कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 3/2910%

Katha Upanishad 1.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"जिन गायों ने अन्तिम जल पी लिया, अन्तिम तृण खा लिया, अन्तिम दूध दे दिया, इन्द्रियाँ क्षीण हो गईं — ऐसी गायों को दान करने वाला 'अनन्द' नामक लोकों को जाता है।"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

'Those cows have drunk their last water, eaten their last grass, given their last milk, and have no senses left. Joyless are the worlds the giver of these reaches.'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

बालक की तीक्ष्ण आलोचना। जो अनुपयोगी और जीर्ण-शीर्ण हो चुका है उसे देना दान नहीं, बल्कि अस्वीकृति है। ऐसा दान देने वाला आनन्द-रहित 'अनन्द' लोकों को प्राप्त होता है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
आधुनिक उपभोक्तावादी समाज में लोग प्रायः अपने घरों का अनुपयोगी कचरा, फटे-पुराने वस्त्र या बासी सामग्री 'दान' के नाम पर निर्धनों को देकर आत्म-संतोष का अनुभव करते हैं। नचिकेता ने जब देखा कि उसके पिता ऐसी गायों का दान कर रहे हैं जो अब जल पीने, घास चरने या दूध देने में असमर्थ हैं, तो उसने तुरंत पहचान लिया कि यह दान नहीं, बल्कि अपनी अनुपयोगी वस्तुओं से छुटकारा पाने का एक हीन प्रयास है। उपनिषद् स्पष्ट घोषणा करता है कि ऐसा पाखंडपूर्ण दान व्यक्ति को 'अनन्दाः' (आनंदहीन, अंधकारमय लोकों) में ले जाता है, अर्थात् यह आत्मा को गहरे संताप और रिक्तता से भर देता है। देने की क्रिया में त्याग और आदर का होना अनिवार्य है। यदि हम समाज, संस्था या किसी व्यक्ति को केवल वही दे रहे हैं जो हमारे लिए व्यर्थ हो चुका है, तो हम वास्तव में कुछ त्याग नहीं कर रहे, बल्कि अपने अहंकार को संतुष्ट कर रहे हैं। सच्चा दान वह है जिसमें अपनी प्रिय और मूल्यवान वस्तु को परोपकार हेतु सहर्ष अर्पित करने की उदारता हो।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **सच्चे त्याग का दान**: जब भी किसी को कुछ दान या उपहार दें, तो यह सुनिश्चित करें कि वह वस्तु गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक हो; अनुपयोगी वस्तुओं का विसर्जन दान की श्रेणी में नहीं आता। - **सम्मानपूर्वक सहयोग (Dignified Giving)**: किसी अभावग्रस्त व्यक्ति की सहायता करते समय उसकी गरिमा का पूरा ध्यान रखें; देने की प्रक्रिया में दया का अहंकार नहीं, कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। - **संसाधनों की प्रामाणिकता**: सामाजिक कार्यों या साझा परियोजनाओं में केवल अपना बचा हुआ या बेकार समय देने के बजाय अपना श्रेष्ठ ध्यान और ऊर्जा समर्पित करें।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मेरे द्वारा दूसरों को दी जाने वाली वस्तुएँ, समय या सहयोग केवल मेरी बची हुई निरर्थक चीजें हैं, अथवा मैं सम्मान और वास्तविक त्याग के साथ अपना श्रेष्ठतम साझा करता हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

उपहार की गुणवत्ता पर शोध: उपहार प्राप्त करने वाले यह महसूस कर सकते हैं कि कोई उपहार वास्तविक त्याग था या केवल अनुपयोगी वस्तु का विसर्जन। देने वाले की भावना के आधार पर एक ही वस्तु का मूल्य बदल जाता है।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

Content status

  • Original text
  • Translation · from the source archive

No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.

Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

Found a mistake?

आगे क्या · What next