कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 18/2962%

Katha Upanishad 1.18

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वांश्चिनुते नाचिकेतम् ।स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो इन तीनों को जानकर — विद्वान् होकर — नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह मृत्यु के पाशों को आगे से हटाकर, शोक-पार होकर, स्वर्ग में आनन्द भोगता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who, knowing the three (mother, father, teacher), thus learned, builds up the Nāciketa fire — pushing the noose of Death far away, beyond sorrow, rejoices in heaven.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

जो इन तीनों को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह जीवित रहते ही मृत्यु के पाशों को काटकर सभी शोकों से पार हो जाता है और स्वर्गलोक में आनंदित होता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
यमराज कहते हैं कि जो इस त्रि-आयामी अग्नि-विद्या को तत्त्वतः जानकर उसका अनुष्ठान करता है, वह 'पुरतः प्रहित्य मृत्युपाशान्' — अपने सम्मुख उपस्थित मृत्यु के पाशों को जीवित अवस्था में ही काटकर छिन्न-भिन्न कर देता है और 'शोकातिगो मोदते' — सभी मानसिक शोकों और संतापों से परे होकर परमानंद का अनुभव करता है। यहाँ मृत्यु केवल शरीर का अंत नहीं है; मृत्यु का अर्थ है अज्ञान, भय, संकीर्णता और व्यर्थ की चिंताओं में घुट-घुट कर जीना। जब मनुष्य को ब्रह्मांडीय व्यवस्था (Cosmic Order) और अपनी आत्मिक ऊर्जा के रूपांतरण का ज्ञान हो जाता है, तो उसके भीतर का गहनतम अवचेतन भय — मृत्यु का भय — समाप्त हो जाता है। अस्तित्ववादी मनोचिकित्सा (Existential Psychotherapy) भी मानती है कि मनुष्य की अधिकांश मानसिक विकृतियों और व्यग्रताओं के मूल में मृत्यु का अचेतन भय होता है। जब यह भय विलीन होता है, तभी वास्तविक शोक-मुक्त जीवन का आरंभ होता है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **आंतरिक भयों का विच्छेदन**: अपने अवचेतन में छिपे असफल होने, खोने या मृत्यु के भय का तार्किक और आत्मिक विश्लेषण करें; समझें कि चेतना का कभी विनाश नहीं होता। - **वर्तमान में पूर्ण आनंद**: भविष्य की अनिश्चितताओं और भूतकाल के पश्चातापों (शोक) को त्यागकर वर्तमान क्षण में अपनी पूरी ऊर्जा और निष्ठा के साथ जिएं। - **ज्ञान को साधना में बदलना**: केवल आध्यात्मिक सिद्धांतों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उन्हें नाचिकेत अग्नि की भाँति अपने दैनिक आचरण और विचारों में उतारें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं आज भी मृत्यु, हानि और अनिश्चितता के सूक्ष्म पाशों में बंधकर भयभीत जीवन जी रहा हूँ, अथवा मैंने विवेक के द्वारा इन पाशों को काट दिया है?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

मृत्यु-भय से मुक्ति का मनोविज्ञान: अस्तित्व के गहरे नियमों की वैज्ञानिक समझ व्यक्ति के अवचेतन में छिपे मृत्यु और विनाश के भय को समूल नष्ट कर देती है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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