मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते
māṁ cha yo ’vyabhichāreṇa bhakti-yogena sevate sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate
me
only
who
unalloyed
through devotion
serve
they
the three modes of material nature
rise above
these
level of Brahman
comes to
अर्थMeaning
जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोगके द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणोंका अतिक्रमण करके ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।
अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।
And he who, with unwavering devotion through Yoga, serves Me, he, transcending the Gunas, becomes fit for the state of Brahman.
Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.
व्याख्याVyakhya
अर्जुन के तीसरे प्रश्न, 'गुणों का अतिक्रमण कैसे हो', का उत्तर भगवान अब देते हैं, और यह उत्तर अत्यन्त मधुर और सरल है। 'मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते', जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग से मेरी सेवा करता है, 'स गुणान्समतीत्यैतान्', वह इन गुणों का भली-भाँति अतिक्रमण करके, 'ब्रह्मभूयाय कल्पते', ब्रह्म की प्राप्ति के योग्य हो जाता है। सोचिए, पूरे अध्याय में गुणों का इतना गहरा, सूक्ष्म विवेचन हुआ: उनकी उत्पत्ति, उनके बन्धन, उनके लक्षण, उनके फल। कोई सोच सकता था कि इनसे पार जाने के लिए कोई अत्यन्त कठिन साधना चाहिए होगी। पर भगवान का उत्तर एक शब्द में है: 'भक्तियोग'। प्रेम से भगवान की सेवा। 'अव्यभिचारेण', अव्यभिचारी, अर्थात् ऐसी भक्ति जो कभी भटके नहीं, जिसमें कोई दूसरा लक्ष्य न हो। यह इस उत्तर की कुंजी है। जब मन सर्वथा भगवान में लग जाता है, तो गुणों के लिए स्थान ही नहीं बचता। जैसे जब सूर्य उदय होता है, तो अन्धकार को हटाने के लिए अलग से कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता। भक्ति वह सूर्य है जो गुणों के अन्धकार को अपने-आप दूर कर देती है। ज्ञानी गुणों को देखकर उनसे अलग होता है; भक्त भगवान में डूबकर उनसे ऊपर उठ जाता है। दोनों एक ही स्थान पर पहुँचते हैं। यह श्लोक आपको सबसे सुगम मार्ग दिखाता है। यदि गुणों का विश्लेषण आपको कठिन लगे, तो केवल भगवान से प्रेम कीजिए। वह प्रेम ही आपको गुणों से परे ले जाएगा।
विज्ञान एवं आधुनिक उपयोगScience & Modern Application
कोई भी कर्म पूर्ण समर्पण के साथ — बिना व्यक्तिगत स्वार्थ, बिना फल की लालसा के — भक्ति का रूप बन जाता है। आज एक कार्य पूर्णतः उसी के लिए, अर्पण के रूप में करो। देखो कैसे ध्यान की गुणवत्ता बदल जाती है।
स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण
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- Sanskrit edition
- Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
- Translation
- Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
- Source
- github.com/gita/gita
- Last updated
- 2026-10-22
- Licence note (as recorded)
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- पाठ-भेद · Variant readings
- Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.
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