कठोपनिषद्

Vallī 1श्लोक 7/2924%

Katha Upanishad 1.7

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।तस्यैतां शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

"ब्राह्मण अतिथि घर में वैश्वानर (अग्नि) की भाँति प्रवेश करता है। उसकी शान्ति के लिये जल लाओ, हे वैवस्वत!"

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

(Yama's servants:) 'A Brahmin guest enters a house like fire (Vaiśvānara). They pacify him thus: O Vaivasvata (Yama), bring water for him.'

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्या

यम के घर आगमन। यम अनुपस्थित हैं। नचिकेता तीन दिन भूखा-प्यासा प्रतीक्षा करता है। ऋषि-पत्नी यम को चेतावनी देती है कि एक ब्राह्मण अतिथि अग्नि के समान प्रज्वलित होकर घर आया है।

विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
आधुनिक चिंतनModern reflection · not scriptureContemplative Reflection & Actionआधुनिक चिंतन
आधुनिक संदर्भ · Modern Context
वैदिक संस्कृति में अतिथि को 'वैश्वानर अग्नि' के समान माना गया है। जैसे अनियंत्रित अग्नि घर को भस्म कर सकती है, वैसे ही द्वार पर आए किसी भूखे, प्यासे या याचक की उपेक्षा उस गृहस्थ के नैतिक और सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। नचिकेता यमराज के भवन में तीन दिन तक बिना अन्न-जल के प्रतीक्षा करता रहा। जब यमराज लौटे, तो उनकी पत्नी ने उन्हें चेताया कि तुम्हारे द्वार पर एक तपस्वी अतिथि भूखा बैठा है, तुरंत जल लाकर उसका सत्कार करो। समकालीन संदर्भ में यह सिद्धांत केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और सामाजिक आतिथ्य (hospitality) का सर्वोच्च स्तर है। हमारे समाज, कार्यालय या घर में आने वाले किसी भी व्यक्ति, विशेषकर जो संकट में हो या आश्रय की खोज में आया हो, का अनादर करना हमारी आत्मिक दरिद्रता का परिचायक है। दूसरों की मूलभूत आवश्यकताओं के प्रति संवेदनहीनता हमारे अपने सुख-शांति को भस्म कर देती है।
आज के जीवन में प्रयोग · Practical Application
- **संवेदनशील आतिथ्य**: अपने घर या कार्यालय में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति का बिना किसी भेदभाव के सम्मानपूर्वक स्वागत करें; उनकी मूलभूत सुविधा और जल-पान का ध्यान रखें। - **दूसरों के समय का आदर**: यदि किसी को आपने प्रतीक्षा में रखा है, तो न केवल क्षमा मांगें बल्कि उसके प्रति अतिरिक्त संवेदनशीलता और कृतज्ञता का व्यवहार करें। - **अपरिचितों के प्रति करुणा**: संकट में पड़े अजनबियों या जरूरतमंदों की उपेक्षा न करें; मानवीय गरिमा का संरक्षण ही समाज की वास्तविक सुरक्षा है।
चिंतन प्रश्न · Self-Reflection

“क्या मैं अपने द्वार या प्रभाव-क्षेत्र में आने वाले लोगों के प्रति उतना ही संवेदनशील और कृतज्ञ हूँ, जितना मैं स्वयं के लिए दूसरों से अपेक्षा करता हूँ?”

शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणी

आतिथ्य और सामाजिक उत्तरदायित्व: वैदिक समाज में अपरिचित अतिथि का सम्मान सामाजिक सौहार्द और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा का प्रमुख आधार था।

A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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Sanskrit edition
Krishna Yajurveda Kathaka Shakha Recension. Adyar Library / SanskritDocuments
Translation
Swami Gambhirananda, Prof. S. Radhakrishnan
Last updated
2026-10-24
Licence note (as recorded)
Sanskrit mūla — public domain (2500+ years old). sanskritdocuments.org publishes digitized text under permissive terms.
पाठ-भेद · Variant readings
Slight verbal variations noted between Anandashram Sanskrit Series no. 7 and BORI manuscripts.

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