और अंतिम उद्देश्य सबसे व्यापक है: धर्म की ऐसी स्थापना कि समाज फिर से संतुलन में लौट आए। 'युगे युगे', युग-युग में, यह शब्द एक अनंत आश्वासन है। हर युग की अपनी चुनौतियाँ हैं, अपना अंधकार है, और हर युग में ईश्वर का प्रकाश किसी न किसी रूप में उतरता है। यह श्लोक हमें निष्क्रिय प्रतीक्षा के लिए नहीं कहता। यह हमें आमंत्रित करता है कि हम भी अपने छोटे-से जीवन में साधुता की रक्षा करें, अन्याय का विरोध करें, और धर्म को जिएँ। तब हम भी उस दिव्य कार्य के छोटे-छोटे सहभागी बन जाते हैं।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
अवतार के त्रिविध उद्देश्य पर श्रीकृष्ण का यह वचन नेतृत्व और सामाजिक दायित्व का सर्वोच्च घोषणापत्र है: "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥" साधु पुरुषों (सज्जनों) की रक्षा के लिए, दुष्ट कर्म करने वालों के विनाश के लिए, और धर्म की भली-भांति स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। आधुनिक संगठनात्मक नेतृत्व (Organizational Leadership) और राज्यशास्त्र में यह सिद्धांत स्थापित करता है कि किसी भी नेतृत्व की वैधता केवल इस बात में है कि वह अपने तंत्र में सदाचारियों और रचनात्मक लोगों को कितना संरक्षण देता है और विषाक्त (Toxic) तत्वों को कितनी दृढ़ता से निष्कासित करता है। अधिकांश व्यवस्थाएं इसलिए ढह जाती हैं क्योंकि नेता अच्छे लोगों का शोषण होने देते हैं और विघटनकारी तत्वों के प्रति उदासीन बने रहते हैं। श्रीकृष्ण का यह आदेश स्पष्ट करता है कि करुणा का अर्थ बुराई के प्रति कायरतापूर्ण सहिष्णुता नहीं है। धर्म की स्थापना केवल उपदेश देने से नहीं होती; उसके लिए सज्जनता को सशक्त बनाना और अधर्म की शक्तियों का सक्रिय उन्मूलन करना अनिवार्य है। जब कोई प्रबुद्ध व्यक्ति सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अडिग खड़ा होता है, तो वह वास्तव में ईश्वरीय कार्य का ही माध्यम बनता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सज्जनता का सक्रिय संरक्षण (Protecting the Vulnerable)**: अपने कार्यस्थल या समाज में उन ईमानदार, मेहनती और सीधे लोगों की ढाल बनें जिनका चालाक लोग लाभ उठाने का प्रयास करते हैं। - **विषाक्त आचरण के प्रति शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance for Injustice)**: किसी भी संस्था या परिवार में शोषण, अन्याय या बेईमानी को केवल इसलिए न सहें कि 'मुझे क्या लेना-देना'; अन्याय का विरोध करना आपका नैतिक कर्तव्य है। - **सांस्कृतिक और नैतिक पुनरुत्थान (Systemic Moral Stewardship)**: केवल अपने व्यक्तिगत लाभ तक सीमित न रहें; एक ऐसा वातावरण निर्मित करने में योगदान दें जहाँ सच्चाई और निष्ठा स्वाभाविक रूप से फले-फूले।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या आप अपने आस-पास होने वाले अन्याय और दुर्व्यवहार को देखकर मूक दर्शक बने रहते हैं, अथवा सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का साहस रखते हैं?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

Systems Theory में इसे Negative Feedback Loop कहते हैं — जब किसी तंत्र में विकार बढ़ता है, स्वतः सुधारात्मक शक्तियाँ उभरती हैं। जैव-विकास (Evolution) में भी: जब पारिस्थितिकी असंतुलित होती है, नई प्रजातियाँ और शक्तियाँ उभरकर संतुलन बहाल करती हैं।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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श्लोक सम्बन्ध एवं पार-ग्रंथ संदर्भ

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Bhagavad Gita 4.8Current VerseConcept:Dharma
🟡Philosophical Conceptदार्शनिक सूत्र

Concept: Dharma (धर्म)

Bhagavad Gita

Translation / Meaning (भावार्थ)

सृष्टि का नियम, धर्म और जीवन का पवित्र कर्तव्य।

Why This is Connected (सम्बन्ध का आधार)

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आगे क्या · What next