परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे
paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśhāya cha duṣhkṛitām dharma-sansthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge
to protect
the righteous
to annihilate
and
the wicked
the eternal religion
to reestablish
I appear
age after age
अर्थMeaning
साधुओं-(भक्तों-) की रक्षा करनेके लिये, पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
For the protection of the good and the destruction of the wicked, for the establishment of Dharma, I am born from age to age.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
पिछले श्लोक में भगवान ने बताया कि वे कब आते हैं; यहाँ वे बताते हैं कि वे क्यों आते हैं, और उनके तीन उद्देश्य संसार के प्रति उनकी पूरी करुणा को प्रकट करते हैं। 'परित्राणाय साधूनाम्', सज्जनों की रक्षा के लिए; 'विनाशाय च दुष्कृताम्', दुष्कर्मियों के विनाश के लिए; 'धर्मसंस्थापनार्थाय', और धर्म की भलीभाँति स्थापना के लिए; 'संभवामि युगे युगे', मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ। इस क्रम पर ध्यान दीजिए: पहला उद्देश्य रक्षा है, विनाश दूसरा। भगवान का हृदय पहले उन लोगों की ओर जाता है जो धर्म के मार्ग पर चलते हुए पीड़ा सह रहे हैं। 'दुष्कृताम्' का विनाश भी, परम्परा के अनुसार, केवल व्यक्तियों का संहार नहीं, उस दुष्टता का अंत है जो संसार को कष्ट दे रही है। और अंतिम उद्देश्य सबसे व्यापक है: धर्म की ऐसी स्थापना कि समाज फिर से संतुलन में लौट आए। 'युगे युगे', युग-युग में, यह शब्द एक अनंत आश्वासन है। हर युग की अपनी चुनौतियाँ हैं, अपना अंधकार है, और हर युग में ईश्वर का प्रकाश किसी न किसी रूप में उतरता है। यह श्लोक हमें निष्क्रिय प्रतीक्षा के लिए नहीं कहता। यह हमें आमंत्रित करता है कि हम भी अपने छोटे-से जीवन में साधुता की रक्षा करें, अन्याय का विरोध करें, और धर्म को जिएँ। तब हम भी उस दिव्य कार्य के छोटे-छोटे सहभागी बन जाते हैं।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
“क्या आप अपने आस-पास होने वाले अन्याय और दुर्व्यवहार को देखकर मूक दर्शक बने रहते हैं, अथवा सज्जनों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए सक्रिय भूमिका निभाने का साहस रखते हैं?”
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
Systems Theory में इसे Negative Feedback Loop कहते हैं — जब किसी तंत्र में विकार बढ़ता है, स्वतः सुधारात्मक शक्तियाँ उभरती हैं। जैव-विकास (Evolution) में भी: जब पारिस्थितिकी असंतुलित होती है, नई प्रजातियाँ और शक्तियाँ उभरकर संतुलन बहाल करती हैं।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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