श्रीमद्भगवद्गीता

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Bhagavad Gita 10.3

मूल पाठSource scriptureOriginal Sanskritमूल संस्कृत

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते

अर्थMeaning
अनुवादTranslationLiteral Hindi Translationमूल हिन्दी अनुवाद (अक्षरशः)मूलानुवाद · Literal

जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

अक्षरशः अनुवाद — मूल संस्कृत श्लोक के प्रत्येक पद का प्रत्यक्ष अर्थ।

अनुवादTranslationLiteral English TranslationLiteral Text

He who knows Me as unborn, without a beginning, and the great Lord of the worlds—he among mortals is undeluded and is released from all sin.

Direct literal rendering preserving Sanskrit philosophical terminology.

व्याख्याVyakhya
संपादकीय व्याख्याEditorial explanationVyakhya (व्याख्या)व्याख्याAI-drafted · editor-approved

जिन्हें देवता भी पूरा नहीं जानते, उन्हें मनुष्य कैसे जाने? भगवान अब इसका एक सरल उत्तर देते हैं। 'यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्', जो मुझे अजन्मा, अनादि और सब लोकों का महान ईश्वर जानता है, 'असम्मूढः स मर्त्येषु', वह मनुष्यों में मोह से रहित है, 'सर्वपापैः प्रमुच्यते', और सब पापों से मुक्त हो जाता है। पिछले श्लोक में कहा गया कि भगवान के 'प्रभव' को कोई नहीं जानता, और यहाँ कहा जाता है कि जो उन्हें 'अज', अजन्मा जानता है, वही ज्ञानी है। यह विरोधाभास नहीं, एक गहरा संकेत है। उनके जन्म का रहस्य जानना आवश्यक नहीं; इतना जानना पर्याप्त है कि वे जन्म से परे हैं। गीता प्रेस इसे 'दृढ़ता से मानना' कहती है, अर्थात् यह केवल बौद्धिक जानकारी नहीं, हृदय का अटल विश्वास है। 'मर्त्येषु', मरणशील मनुष्यों में, यह शब्द एक करुण पृष्ठभूमि बनाता है। हम सब मरणशील हैं, और इसी मरणशीलता के बीच जो अमर सत्य को पहचान लेता है, वह 'असम्मूढ' है, मोह से जागा हुआ। जैसे नदी में बहता हुआ कोई व्यक्ति तट पर खड़ी एक अचल शिला को पकड़ ले। यह श्लोक आपको बताता है कि भगवान को महेश्वर के रूप में पहचानना ही अनेक बन्धनों से मुक्ति का आरम्भ है। जब यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि सब लोकों का स्वामी एक है, तो छोटी-छोटी भयभीत निर्भरताएँ अपने-आप छूटने लगती हैं।

स्रोतSources and editionSources and editionस्रोत एवं संस्करण

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  • Commentary · AI-drafted · editor-approved

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Sanskrit edition
Gita Press Edition (गोरखपुर संवत् 2080). Gita Press, Gorakhpur / Muktabodha Digital Archive
Translation
Jayadayal Goyandka (Hindi), Swami Gambhirananda & Swami Sivananda (English)
Last updated
2026-10-23
Licence note (as recorded)
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पाठ-भेद · Variant readings
Variant readings collated from Anandashram (Pune) and Bhandarkar Oriental Research Institute (BORI) critically edited texts.

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