यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛijāmyaham
whenever
certainly
of righteousness
decline
is
Arjun, descendant of Bharat
increase
of unrighteousness
at that time
self
manifest
I
अर्थMeaning
हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने-आपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
Whenever there is a decline of Dharma, O Arjuna, and an uprising of Adharma, then I incarnate myself.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
यह श्लोक गीता के सबसे प्रसिद्ध और सबसे आश्वासनपूर्ण वचनों में से एक है, जिसने युगों से अंधकार में डूबे हृदयों को आशा दी है। 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत', हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है, 'अभ्युत्थानमधर्मस्य', और अधर्म का उत्थान होता है, 'तदात्मानं सृजाम्यहम्', तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। 'यदा यदा', जब-जब, यह दोहराव इस वचन को एक शाश्वत प्रतिज्ञा बना देता है। यह कोई एक बार की घटना नहीं, बार-बार होने वाला एक दिव्य नियम है। 'ग्लानि' शब्द बहुत सजीव है: यह धर्म की श्रान्ति, उसका मुरझाना है, जैसे एक पौधा पानी न मिलने पर कुम्हला जाता है। और जब धर्म इस प्रकार मुरझाता है, तब अधर्म सिर उठाता है। इस श्लोक में ईश्वर की वह करुणा झलकती है जो संसार को उसके हाल पर नहीं छोड़ती। जब अन्याय असहनीय हो जाए, जब सज्जन असहाय दिखें, तब भी यह विश्वास बना रहता है कि ईश्वर उदासीन नहीं। वे अवतार के रूप में आएँ, या किसी संत के रूप में, या किसी साधारण व्यक्ति के साहस के रूप में, वे किसी न किसी रूप में प्रकट होते हैं। जब आपके जीवन में भी अंधकार घना लगे, तब इस वचन को स्मरण कीजिए: प्रकाश लौटता है, यह उसकी प्रतिज्ञा है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
“क्या आप समाज में बुराई का प्रभाव देखकर हताश और निष्क्रिय हो जाते हैं, अथवा यह अटूट विश्वास रखते हैं कि सृष्टि का नैतिक संतुलन अंततः अधर्म को पराजित करके धर्म को स्थापित करता है?”
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी
सिस्टम्स थ्योरी और ऊष्मागतिकी: हर स्थिर तंत्र में एक स्व-सुधारक तंत्र (negative feedback) होता है। जब एन्ट्रॉपी (अव्यवस्था, अधर्म) बढ़ती है, तब सुधारात्मक शक्तियाँ उभरती हैं — जैविक, सामाजिक और ब्रह्मांडीय स्तर पर। ब्रह्मांड स्वयं को संतुलित करता है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-24
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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