सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः।निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्
sattvaṁ rajas tama iti guṇāḥ prakṛiti-sambhavāḥ nibadhnanti mahā-bāho dehe dehinam avyayam
mode of goodness
mode of passion
mode of ignorance
thus
modes
material nature
consists of
bind
mighty-armed one
in the body
the embodied soul
eternal
अर्थMeaning
हे महाबाहो ! प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले सत्त्व, रज और तम -- ये तीनों गुण अविनाशी देहीको देहमें बाँध देते हैं।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
The Gunas of Sattva, Rajas, and Tamas arise from Prakrti and bind the immutable Self in the body, O Arjuna.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
सृष्टि का रहस्य बताने के बाद भगवान अब उन तीन शक्तियों का परिचय देते हैं जो इस अध्याय का विषय हैं। 'सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः', सत्त्व, रज और तम, ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं, 'निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्', हे महाबाहो, ये अविनाशी देही को देह में बाँध देते हैं। 'गुण' शब्द का एक अर्थ रस्सी भी होता है, और यह अर्थ इस श्लोक में बहुत सुन्दर बैठता है। तीन गुण तीन रस्सियाँ हैं, जो मिलकर एक दृढ़ बन्धन बनाती हैं। जैसे तीन धागों को बटकर बनी रस्सी अकेले धागे से कहीं अधिक दृढ़ होती है। सत्त्व, रज, तम, तीनों मिलकर आत्मा को शरीर से बाँधे रखते हैं। पर इस श्लोक का सबसे मार्मिक शब्द है 'अव्ययम्', अविनाशी। जो बँधा हुआ है, वह स्वयं अविनाशी है, स्वतंत्र है, गुणों से परे है। फिर भी वह बँध जाता है। यह एक सम्राट के समान है जो भूल से स्वयं को कारागार में बन्दी मान बैठा हो, जबकि कारागार का द्वार कभी बन्द ही नहीं था। ध्यान दीजिए, भगवान यह भी कहते हैं कि सत्त्व भी बाँधता है, जो सबसे अच्छा गुण माना जाता है। अच्छाई की आसक्ति भी एक बन्धन है, सोने की बेड़ी की भाँति। यह श्लोक आपको अपने भीतर की इन तीन शक्तियों को पहचानने का आमंत्रण देता है। आज दिन भर देखिए: कब आप शान्त और स्पष्ट हैं, कब अशान्त और सक्रिय, कब सुस्त और भ्रमित। यही पहचान मुक्ति का आरम्भ है।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
अपनी वर्तमान अवस्था की समीक्षा करो: क्या तुम स्पष्ट और एकाग्र हो (सत्त्व)? बेचैन और प्रेरित (रजस)? सुस्त और भारी (तमस)? फिर पीछे जाकर देखो: आज क्या खाया, कैसे सोए, क्या देखते-पढ़ते रहे? हर इनपुट तुम्हारा गुण-संतुलन बदलता है। अपनी मानसिक अवस्था पर तुम्हारा, जितना तुम सोचते हो, उससे कहीं अधिक नियंत्रण है।
शोध संदर्भResearch context · not scriptureComparative Research Noteशोध टिप्पणीAI-drafted · editor-approved
नींद, आहार, व्यायाम और परिवेश मनःस्थिति को प्रभावित कर सकते हैं, हालांकि असर व्यक्ति और परिस्थिति के अनुसार बदलता है। कभी मन स्पष्ट लगता है, कभी चंचल, कभी जड़; इन अनुभवों को गुणों के वर्णन से जोड़कर पढ़ा जा सकता है। यह केवल एक दार्शनिक समानता है। सत्त्व, रज और तम को मापी जा सकनेवाली वैज्ञानिक इकाइयाँ या आधुनिक मनोविज्ञान की श्रेणियाँ कहना उचित नहीं; गीता का अपना दार्शनिक ढाँचा है।
A modern parallel offered for reflection. It is not part of the scripture, and it has not been checked against the original sources it may allude to.
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
Content status
- Original text
- Translation · from the source archive
No independent human review is recorded for this verse yet. How this site is made.
- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
- Community dataset — verify license terms at source repo before redistribution.
- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
Found a mistake?